<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476</id><updated>2011-12-14T09:24:06.425+05:30</updated><category term='Kumble'/><category term='क्रिकेट वर्ल्ड कप'/><category term='टीम इंडिया'/><category term='Sachin'/><category term='अहमदाबाद ब्लास्ट'/><category term='Rahul'/><category term='बेंगलुरु धमाके'/><category term='हिंदी'/><category term='Cricketers'/><category term='आगराटुडे.इन'/><category term='Indian Cricketers'/><category term='इंटरनेट'/><category term='धर्मगुरु'/><category term='चिट्ठे'/><category term='Dravid'/><category term='वर्किंग पेरंट्स डे'/><category term='आतंकवाद'/><category term='धर्म'/><category term='बाढ़'/><category term='राहत कोष'/><category term='आगरा'/><category term='Sehwag'/><category term='डेरा सच्चा सौदा'/><category term='Bhajji'/><category term='वेबसाइट'/><category term='क्रिकेट'/><category term='बिहार'/><category term='ब्लॉग'/><category term='Kaif'/><category term='हिंदी ब्लॉगर्स'/><category term='बाढ़ पीड़ित'/><title type='text'>दिल्ली ब्लॉग</title><subtitle type='html'>दिल्ली दिल से...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>100</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-186982193932235047</id><published>2009-09-16T08:42:00.002+05:30</published><updated>2009-09-16T08:50:56.284+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वर्किंग पेरंट्स डे'/><title type='text'>हैपी वर्किंग पेरंट्स डे</title><content type='html'>&lt;strong&gt;आज वर्किंग पेरंट्स डे पर कई साल पहली पढ़ी कुछ लाइनें याद आ रही हैं और इनका गहरा मतलब आज ज्यादा अच्छी तरह महसूस कर पा रही हूं....&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर मुझे बच्चे को दोबारा पालना हो,&lt;br /&gt;तो मैं उंगुलियों पर ज्यादा पेंट करूंगी और उंगली कम दिखाऊंगी।&lt;br /&gt;मैं सुधारूंगी कम और जुडूंगी ज्यादा।&lt;br /&gt;मैं अपनी आंखें घड़ी से हटा लूंगी और अपनी आंखें उसी पर गड़ाए रखूंगी।&lt;br /&gt;मैं जानने की कम परवाह करूंगी और उसकी ज्यादा परवाह करूंगी।&lt;br /&gt;मैं ज्यादा घूमूंगी और ज्यादा पतंगें उडाऊंगी।&lt;br /&gt;मैं कम गंभीर रहूंगी और खेलूंगी ज्यादा।&lt;br /&gt;मैं मैदानों में ज्यादा भागूंगी और ज्यादा सितारों को देखूंगी।&lt;br /&gt;मैं डांटूंगी कम और गले ज्यादा लगाऊंगी।&lt;br /&gt;मैं कम बार कठोर रहूंगी और ज्यादा बार तारीफ करूंगी।&lt;br /&gt;मैं शक्ति के प्रेम के बारे में कम सिखलाऊंगी,&lt;br /&gt;और प्रेम की शक्ति के बारे में ज्यादा सिखाऊंगी।&lt;br /&gt;(डियोन लूमैन्स)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-186982193932235047?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/186982193932235047/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=186982193932235047' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/186982193932235047'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/186982193932235047'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='हैपी वर्किंग पेरंट्स डे'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-3033378168836903137</id><published>2009-07-28T10:20:00.002+05:30</published><updated>2009-07-28T10:27:48.411+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आगरा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आगराटुडे.इन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वेबसाइट'/><title type='text'>आगरा से परिचित कराती वेबसाइट आगराटुडे.इन</title><content type='html'>&lt;p&gt;आगरा शहर को बरसों पहले छोड़कर विदेशों में जा बसे यहां के अप्रवासी भारतीयों के लिए एक वेबसाइट &lt;a href="http://agratoday.in/"&gt;आगराटुडे.इन &lt;/a&gt;लॉन्च की गई। संपादक ब्रज खंडेलवाल ने बताया, 'इस वेबसाइट पर आगरा से जुड़ी सभी सूचनाएं मुहैया कराई जाएंगी। इसके जरिए शहर और आस-पास के इलाकों से जुड़े सभी पर्यावरणीय, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों को उठाने का प्रयास किया जाएगा। इसके अलावा दूसरी अन्य गतिविधियों को भी पाठकों के लिए अद्यतन प्रस्तुत किया जाएगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस मौके पर आयोजित गोष्ठी में वेब पत्रकार पीयूष पांडेय ने कहा कि ऑन लाइन पत्रकारिता तेजी से अपना मुकाम बनाती जा रही है और भविष्य में परंपरागत मीडिया को इससे कड़ी चुनौती मिलेगी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मीडियाभारती वेब सॉल्युशन और &lt;a href="http://mediabharti.com/joomla/"&gt;मीडियाभारती.कॉम &lt;/a&gt;के संपादक धर्मेंद्र कुमार ने कहा कि भविष्य न केवल ऑनलाइन पत्रकारिता का ही है बल्कि पर्यावरण और बढ़ते प्रदूषण जैसे दूसरे मुद्दों को कारगर ढंग से उठाने के लिए भी ये सबसे अच्छा, सस्ता और टिकाऊ माध्यम है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;होटल गोवर्धन में हुए उद्घाटन समारोह में आगरा विश्वविद्यालय के कंप्यूटर संस्थान के डॉ. संदीप जैन, केंद्रीय हिंदी संस्थान के चंद्रकांत त्रिपाठी और ब्रज मंडल हेरिटेज कंजर्वेशन सोसायटी के अध्यक्ष सुरेंद्र शर्मा, आईटी विशेषज्ञ विकास दिनकर पंडित और शहर के कई जानेमाने लोग इस मौके पर मौजूद थे।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-3033378168836903137?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/3033378168836903137/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=3033378168836903137' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/3033378168836903137'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/3033378168836903137'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='आगरा से परिचित कराती वेबसाइट आगराटुडे.इन'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-6777337487615036842</id><published>2008-09-02T08:48:00.003+05:30</published><updated>2008-09-02T08:50:23.063+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाढ़ पीड़ित'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाढ़'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राहत कोष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिहार'/><title type='text'>आखिर कैसे करें बाढ़ पीड़तों की मदद</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;धर्मेंद्र कुमार&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इन लोगों में अपना प्रतिबिम्ब देख रहे शेष भारत के लोग सहायता के लिए बढ़ कर आगे आ रहे हैं। लेकिन, अपने बचे-खुचे सामान और छोटे-छोटे बच्चों को कंधों पर लादे बूढ़े और जवानों की मार्मिक तस्वीरें देखकर सहायता को आगे बढ़ने वाले ये हाथ अचानक रुक गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मदद के लिए लोग लगातार आगे आ रहे हैं लेकिन कैसे करें...यह नहीं पता। शनिवार को एनडीटीवी खबर कार्यालय में कम से कम सौ से ज्यादा आने वाली फोन काल सिर्फ इस बात से संबंधित थीं कि राहत सामग्री में अपना योगदान कैसे करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने खोजे राहत सामग्री में जुटे लोगों के फोन नंबर। नंबर मिले पर फोन नहीं लगा। तो हमने रुख किया इंटरनेट का। सीधे पहुंचे बिहार के मुख्यमंत्री की वेबसाइट &lt;a href="http://cm.bih.nic.in/"&gt;http://cm.bih.nic.in&lt;/a&gt; पर जहां अफसरों का गुणगान और मुख्यमंत्री के भाषणों का संग्रह तो मिला पर मुख्यमंत्री राहत कोष में योगदान कैसे करें, यह पता नहीं चल सका। मुख्यमंत्री राहत कोष के लिंक पर पहुंचे, लेकिन वहां हमें मिला अब तक राहत कोष से लाभान्वित लोगों की सूची। यानी कि राजनीतिक लाभ लेने की पूरी तैयारी। सवाल अभी भी जिंदा कि रोहत कोष में योगदान कैसे करें...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां से निराश होकर हम पहुंचे देश के प्रधानमंत्री की वेबसाइट &lt;a href="http://pmindia.nic.in/"&gt;http://pmindia.nic.in&lt;/a&gt; पर। यहां भी कोष का यशोगान तो मिला, लेकिन अपना योगदान कैसे करें, यह सवाल अनुत्तरित। यहां कुछ फोन नंबर जरूर मिले और बैंकों की शाखाओं के पते भी, जो शाम को बंद हो चुकी थीं। हमें ख्याल आया राहत कोष में ऑनलाइन धन जमा कराने का। लेकिन अजीब बात यह कि कोष में ऑनलाइन धन जमा करने की व्यवस्था वेबसाइट पर नहीं मिली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी हमारी खोज जारी रही। हम पहुंचे भारतीय दूतावास की साइट &lt;a href="http://www.indianembassy.org/"&gt;http://www.indianembassy.org&lt;/a&gt; पर। यहां मिली हमें ऑनलाइन योगदान देने की जानकारी। लेकिन दुर्भाग्य ने साथ यहां भी नहीं छोड़ा। ऑनलाइन सहायता राशि देने के लिए आगे बढ़े तो एक फॉर्म का प्रिंट लेने का निर्देश दिया गया जिसे भर कर अगले दिन प्रधानमंत्री कार्यालय में जमा करना है।&lt;br /&gt;अंतत: साबित यह हुआ कि देश को आईटी के क्षेत्र में सिरमौर बना देने के दावों के बीच सरकार के कर्ता-धर्ताओं के पास इतना समय नहीं है कि वे देश के नागरिकों को यह जानकारी दे सकें कि अगर वे बाढ़ पीड़ितों की मदद करना चाहें तो कभी भी और कहीं से भी, कैसे करें...&lt;br /&gt;ndtvkhabar से साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-6777337487615036842?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/6777337487615036842/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=6777337487615036842' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/6777337487615036842'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/6777337487615036842'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='आखिर कैसे करें बाढ़ पीड़तों की मदद'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-5823983347519900913</id><published>2008-08-08T12:33:00.003+05:30</published><updated>2008-08-08T12:42:56.185+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आतंकवाद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अहमदाबाद ब्लास्ट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बेंगलुरु धमाके'/><title type='text'>गलती किसकी?</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_yBDg7Pxl_Is/SJvxWw3f2lI/AAAAAAAAACc/RiLXvPEYcDk/s1600-h/dharm.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5232040765498055250" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_yBDg7Pxl_Is/SJvxWw3f2lI/AAAAAAAAACc/RiLXvPEYcDk/s320/dharm.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;धर्मेंद्र कुमार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौर कीजिए! यह सक्रियता तीन-चार दिन पहले, या कहिए हर रोज दिखाई जाती या यूं कहें कि यह 'रेड अलर्ट' रोज रहे तो क्या बेंगलुरु और अहमदाबाद जैसी घटनाओं से बचा नहीं जा सकता था! उजड़ गए 100 से ज्यादा परिवारों को बचाया नहीं जा सकता था! किसका दोष है यह... प्रशासन का, पुलिस का, नेताओं का या कोई और ही है इसका जिम्मेदार! समझ नहीं आता, किसके सिर थोपें इसका दोष! जब कोई घटना घट जाती है तो हममें न जाने कहां से यह अतिरिक्त फुर्ती आ जाती है। हमारे पुलिसकर्मी शारीरिक रूप से पूरी तरह फिट हो जाते हैं! अधिकारियों द्वारा पर्याप्त संख्या में पुलिसकर्मियों का न होने का दावा न जाने कहां फुर्र हो जाता है! एक पल में सब कुछ ठीक-ठाक, कसी हुई व्यवस्था हम आम नागरिकों के सामने दिखने लगती है। यही नहीं, प्रशासन की आम जनता से भी और ज्यादा सहयोगी होने की उम्मीद भी बलवती हो जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार से अगर कोई उम्मीद करें, तो अब 'जांच' होगी। सभी राजनीतिक दलों के नेता एक-दूसरे को दोषी ठहराने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे। अपने 'कपड़े' और 'जूते' बचाते हुए विस्फोट प्रभावितों से मिलने जाने का दौर शुरू होगा। कुछ नेताओं ने अपने आकाओं की 'शह' पर यह अभियान शुरू भी कर दिया है। सत्तापक्ष सभी सुविधाएं मुहैया कराने का दावा करेगा तो विपक्ष प्रभावितों की ठीक से देखभाल न करने का आरोप लगाएगा। देश की जनता को यह पूरी 'प्रक्रिया' रट गई है, लेकिन हमारे नेताओं को 'अपडेट' होने में न जाने कितना वक्त लगेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बात हमारी खुफिया एजेंसियों की 'सतर्कता' की। अहमदाबाद में सीरियल ब्लास्ट बेंगलुरु बम धमाकों के अगले ही दिन हुए। बेंगलुरु धमाकों के बाद पूरे देश में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया था। फिर कैसे अहमदाबाद में एक-दो नहीं, 18 बम जगह-जगह रख दिए गए? उस समय क्या हमारी जांच एजेंसियां कान में तेल डालकर सो रही थीं। इतने सारे बम धमाकों के पीछे कोई एक-दो आदमी तो होंगे नहीं। फिर उनकी कारगुजारियों से ये एजेंसियां कैसे बेखबर रह गईं? 2002 के दंगों के बाद से ही गुजरात और नरेंद्र मोदी दोनों आतंकवादियों के निशाने पर हैं, इसके बावजूद खुफिया एजेंसियों की यह चूक कई बड़े सवाल खड़े करती है। देश में आतंकवादी खतरों से निपटने के लिए हमें सबसे पहले इन एजेंसियों को ही जवाबदेह बनाना पड़ेगा... और इसकी शुरुआत अब हो ही जानी चाहिए, क्योंकि देरी का मतलब है किसी और शहर में धमाकों की खबर सुनने को हम तैयार रहें...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेंगलुरु, अहमदाबाद या सूरत ही नहीं, देश के हर शहर, हर जगह लगभग यही नजारा है। अभी दो दिन पहले, पड़ोस में एक कार के चोरी हो जाने के बाद रातोंरात कालोनी के बाहर गेट लग गया। रात को ऑफिस से घर लौटे तो पुलिस ने अपनी जीप पीछे लगा दी। घर के सामने गाड़ी से उतरते ही सवालों की झड़ी भी लगा दी। कहां से आ रहे हो? कौन हो? किसकी गाड़ी है? इतनी रात गए कौन सा ऑफिस खुलता है? पूरा परिचय और रात में घर से बाहर होने की वजह बता देने के बाद घर में घुस सका। कोई एतराज नहीं, इस पूछताछ से! लेकिन काश! यह चुस्ती-फुर्ती रोज हो तो कैसा रहे! फिर, न शायद बम फटेंगे, न मोहल्ले में चोरियां होंगी... और तब शायद पुलिस की पूछताछ भी प्यारी लगेगी।&lt;br /&gt;स्रोत- NDTV Khabar.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-5823983347519900913?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/5823983347519900913/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=5823983347519900913' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/5823983347519900913'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/5823983347519900913'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='गलती किसकी?'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_yBDg7Pxl_Is/SJvxWw3f2lI/AAAAAAAAACc/RiLXvPEYcDk/s72-c/dharm.gif' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-7405109394874612217</id><published>2008-07-25T13:32:00.004+05:30</published><updated>2008-07-25T13:47:29.867+05:30</updated><title type='text'>हिंदी वेबसाइट का भविष्य.... एक सच यह भी</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_yBDg7Pxl_Is/SImMAMQY0MI/AAAAAAAAACU/jpWmVgf3-wI/s1600-h/amarujala.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5226862777458020546" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_yBDg7Pxl_Is/SImMAMQY0MI/AAAAAAAAACU/jpWmVgf3-wI/s320/amarujala.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;ब्लॉग जगत पर नजर डालती हूं तो लगता है कि इंटरनेट पर हिंदी का भविष्य काफी उज्ज्वल है और जल्द ही इंटरनेट पर हिंदी के सुनहरे दिन आएंगे। पर आज इस उम्मीद पर एक और करारा झटका लगा (समय-समय पर झटके लगते रहते हैं)। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक समाचार पत्र की साइट खोलने पर यह नज़ारा दिखा।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जाने माने हिंदी न्यूजपेपर वाले अपनी साइट रिन्यू कराना ही भूल गए। यह है ऑनलाइन मीडिया का भविष्य??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-7405109394874612217?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/7405109394874612217/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=7405109394874612217' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/7405109394874612217'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/7405109394874612217'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='हिंदी वेबसाइट का भविष्य.... एक सच यह भी'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_yBDg7Pxl_Is/SImMAMQY0MI/AAAAAAAAACU/jpWmVgf3-wI/s72-c/amarujala.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-7829977484174276732</id><published>2007-10-16T17:12:00.000+05:30</published><updated>2007-10-16T17:19:39.067+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Kumble'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Sehwag'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Cricketers'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Rahul'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Kaif'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Sachin'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Bhajji'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Indian Cricketers'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Dravid'/><title type='text'>Email id's of Cricketers</title><content type='html'>1.  LAXMAN                        :   &lt;a href="mailto:available@home-only.com" target="_blank" rel="nofollow" ymailto="mailto:available@home-only.com "&gt;available@home-only.com &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2.  GANGULY                     :  &lt;a href="mailto:nowdays@no_use.com" target="_blank" rel="nofollow" ymailto="mailto:nowdays@no_use.com"&gt;nowdays@no_use.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3.  KUMBLE                        :   &lt;a href="mailto:only@test_match.com" target="_blank" rel="nofollow" ymailto="mailto:only@test_match.com"&gt;only@test_match.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4.  SACHIN                         :   &lt;a href="mailto:admitted@hospital.com" target="_blank" rel="nofollow" ymailto="mailto:admitted@hospital.com "&gt;admitted@hospital.com &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5.  KAIF                              :    &lt;a href="mailto:good@for_nothing.com" target="_blank" rel="nofollow" ymailto="mailto:good@for_nothing.com "&gt;good@for_nothing.com &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6.  SEHWAG                      :   &lt;a href="mailto:consistently@out_of_form.com" target="_blank" rel="nofollow" ymailto="mailto:consistently@out_of_form.com"&gt;consistently@out_of_form.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;7.  DRAVID                        :  st&lt;a href="mailto:ick@crease_like_fevicol.com" target="_blank" rel="nofollow" ymailto="mailto:ick@crease_like_fevicol.com"&gt; ick@crease_like_fevicol.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;8.  PATHAN                      :   &lt;a href="mailto:takewickets@only_with_keyna.com" target="_blank" rel="nofollow" ymailto="mailto:takewickets@only_with_keyna.com"&gt;takewickets@only_with_keyna.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;9.  GREG CHAPPELL     :   &lt;a href="mailto:only_experiment@noresult.com" target="_blank" rel="nofollow" ymailto="mailto:only_experiment@noresult.com "&gt;only_experiment@noresult.com &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10. MUNAF PATEL        :   &lt;a href="http://us.f534.mail.yahoo.com/ym/Compose?To=only_line&amp;amp;length@nospeed.com" target="_blank" rel="nofollow" ymailto="mailto:only_line&amp;amp;length@nospeed.com "&gt;only_line&amp;amp;length@nospeed.com &lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;11.  HARBHAJAN           :   &lt;a href="mailto:no_spinpitch@nowicket.com" target="_blank" rel="nofollow" ymailto="mailto:no_spinpitch@nowicket.com "&gt;no_spinpitch@nowicket.com &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;12.  SURESH RAINA      :   &lt;a href="http://us.f534.mail.yahoo.com/ym/Compose?To=why_i_am_there@god_knows.com" target="_blank" rel="nofollow" ymailto="mailto:why_i_am_there@god_knows.com "&gt;why_i_am_there@god_knows.com &lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-7829977484174276732?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/7829977484174276732/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=7829977484174276732' title='44 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/7829977484174276732'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/7829977484174276732'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2007/10/email-ids-of-cricketers.html' title='Email id&apos;s of Cricketers'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>44</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-1423774862727241137</id><published>2007-06-13T10:54:00.000+05:30</published><updated>2007-06-13T10:58:13.622+05:30</updated><title type='text'>क्या विदेशी कोच ही है अकेला ऑप्शन?</title><content type='html'>&lt;strong&gt;धर्मेन्द्र कुमार&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ग्राहम फोर्ड के इनकार के तुरंत बाद दूसरे संभावित विकल्प जॉन एंबुरी ने भी यह कहकर अपनी मंशा जता दी है कि वह भी टीम इंडिया के 'दूसरे'  कोच बनने में इंट्रेस्टेड नहीं हैं। बीसीसीआई के लिए इससे बड़ा तमाचा क्या हो सकता है! लेकिन क्या इस एपिसोड से सबक लेकर बीसीसीआई स्वदेशी कोच के बारे में सोचेगी या फिर अभी भी किसी गोरी चमड़ी वाले कोच की खोज में लगी रहेगी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भलीभांति जानने के बावजूद कि भारत में क्रिकेट को सीधे-सीधे देश के गौरव से जोड़ कर देखा जाता है, बीसीसीआई लगातार विदेशी कोचों में टीम इंडिया का खेवनहार ढूंढ़ती रही है। अचंभा तो तब हुआ जब लंबे समय से स्वदेशी कोचों की वकालत करने वाले सुनील गावसकर भी विदेशी कोच का राग अलापते नजर आए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में, भारत ही नहीं, किसी भी स्थापित टीम के लिए केवल उस देश का वाशिंदा ही बेस्ट कोच साबित हो सकता है। वजह है, प्रकृति व प्रवृत्ति। अगर प्रकृति की बात करें तो किसी भी देश के सभी नागरिकों पर वहां की संस्कृति, सभ्यता तथा राजनीतिक और आर्थिक परिवेश का सीधा-सीधा असर पड़ता है। इन्हीं सब कारकों से वहां के नागरिकों के व्यक्तित्वों का निर्माण होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर हम अपने देश की बात करें तो यहां के नागरिक बहुत भावुक और 'लार्जर दैन लाइफ' इमेज में विश्वास करते हैं। मैदान चाहे खेल का हो, राजनीति का हो या फिर फिल्मों का। यहां पर किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियों के व्यावसायिक या सामूहिक प्रदर्शन से पहले व्यक्तिगत प्रदर्शन को तरजीह दी जाती है। सामूहिक हित एक लक्ष्य हो सकता है लेकिन अंतिम नहीं। उदाहरण आप हर क्षेत्र में देख सकते हैं। फिल्मों की बात करें तो वह अमिताभ बच्चन हो सकते हैं, रजनीकांत हो सकते हैं जबकि फिल्म एक टीमवर्क का नतीज़ा होती है लेकिन पूजा नायक की होती है। राजनीति और खेलों के क्षेत्रों में भी नाम गिनाने की जरूरत नहीं है।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रवृत्ति की बात करें तो किसी भी देश के नागरिक आपसी मानवीय प्रवृत्तियों के ज्यादा अच्छे जानकार होते हैं, बजाय विदेशियों के। उन्हें कम से कम यह पता होता है कि इस परिवेश में किसी भी प्रतिभा का दोहन कहां और कैसे करना है, ताकि उसकी लार्जर दैन लाइफ इमेज को, जो उसकी इस परिवेश में मुख्य मानक है, नुकसान न पहुंचे। भारतीय क्रिकेट के मामले में किसी भी विदेशी कोच के लिए इस बात को समझ पाना खासा मुश्किल हो सकता है। ग्रेग चैपल का उदाहरण अभी पुराना नहीं हुआ है। चैपल के टीम हित में लिए गए निर्णयों को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, लेकिन क्या वह सीनियर प्लेयरों का समुचित उपयोग कर पाए? क्या वह यह समझ पाए कि सीनियर खिलाड़ियों की भारतीय समाज में बनी छवि का सम्मान करते हुए कैसे टीम में उनका यूज किया जाए? इसके उलट, पूर्व में जब भी एस. वेंकटराघवन या किसी अन्य भारतीय कोच के हवाले टीम रही तो वह इस तरह बंटी नजर नहीं आई। मतभेद रहे होंगे, टीम का प्रदर्शन भी कुछ खास नहीं रहा होगा, लेकिन टीम सीनियर व जूनियर जैसे 2 हिस्सों में बंटी नजर नहीं आई। ऐसी टीम से आप कोई उम्मीद नहीं कर सकते जो इस तरह बंटी हुई हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब ऐसा लगने लगा है, कि एक बार फिर से बीसीसीआई को स्वदेशी कोच के बारे में सोचना चाहिए। एक ऐसा कोच जो टीम के सीनियर और जूनियर खिलाड़ियों से उनकी प्रतिभा, पूर्व प्रदर्शन व गरिमा के अनुरूप काम ले सके।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-1423774862727241137?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/1423774862727241137/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=1423774862727241137' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/1423774862727241137'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/1423774862727241137'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2007/06/blog-post.html' title='क्या विदेशी कोच ही है अकेला ऑप्शन?'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-6271683680288487432</id><published>2007-05-17T20:56:00.000+05:30</published><updated>2007-05-17T20:58:46.985+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धर्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डेरा सच्चा सौदा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धर्मगुरु'/><title type='text'>धर्मों के बीच लड़ाई का क्या काम</title><content type='html'>भटिंडा में सिखों व डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों के बीच का संघर्ष बेहद अजीब है। मानवता और विश्व बंधुत्व का संदेश देने वाले धर्मों और धर्मगुरुओं की जमीन कितनी पोली है, यह इस संघर्ष से साफ झलकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बात बड़ी अजीब-सी लगती है कि धार्मिक गुरु अपने चेलों को पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक से डराकर अपनी सेवा तो करवा सकते हैं, पैसा तो बना सकते हैं, लेकिन मानव बनाने के लिए और इंसानियत दिखाने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलिए मान लेते हैं कि सिखों को कंट्रोल करने के लिए कोई एक शख्स नहीं था, जिसकी बात मानकर सिख कंट्रोल में रहते, लेकिन डेरा सच्चा सौदा के गुरु तो इस स्थिति में हैं कि वे अपने अनुयायियों को सड़क पर न उतरने और अमन बनाए रखने के लिए प्रेरित कर सकें। लेकिन लगता है, जैसे उनकी भी रुचि टकराव में ही है। वैसे भी डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी तमाम तरह के विवादों और अपनी हिंसक कार्रवाइयों के चलते पहले भी सुर्खियों में रहे हैं, लेकिन किसी धार्मिक पंथ का इस तरह से हिंसक कार्रवाइयों में हिस्सा लेना उसकी बुनियाद और शिक्षा पर प्रश्न चिह्न खड़ा करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह सिख धर्म के गुरुओं ने भी अपने अनुयायियों से कभी यह नहीं कहा कि मेरी नकल करने वालों को तुम मटियामेट कर दो। वे तो धार्मिक सहिष्णुता और मानवता का संदेश देने के लिए ही पूजे जाते हैं। तो फिर आखिर वह कौन-सा वीक पॉइंट है, जिसने दोनों धामिर्क घटकों को इस संघर्ष के लिए उत्प्रेरित किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौर करें, तो इस संघर्ष के दो ही कारण नजर आते हैं और वे हैं-- गुरुओं व धर्मों की घटती ताकत और नेताओं की अपने स्वार्थों को लेकर धर्म को हथियार बनाने की बढ़ती प्रवृति। और सच पूछिए तो इन्हीं दो बातों को ठीक कर भविष्य में इस तरह के टकराव को रोका जा सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-6271683680288487432?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/6271683680288487432/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=6271683680288487432' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/6271683680288487432'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/6271683680288487432'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2007/05/blog-post.html' title='धर्मों के बीच लड़ाई का क्या काम'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-770909906243947169</id><published>2007-03-29T21:08:00.000+05:30</published><updated>2007-03-29T21:11:08.482+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिट्ठे'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंटरनेट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी ब्लॉगर्स'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><title type='text'>ब्लॉगर्स के भरोसे नेट पर हिंदी</title><content type='html'>सरकारी बैसाखी पर भले ही भाषाएं फलती-फूलती हों, लेकिन साइबर स्पेस पर हिंदी ने आम लोगों की बदौलत अपने पैर पसारे हैं। और यहां आम लोग मौजूद हैं अपने-अपने ब्लॉग के साथ, जिन्हें यहां चिट्ठा नाम दिया गया है। जी हां, इंटरनेट पर मौजूद हिंदी कंटेट में सबसे बड़ा योगदान हिंदी में ब्लॉग लिखने वाले ब्लॉगरों का ही है, जिन्हें यहां चिट्ठाकार का नाम दिया गया है। ये चिट्ठाकार हर मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखते हैं, उसे दुनिया के साथ शेयर करते हैं, अपनी मन की भड़ास निकालते हैं, दूसरे ब्लॉगरों को दुलारते-पुचकारते हैं, उनकी खिंचाई करते हैं और जो सबसे बड़ी बात वे करते हैं, वह है हिंदी को समृद्ध करने की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये ब्लॉगर्स ही हैं, जिनकी बदौलत आज इंटरनेट पर हिंदी पहले की तरह दरिद्र नहीं है। हां, आपको अपेक्षित क्वॉलिटी वाली बात भले ही वहां नहीं मिले, लेकिन किसी भी चीज को सर्च करने पर खाली हाथ तो आप नहीं ही लौटेंगे। जाहिर है, यह 'कुछ नहीं' वाली स्थिति से तो बेहतर है ही। हिंदी ब्लॉगरों की दुनिया की एक बड़ी खासियत है, यहां के ब्लॉग्स के नाम। कुछ ब्लॉग्स के नाम तो इतने यूनीक हैं कि आप तुरंत उनके नाम का अर्थ जानने के लिए उत्सुक हो जाएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, हिंदी में ब्लॉगिंग का रास्ता इतना आसान भी नहीं रहा है। यह काम कितना कठिन रहा होगा, यह कोई उन लोगों से पूछे, जिन्होंने 'अभावों' के दिन में ब्लॉग लिखना शुरू किया था। तब स्थिति 'खुद लिखकर खुद ही पढ़ने' वाली थी, क्योंकि कोई सर्च इंजन हिंदी ब्लॉग को ढूंढकर पाठक तक पहुंचा नहीं पाता था। ऐसे में विश्व भर में फैले हिंदी प्रेमी भारतीयों, जिनमें आईटी सेक्टर से जुड़े लोगों की संख्या ज्यादा है, ने एक ऐसा प्लेटफॉर्म डिवेलप करने की पुरजोर कोशिश की, जहां हिंदी के तमाम पोस्टों को जमा किया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुरुआती लड़खड़ाहट के बाद हिंदी की ब्लॉग यात्रा एक ऐसे ही प्लेटफॉर्म 'नारद' को डिवेलप करने के बाद संभलती चली गई। इसने उन तमाम कठिनाइयों को खत्म करने की कोशिश की, जो नेट पर हिंदी के आगे बढ़ने में बाधा खड़ी कर रही थी। मसलन, इसने नए ब्लॉगरों को तकनीकी सहायता उपलब्ध करवाने के साथ-साथ विश्व भर के हिंदी ब्लॉगरों को एक प्लेटफॉर्म पर लाने के कोशिश की, ताकि लोगों को हिंदी के ब्लॉग पढ़ने के लिए साइबर स्पेस में यूं ही भटकना नहीं पड़े। जाहिर है, हिंदी ब्लॉग को आज की स्थिति में पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को जाता है, तो वह 'नारद' ही है। वास्तव में, यह एक ब्लॉग एग्रीगेटर साइट है, जो तमाम हिंदी ब्लॉगों की फीड का उपयोग कर उनकी पोस्ट एक जगह दिखाती है। जाहिर है, अगर कोई अनजान व्यक्ति हिंदी के ब्लॉग्स पढ़ना चाहता है, तो उसके लिए 'नारद' पर जाने से बढ़िया विकल्प कुछ भी नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलचस्प बात यह है कि इसका कोई व्यावसायिक स्वार्थ नहीं है और यह मूल रूप से चंद ऐसे हिंदी प्रेमी भारतीयों की मेहनत का नतीजा है, जो भारत ही नहीं, भारत से बाहर रहकर भी अपनी मिट्टी से जुड़े हुए हैं। वास्तव में इन लोगों ने तन, मन, धन से हिंदी के विकास के लिए काम किया है और वह भी नि:स्वार्थ भाव से। यह हिंदी को लेकर लोगों की दीवानगी ही है कि विश्व के अलग-अलग जगहों पर रहने के बावजूद 'नारद' के शुरुआती कर्ताधर्ता रहे यूएसए बेस्ड पंकज नरूला व कुवैत बेस्ड जितेंद्र चौधरी ने इतना बड़ा प्लेटफॉर्म विकसित किया। फिर इसे मजबूत करने में देबाशीष सहित कम से कम आठ लोग और हैं, जो अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं और हिंदी ब्लॉगरों की किसी भी समस्या के समाधान के लिए तैयार रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, हिंदी ब्लॉगरों के सामने सबसे बड़ी समस्या तकनीक की ही है, क्योंकि अभी हिंदी में काम करने में सहायक सॉफ्टवेयर्स की पहुंच हर जगह नहीं हुई है और फिर यहां सारा काम यूनीकोड के भरोसे है। लेकिन अच्छी बात यह है कि अगर आप ब्लॉर्ग्स की इस दुनिया में जाकर अपनी समस्या बताएं, तो एक साथ कई हाथ आपकी मदद में आगे आ जाएंगे। जाहिर है, यह सब यहां संभव हुआ है उन लोगों के भरोसे, जिन्हें दूसरे की मदद में मजा आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कोई शक नहीं कि साइबर स्पेस में हिंदी की पैठ लगातार बढ़ती जा रही है और इसका सबसे बड़ा प्रमाण है ब्लॉग्स और इनके पाठकों की बढ़ती संख्या। सिर्फ नारद पर एक हफ्ते में औसतन छह हजार लोग आते हैं और यहां लगभग छह सौ ब्लॉग्स सक्रिय हैं, जिसमें हर तरह के ब्लॉग्स शामिल हैं। इसे देखकर आप कह सकते हैं कि आज हिंदी ब्लॉग जगत हर तरह से परिपूर्ण है। यहां ह्यूमर है, साहित्य है, रोजमर्रा की घटनाओं पर बहस है, सामाजिक-राजनीतिक चर्चा है, देश के हर क्षेत्र की खबर है और जो सबसे बड़ी बात है, वह है कि यहां हिंदी का एक बड़ा संसार है, जिसमें दुनिया भर में फैले हिंदी जानने वाले लोग हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलचस्प बात यह है कि हिंदी ब्लॉग जगत में हर साल अवॉर्ड भी दिए जाते हैं। ऐसे ही एक 'इंडीब्लॉगिज अवॉर्ड' में इस साल सर्वश्रेष्ठ हिंदी ब्लॉगर का खिताब जीता है कनाडा बेस्ड समीर लाल ने। यानी हिंदी सही मायने में ग्लोबल लैंग्वेज है, कम से कम हिंदी ब्लॉग जगत को देखकर तो आप यह कह ही सकते हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभारः नवभारत टाइम्स&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-770909906243947169?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/770909906243947169/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=770909906243947169' title='26 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/770909906243947169'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/770909906243947169'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2007/03/blog-post_2935.html' title='ब्लॉगर्स के भरोसे नेट पर हिंदी'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>26</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-7411236368900283901</id><published>2007-03-29T15:49:00.000+05:30</published><updated>2007-03-29T15:58:00.970+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीम इंडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्रिकेट वर्ल्ड कप'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्रिकेट'/><title type='text'>अब लीजिए असली वर्ल्ड कप का मजा!!</title><content type='html'>टीम इंडिया वर्ल्ड कप से बाहर हो गई तो क्या आप मैच देखना छोड़ देंगे? जी नहीं, ऐसा मत कीजिए। अब हर मैच दूसरे से बढ़िया होगा। क्रिकेट के शौकीनों के लिए अब वाकई दिलचस्प स्थिति है। अब महज भारतीय टीम के चौके-छक्के चाहने वालों के लिए बेशक कुछ न हो लेकिन क्रिकेट के सच्चे प्रेमियों के लिए वाकई बहुत कुछ है। फिर भारतीय टीम नहीं है तो कोई टेंशन भी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिकेट खासकर वन डे क्रिकेट की खूबसूरती उसकी अनिश्चितता में है। यह जितना अनिश्चित होगा, गेम उतना ही दिलचस्प होगा। याद कीजिए वे दर्जनों मैच जिनमें आखिरी समय तक यह पता नहीं लग रहा था कि जीतेगा कौन। याद कीजिए ऑस्ट्रेलिया और साउथ अफ्रीका का वह ऐतिहासिक मैच जिसमें 434 का वर्ल्ड स्कोर महज साढ़े तीन घंटे तक ही रहा और कहीं कमजोर माने जाने वाली साउथ अफ्रीकी टीम ने वह मैच कैसे जीत लिया। याद है वह सीरीज जिसमें न्यूजीलैंड ने ऑस्ट्रेलिया के छक्के छुड़ा दिए थे। और इसी वर्ल्ड कप का वह मैच याद कीजिए जिसमें बिल्कुल नई टीम ने पाकिस्तान की धुरंधर टीम को पटकनी दे दी। यही तो है क्रिकेट की शानदार अनिश्चितताएं जिसमें अगले पल के बारे में कोई कुछ नहीं बात सकता। यह उन तमाम दूसरे खेलों से अलग है जहां आप पक्के तौर पर कुछ कह सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी वर्ल्ड कप में कई ऐसे नए खिलाड़ी दिखे जिन्होंने अपने खेल से समां बांध दिया। देखने वाले उन्हें देखते रह गए। कई अनजान खिलाड़ी अपनी प्रतिबद्धता से खेल को समृद्ब कर गए। नई टीमों के कई खिलाड़ियों ने शानदार करतब दिखाए। और अब तो बिसात बिछ चुकी है। कई रिकॉर्ड बनेंगे, कई खिलाड़ियों के कारनामे देखने को मिलेंगे और कुछ मैच ऐसे भी होंगे जिनमें आपको दांतों तले उंगली दबानी पड़ सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो बस भूल जाइए टीम इंडिया को और आनंद लीजिए इस वर्ल्ड कप के शानदार मैचों का।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-7411236368900283901?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/7411236368900283901/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=7411236368900283901' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/7411236368900283901'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/7411236368900283901'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2007/03/blog-post_29.html' title='अब लीजिए असली वर्ल्ड कप का मजा!!'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-117413651669281061</id><published>2007-03-17T19:22:00.000+05:30</published><updated>2007-03-17T19:31:56.706+05:30</updated><title type='text'>लाजवाब कार्टून!!!</title><content type='html'>&lt;div align="right"&gt;&lt;a href="http://photos1.blogger.com/x/blogger/5446/1726/1600/677912/cartoon.jpg"&gt;&lt;img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/x/blogger/5446/1726/320/599026/cartoon.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;साभारः हिंदुस्तान&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-117413651669281061?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/117413651669281061/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=117413651669281061' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/117413651669281061'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/117413651669281061'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2007/03/blog-post.html' title='लाजवाब कार्टून!!!'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-116757964142162807</id><published>2006-12-31T21:08:00.000+05:30</published><updated>2006-12-31T21:18:06.780+05:30</updated><title type='text'>नव वर्ष मंगलमय हो!!!</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;आप सभी को नव वर्ष 2007 की हार्दिक शुभकामनाएं&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-116757964142162807?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/116757964142162807/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=116757964142162807' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116757964142162807'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116757964142162807'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/12/blog-post_31.html' title='नव वर्ष मंगलमय हो!!!'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-116740092095670884</id><published>2006-12-29T18:51:00.000+05:30</published><updated>2006-12-29T19:32:01.060+05:30</updated><title type='text'>ऊफ ये हिंदी!!!</title><content type='html'>अब जरा इन कुछ चर्चित अंग्रेजी शब्दों के हिंदी अर्थों पर गौर फरमाए. अगर कहीं आम बोलचाल में  इन्हें बोलना पड़ जाए तो....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;Cricket&lt;/span&gt;  &lt;/strong&gt;                          &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;गोल गुत्तम लकड़ बट्टम दे दनादन प्रतियोगिता&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;Cricket Test Match&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;      &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;पकड़ डंडू मार मंडू दे दनादन प्रतियोगिता&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;Table Tennis&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;                &lt;span style="color:#ff0000;"&gt; अष्ठकोणी काष्ठ फ़लक पे ले टकाटक दे टकाटक&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;Lawn Tennis&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;                 &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;हरित घास पर ले तड़ातड़ दे तड़ातड़&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;Light bulb&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;                    &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;विद्युत प्रकाशित कांच गोलक&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;Tie&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;                                   &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कंठ लगोट&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;Match Box&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;                    &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;अग्नि उत्पादन पेटी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;Traffic Signal&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;              &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;आवन जावन सूचक झंडा&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;Tea&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;                                 &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;दुग्ध जल मिश्रित शर्करा युक्त पर्वतीय बूटी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;Train&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;                              &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सहस्त्र चक्र लौह पथ गामिनी/अग्नि रथ&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;All Route Pass&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;              &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;यत्र तत्र सर्वत्र गमन आज्ञा पत्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;Railway Station&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;           &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;अग्नि रथ विराम स्थल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;Button (In clothes)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;    &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;अस्त व्यस्त वस्त्र नियंत्रक&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;Mosquito &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;                      &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;गुंजनहारी मानव रक्त पिपासु जीव&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;Cigarette&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;                       &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;धूम्र शलाका&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-116740092095670884?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/116740092095670884/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=116740092095670884' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116740092095670884'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116740092095670884'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/12/blog-post_29.html' title='ऊफ ये हिंदी!!!'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-116688095398506000</id><published>2006-12-23T19:01:00.000+05:30</published><updated>2006-12-23T19:05:54.003+05:30</updated><title type='text'>Merry Christmas!!!!</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/x/blogger/5446/1726/1600/859337/image002.gif"&gt;&lt;img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/x/blogger/5446/1726/320/605281/image002.png" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-116688095398506000?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/116688095398506000/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=116688095398506000' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116688095398506000'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116688095398506000'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/12/merry-christmas.html' title='Merry Christmas!!!!'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-116576007298742913</id><published>2006-12-10T18:13:00.000+05:30</published><updated>2006-12-11T09:04:42.816+05:30</updated><title type='text'>मानवाधिकार दिवस</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/x/blogger/5446/1726/1600/977195/human-rights.jpg"&gt;&lt;img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/x/blogger/5446/1726/320/366826/human-rights.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;10 दिसंबर यानी मानवाधिकार दिवस। "मानवाधिकारों" को लेकर अक्सर विवाद बना रहता है। ये समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि क्या वाकई में मानवाधिकारों की सार्थकता है। अबू गरीब जेल जैसे कांड जब सुनने में आते हैं तो मानवाधिकारों की बात करना सही प्रतीत होता है। जेल में कैदियों के साथ जिस तरह का अमानवीय व्यवहार किया जाता है या किसी भी वजह से मनुष्य के हितों की अनदेखी होती है तो यकीनन उसे सही नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे में मानव अधिकारों की बात करना सही लगता है, लेकिन वहीं दूसरी और जब मानवाधिकारों की दुहाई देकर अफजल गुरु जैसे आतंकवादियों को माफ करने की बात कही जाती है तो मानवाधिकार जैसी बाते निरर्थक लगती है। विरोधाभास तो है ही लेकिन कहीं न कहीं मानव का हित साधना ही परम उद्देश्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कुछ नजर मानवाधिकारों के इतिहास पर भीः-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कब और कैसे?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पहली बार १० दिसंबर, १९४८ में सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा स्वीकार की थी। १९५० से महासभा ने सभी देशों को इसकी शुरुआत के लिए आमंत्रित किया।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन को मानवाधिकारों की रक्षा और उसे बढ़ावा देने के लिए तय किया&lt;br /&gt;संयुक्त राष्ट्र ने २००५-०७ तक का समय प्राइमरी और सेकेंडरी स्कूलों में मानवाधिकार शिक्षा के लिए मुकर्रर किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या है 'मानव अधिकार'&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी इंसान की जिंदगी, आजादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार है मानवाधिकार है। भारतीय संविधान इस अधिकार की न सिर्फ गारंटी देता है, बल्कि इसे तोड़ने वाले को अदालत सजा देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भारत में&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में २८ सिंतबर, १९९३ से मानव अधिकार कानून अमल में आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१२ अक्तूबर, १९९३ में सरकार ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आयोग के कार्यक्षेत्र में&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नागरिक और राजनीतिक के साथ आर्थिक , सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार भी आते हैं। जैसे बाल मजदूरी, एचआईवी/एड्स, स्वास्थ्य, भोजन, बाल विवाह, महिला अधिकार, हिरासत और मुठभेड़ में होने वाली मौत, अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकार।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-116576007298742913?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/116576007298742913/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=116576007298742913' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116576007298742913'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116576007298742913'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/12/blog-post.html' title='मानवाधिकार दिवस'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-116359749182394275</id><published>2006-11-15T18:56:00.000+05:30</published><updated>2006-11-15T19:01:31.866+05:30</updated><title type='text'>कहीं कहानियों में न सिमट जाए सर्कस</title><content type='html'>सूचना क्रांति के इस दौर ने भले ही विकास के नए आयाम दिखाए हैं लेकिन सर्कस उद्योग पर इसकी गहरी मार पड़ी है और मनोरंजन के इस बरसों पुराने आकर्षण का भविष्य अंधकारमय है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक समय था जब सर्कस का दल किसी शहर में पहुंचता था तो शहर में धूम मच जाती थी. आज यह सब सपने जैसा लगता है क्योंकि अब तो सर्कस का मेला कब लग कर चला जाता है किसी को पता ही नहीं चलता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों के पास सर्कस के लिए समय ही नहीं है. जिनके पास समय है वे अपने अपने घरों में बैठ कर टीवी देखना कंप्यूटर पर गेम खेलना पसंद करते हैं. सर्कस के मुख्य आकर्षण जानवर होते हुआ करते थे. लेकिन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के चलते सर्कस में जानवरों के इस्तेमाल पर रोक लग गई और धीरे-धीरे इनका आकर्षण भी खत्म हो गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूचना क्रांति के इस युग में सर्कस जैसे पारंपरिक मनोरंजन के साधनों का भविष्य अंधकारमय है और संभव है कि आने वाले समय में मनोरंजन के इस साधन का अस्तित्व ही न रहे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-116359749182394275?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/116359749182394275/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=116359749182394275' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116359749182394275'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116359749182394275'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/11/blog-post_15.html' title='कहीं कहानियों में न सिमट जाए सर्कस'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-116298917091553692</id><published>2006-11-08T17:56:00.000+05:30</published><updated>2006-11-08T18:02:51.156+05:30</updated><title type='text'>साइबर नेटवर्किंग का बढ़ता नशा</title><content type='html'>राकेश के लिए यह समय सेलिब्रेट करने का है। आखिर ऑरकुट पर उन्हें अपने मित्रों की वह पूरी टोली मिल गई, जिससे वह पंद्रह साल पहले हाई स्कूल छोड़ने के बाद बिछुड़ गए थे। आज उनका कोई दोस्त स्वीडन में रह रहा है, तो कोई फिनलैंड तो कोई रांची में, लेकिन अब वे हर रोज मिलते हैं और अपनी बातें शेयर करने व एक-दूसरे की टांग भी खींचने जैसी मस्ती करते रहते हैं। साइबर स्पेस उनके लिए उनके स्कूल के दिनों का खेल का मैदान हो गया है, जहां सब मिलते हैं और पूरी मस्ती करते हैं। अपने हाई स्कूल के नाम पर उनकी कम्यूनिटी है और इसकी बदौलत उनके पूरी तरह खत्म हो गए संबंधों को एक नया जीवन मिला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच तो यह है कि राकेश जैसे लोगों की संख्या अपने देश में तेजी से बढ़ रही है, जो ऑनलाइन सोशल नेटवर्किंग जैसे कॉन्सेप्ट के दीवाने हैं। साइबर स्पेस दोस्तों को तलाशने और पुरानी दोस्ती को फिर से जीवित करने की जगह ही नहीं बन रही है, बल्कि इस पर अंतरंग संबंधों की भी एक वर्चुअल दुनिया तैयार हो रही है। अब सिंगल्स इसके जरिए साथी की तलाश कर रहे हैं, तो यह एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स का माध्यम भी बनता जा रहा है। हाल ही में जारी एक रिपोर्ट से इसके साफ संकेत मिलते हैं कि भारत में इंटरनेट इंफिडेलिटी बड़े पैमाने पर अपने पैर पसार रही है और ट्रेडिशनल रिलेशनशिप की जगह अब साइबर रिलेशनशिप का चलन तेजी पकड़ सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, दोस्ती की वर्चुअल दुनिया बनने के साथ-साथ, बहुत से लोगों के लिए साइबर स्पेस मैरिज और संबंधों में आ गए ठहराव व बोरियत से उबरने का एक बेहतर माध्यम भी है। गायत्री चंद्रा इंटरनेट की एडिक्ट हैं। वह बहुत से ऑनलाइन कम्यूनिटीज की सदस्य है। वह कहती हैं, 'मुझे महसूस हुआ कि बहुत से मुद्दे ऐसे हैं, जिनके बारे में मैं अपने पति से बात नहीं कर सकती। इसलिए मैंने बात करने के लिए ऑनलाइन फ्रेंड्स का सहारा लिया। आज मैं बहुत से लोगों के बेहद करीब हूं और उनसे मेरी रोज ऑनलाइन बात होती है। मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं उनसे बिना बात किए रह ही नहीं सकती। मेरा एक ऑनलाइन फ्रेंड तो मेरे बारे में मेरे पति से भी बेहतर जानता है। बावजूद इसके, सच यही है कि उसके साथ मेरे संबंध वर्चुअल स्पेस में ही हैं और मैं उन्हें ऐसे ही रहने देना चाहती हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साइबर स्पेस पर पनपते संबंधों के बारे में काउंसिलर प्राची गुप्ता कहती हैं, 'ऐसे संबंध इतने गहरे बन सकते हैं कि आप उन्हें अवॉइड नहीं कर सके। कई मामलों में तो यह भावनात्मक संबंधों और सेक्सुअल रिलेशनशिप में भी बदल सकते हैं। ऐसे संबंध आसानी से एडिक्शन का रूप ले लेते हैं। ऐसे में साइबर स्पेस में संबंधों का जाल फैलाने से पहले थोड़ी सतर्कता से उसकी परिणति के बारे में भी सोच लें।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, ऐसे साइट्स सिर्फ पर्सनल रिलेशंस को ही मजबूती नहीं दे रहे, बल्कि जानकारी, नौकरी और बिजनेस के भी नए दरवाजे खोल रहे हैं। एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि ऐसी साइटों पर बने कम्यूनिटीज ने लोगों को अपनी जरूरत के लोगों को तलाशने में मदद की है, फिर चाहे वह बिजनेस की बात हो या फिर नई-नई जानकारियां जुटाने की। राहुल सिंह एक ऐसे कम्यूनिटी के सदस्य हैं, जो इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का बिजनेस करने वाले युवाओं का है। इस कम्यूनिटी से जुड़ना उनके लिए इतना फायदेमंद रहा है कि वह इसके दीवाने हैं। यहां उन्हें ऐसे युवाओं से बातें शेयर करने का मौका मिला, जिन्होंने काफी स्ट्रगल के बाद इस क्षेत्र में अपने आपको स्थापित किया है। वह रोज उन अनुभवी लोगों के संपर्क में रहते हैं और उनके सलाह पर उन्होंने अपने बिजनेस में खासा प्रगति की है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राहुल भले ही सोशल नेटवर्किंग साइट्स के दीवाने हैं, लेकिन इसके आलोचकों की भी संख्या कम नहीं। एक एमएनसी में की पोस्ट पर काम करने वाली राखी सिंह कहती हैं, 'मैं तो इन सबसे परेशान हूं। हमारे यहां स्टाफ ऑफिस का ज्यादातर समय काम करने के बजाय इन्हीं साइटों को सर्फ करते रहते हैं। यह मुफ्त में लोगों का काफी समय खा रहा है, ऐसा समय, जिसे आप अपनी बेहतरी में लगा सकते हैं। मुझे नहीं लगता कि यह जानकारियों का खजाना है। अगर मुझे किसी जगह या चीज की जानकारी चाहिए होगी, तो मैं शायद ही किसी मित्र से पूछूंगी, क्योंकि जब तक वह मुझे उसके बारे में ई-मेल करेगा, तब तक गुगल जैसे सर्च इंजनों के सहारे मैं सारी जानकारियां जुटा लुंगी।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, भले ही हर किसी की मान्यता ऐसी साइटों को लेकर अलग-अलग हों, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इनके प्रति लोगों की दीवानगी लगातार बढ़ रही है और भविष्य में ऐसी साइटों की बाढ़ आने वाली है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(एनबीटी में प्रकाशित लेख)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-116298917091553692?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/116298917091553692/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=116298917091553692' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116298917091553692'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116298917091553692'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/11/blog-post_08.html' title='साइबर नेटवर्किंग का बढ़ता नशा'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-116255962539869308</id><published>2006-11-03T18:39:00.000+05:30</published><updated>2006-11-03T18:43:45.416+05:30</updated><title type='text'>टू मच क्रिकेट ने किया बोर</title><content type='html'>लगता है टू मच क्रिकेट से लोग बोर हो गए हैं। इसका अंदाजा चैंपियंस ट्रॉफी के दौरान सूने पड़े मैदानों से लगाया जा सकता है। पूरे साल क्रिकेट ही क्रिकेट ने वन डे का चार्म खत्म कर डाला है। कहते हैं हर चीज अपनी ही सीमा में अच्छी लगती है। क्रिकेट में पैसों की बौछार ने दुनिया की सभी टीमों को इतना व्यस्त कर डाला है कि लोग रोज-रोज वही चेहरे देखते-देखते अब ऊब गए हैं। मिनी वर्ल्ड कप मानी जाने वाली चैंपियंस ट्रॉफी में दुनिया के धुरंधर खिलाड़ियों के होने के बावजूद जो जुनून क्रिकेट के इस दीवाने देश में होना चाहिए था वह नदारद रहा। दर्शकों के मैदान पर न होने के कई कारण हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो लोग मैदान में नजर नहीं आते वे घर पर टीवी पर मैच का मजा लेते हैं। बड़े स्क्रीन के आ जाने पर अब मैदान में जाने से लोग कतराते हैं और घर पर बैठ कर ही इसका मजा लेना बेहतर समझते हैं। बड़ी वजह टीम इंडिया के घटिया प्रदर्शन की भी है। क्रिकेट फैन्स जिन खिलाड़ियों को अपने पलकों पर बैठाते थे और जिन्हें गॉड मानते थे उनके प्रति अब वह श्रद्धा खत्म हो गई है। लगातार फ्लॉप शो के बाद जिन्हें हम अपना हीरो मानते थे अब वे जीरो बन गए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चैंपियंस ट्रॉफी का आयोजन ऐसे समय रखा गया जब कई त्यौहार एक साथ आए जैसे दशहरा, दीपावली और ईद। मौसम के हिसाब से भी यह समय ठीक नहीं है। इस सीजन में कई बीमारियों भी होती हैं जिस कारण कई लोग मैच नहीं देख पाते। टीम इंडिया में अच्छे ऑलराउंडर्स की कमी ने भी पकवान फीका बना डाला है। पहले जैसा थ्रिल लोगों को देखने को नहीं मिल रहा। पहले कई ऐसे करामाती ऑलराउंडर्स रहते थे जो मैच को अपनी झोली में डाल लेते थे। क्रिकेट का माहौल बनाने वाली फाइटिंग स्प्रिट की कमी महसूस की जा रही है हमारी टीम में। बॉलिंग पिचों ने ताबड़तोड़ बैटिंग का मजा ही खत्म कर डाला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों की व्यस्तता भी एक कारण है। लोग अपने-अपने कामकाज में इतने बिजी हैं कि क्रिकेट के लिए टाइम ही नहीं निकाल पाते। महंगी टिकटें भी दर्शकों को मैदान से दूर रख रही हैं। फिर मैच देखने जाओ तो कई तरह का सामना करना पड़ता है। लम्बी-लम्बी कतारों में लगना और कड़े सुरक्षा बंदोबस्त के बीच कई तरह के टेस्ट में से गुजरना पड़ता है। कई बार डंडे भी खाने पड़ते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह पहली बार नहीं हो रहा है अभी तक हुए पहले चार आयोजन भी दर्शकों के लिहाज से फीके रहे। आईसीसी को इस और ध्यान देना होगा ताकि यह मिनी वर्ल्ड कप दर्शकों को अपनी ओर खींच सके।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-116255962539869308?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/116255962539869308/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=116255962539869308' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116255962539869308'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116255962539869308'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/11/blog-post.html' title='टू मच क्रिकेट ने किया बोर'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-116202892558648735</id><published>2006-10-28T15:15:00.000+05:30</published><updated>2006-11-02T14:53:32.923+05:30</updated><title type='text'>छठ की छटा अनूठी</title><content type='html'>छठ पर्व प्रकृति पूजा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। सूर्य देव की यह पूजा दीवाली से छह दिनों तक चलती है। जातपांत के बंधन से परे इस पर्व की सबसे बड़ी बात यह है कि सूर्य पूजन के लिए किसी पंडित की आवश्यकता भी नहीं होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पूजा में बांस के बने बर्तनों में ठेकुआ, भुसवा, फल, मिठाई आदि भर कर नदी या सरोवर के जल में स्नान कर और उसी में खड़े हो डूबते और उगते समय को अर्ध्य अर्पित किया जाता है। छठ व्रत का विधिवत शुभारंभ नहाय खाय से हो जाता है और सप्तमी पारण मोरका अर्ध्य तक चलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले पंचमी को दिन भर व्रत रख कर रात में गुड़ रसिया यानी गुड़ और चावल का प्रसाद बनाकर व्रतकटी खाती हैं। इसके बाद बिना अन्न जल सप्तमी तक व्रत में रहती हैं। इसमें पेड़ सहित हल्दी, ईख, अदरक, शकरकंद आदि का प्रयोग प्रसाद के रूप में होता है। पूजा के दौरान हाथी, कुरबार कलश, चौमुख दीप, आरतपात वगैरह का विशेष महत्व होता है। सप्तमी के दिन सुबह में गाय के दूध से उगते सूरज को अर्ध्य देकर भगवान भास्कर की पूजा करते हैं। कहते हैं छठ रोगनाशक पर्व है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छठ पर्व के अवसर पर सफाई और गीतों का भी खास महत्व है। इन दिनों आप बिहार और यूपी में अगर निकल जाएं तो वे शहर और कस्बे भी साफ मिलेंगे जहां हरदम गंदी पसरी रहती है। छोटी-बड़ी गलियां हों या सड़कें, लोग बाग नगर पालिका या नगर निगम का इंतजार न कर खुद बिना किसी शिकायत के सफाई करते हैं। शहर और कस्बे तो दुल्हन की तरह सज जाते हैं। साफ सुथरी और सजी-धजी सड़कों पर झुंड के झुंड महिलाएं गीत गाती चलती हैं तो छठ की छटा देखने लायक होती है।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/170153.cms"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;(छठ पर्व के बारे में और जाने)&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-116202892558648735?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/116202892558648735/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=116202892558648735' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116202892558648735'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116202892558648735'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/10/blog-post_28.html' title='छठ की छटा अनूठी'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-116136209702980941</id><published>2006-10-20T22:00:00.000+05:30</published><updated>2006-10-20T22:04:57.823+05:30</updated><title type='text'>शुभ दीपावली!</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/5446/1726/1600/11.jpg"&gt;&lt;img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/5446/1726/320/11.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt; &lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!!!&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-116136209702980941?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/116136209702980941/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=116136209702980941' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116136209702980941'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116136209702980941'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/10/blog-post_20.html' title='शुभ दीपावली!'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-116127049352987593</id><published>2006-10-19T20:34:00.000+05:30</published><updated>2006-10-19T20:38:16.083+05:30</updated><title type='text'>पटाखे जलाएं, डेंगू भगाएं</title><content type='html'>जी हां, जब से पटाखों और आतिशबाजी पर प्रतिबंध लगाया गया है, तब से मलेरिया जैसी बीमारियों का आतंक कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है. कुछ साल पहले तक किसी ने डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के बारे में सुना तक नहीं था. और अब हालात ये हैं कि घर-बाहर हर जगह मच्छरों का आतंक फैला है. लेकिन जब से प्रदूषण नियंत्रण के लिए उपाय किए जाने लगे, पटाखों से फैलने वाले प्रदूषण और आतिशबाजी के नुकसान के बारे में अभियान चलाया जाने लगा है तभी से मच्छरों की चांदी हो गई है. लोगों का जमकर खून चूस रहे हैं और दिन-रात अपनी संख्या बढ़ा रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समस्या यह है कि इनसे छुटकारा पाने के लिए किए जाने वाले पारंपरिक उपाय आजकल के एडवांस कल्चर से मेल नहीं खाते. कुछ साल पहले तक मानसून के बाद घरों को सीलनमुक्त करने और मक्खी-मच्छरों से बचाने के लिए त्योहारी सीजन में रंगाई-पुताई कराई जाती थी. इसके लिए चुना, सफेदी का उपयोग किया जाता था पर अब इसकी जगह प्लास्टिक पेंट और डिस्टेंपर ने ले ली है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, घर के बाहर हरियाली और पेड़-पौधें देखने के लिए तरसने वाले महानगर निवासी घर में पेड़-पौधों को लगाकर इस कमी को पूरा करते हैं. उनके बेडरुम में भी आपको विभिन्न तरह के पेड़ पौधे देखने को मिल जाएंगे. अब आप यह भी कह सकते हैं कि हम खुद ही डेंगू के पनपने के लिए घरों में जंगल तैयार कर रहे हैं. घरों में लगाए जाने वाले छोटे-छोटे पौधे मच्छरों को पनपने के लिए उपयुक्त माहौल प्रदान कर रहे है. वहीं दूसरी ओर, घर-घर में एयरकंडीशनर और कूलर की मौजूदगी ने हम इंसानों की ही नहीं बल्कि मच्छरों की जिंदगी भी सुकूनभरी बनी दी है और अब ये हमारे स्थायी साथी बन गए हैं जो समय-समय पर किसी न किसी “अवतार” (मलेरिया, डेंगू, चिकगुनिया) में अपनी मौजूदी दर्शाते रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अब क्या?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रदूषण नियंत्रण के सीमित और सुरक्षित उपायों के बारे में पुनर्विचार किया जाना जरुरी है. ऐसी समस्याओं से निपटने के लिए कुछ हद तक प्रदूषण भी जरुरी हैं. शहरों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए सीएनजी के प्रयोग को जरुरी करने से दिल्ली की हवा में प्रदूषण में तो कमी आई है. लेकिन यह भी ध्यान देने योग्य है कि पिछले कुछ सालों में ही मच्छरों से होने वाली घातक बीमारियों का भी जन्म हुआ है. पिछले कुछ सालों में घरों में चुल्हा और अँगीठी का प्रयोग भी बहुत कम हो गया है और इसकी जगह एलपीजी ने ले ली है. चुल्हे और अँगीठी का धुंआ बंद होने से भी मच्छरों को घरों में घुसपैठ करने का भरपूर मौका मिला है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रदूषण के उपायों के साथ-साथ इन समस्याओं पर भी गौर किया जाना चाहिए और इसके बारे में अध्ययन होना चाहिए. शहरों में हरियाली को बढ़ाने के उपाए होने चाहिए. बगीचों, पार्कों और जंगलों का विकास किया जाना चाहिए. लेकिन घरों में ऐसे पेड़-पौधों को उगाने से बचना चाहिए जिनमें रोज पानी देना पड़ता है. अगर पेड़-पौधों घरों में लगाने ही हैं तो फन्स, कैक्टस और मॉस्किटो रेप्लेंट यानी मच्छर भगाने वाले औषधीय पौधों जैसे तुलसी को घर में लगाएं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घरों में हर साल साफ-सफाई और चुना-मिट्टी से रंगाई-पुताई जारी रखी जाए. इसमें किसी तरह की शर्म या पिछड़ापन महसूस करने की जरुरत नहीं हैं. ये ध्यान रखें कि भारत एक उष्णकटीबंधीय देश है. हमारे देश की जलवायु और वातावरण यूरोप और अमेरिका से बिल्कुल अलग है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो भूल जाइए एक्सपर्ट की राय. इस दिवाली खूब पटाखें जलाएं और आतिशबाजी का मजा लें. बिजली के दीयों से घर को रोशन करने की बजाए तेल और घी के दीपक जलाएं और रोशनी के इस पर्व का आनंद लें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://www.mediabharti.com/18-10-variety-1.htm"&gt;(लेख का आइडिया यहां से लिया)&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-116127049352987593?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/116127049352987593/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=116127049352987593' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116127049352987593'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/116127049352987593'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/10/blog-post_19.html' title='पटाखे जलाएं, डेंगू भगाएं'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-115987921393589095</id><published>2006-10-03T17:55:00.000+05:30</published><updated>2006-10-03T18:10:14.873+05:30</updated><title type='text'>अपनी भी साइट हैक हुई याहूज हैकर्स डे पर</title><content type='html'>लीजिए जनाब याहू के पब्लिक “हैक डे” (&lt;a href="http://www.ibnlive.com/news/yahoo-hackers-have-a-free-for-all/22972-11.html" target="_blank"&gt;खबर पढ़े&lt;/a&gt;) का आयोजन क्या किया किसी महाशय ने हमारी &lt;a href="http://mediabharti.com/phpBB/" target="_blank"&gt;अपनी साइट &lt;/a&gt;को हैक कर लिया. अपनी इसलिए क्योंकि इस साइट के परोक्ष रुप से ही सही पर हम जुड़े हुए हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात दरअसल ये है कि आज ऑफिस पहुंचते ही मेरे सहयोगी ने बताया कि किसी हैकर महाशय ने उनकी साइट के &lt;a href="http://mediabharti.com/phpBB/" target="_blank"&gt;फोरम&lt;/a&gt; को हैक कर लिया है. हैक करने वाले वाले महाशय कौन है इसके बारे में उनकी साइट पर जाने पर भी कुछ पता नहीं चल सका. साइट हैक करके महाशय अफगान का नक्शा चस्पा कर गए हैं और उनके बारे में जानकारी जुटाना इसलिए संभव नहीं हो सका कि उनकी साइट फारसी में है. हां, पर साइट विजिट करने पर ये आभास हुआ कि हैकर महोदय को फोरम से कुछ ज्यादा ही लगाव है और उन्होंने अलग-अलग साइटों के करीब 25-30 फोरम्स को निशाना बनाया है. हैक होने वाले सभी लिंक उनकी साइट पर &lt;a href="http://www.afghanhackers.com/forum/showthread.php?t=30" target="_blank"&gt;मौजूद हैं&lt;/a&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब परेशानी है कि मेरे सहयोगी को ये समझ नहीं आ रहा कि इस समस्या का निदान कैसे किया जाए. तकनीकी सहयोग के लिए सर्वर एडमिनस्ट्रेशन को संपर्क साध लिया है, पर सर्वर कंपनी हैदराबाद में होने के कारण वहां से मदद मिलने में देर होगी. इसलिए सभी तकनीकी जानकारों से मदद की अपेक्षा है. क्या किया जा सकता है इसके बारे में जो भी संभव हो बताए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-115987921393589095?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/115987921393589095/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=115987921393589095' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115987921393589095'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115987921393589095'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/10/blog-post.html' title='अपनी भी साइट हैक हुई याहूज हैकर्स डे पर'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-115884127586104027</id><published>2006-09-21T17:50:00.000+05:30</published><updated>2006-09-21T17:51:16.373+05:30</updated><title type='text'>खर्च करने में अव्वल दिल्लीवासी</title><content type='html'>दिलवालों के शहर दिल्ली के लोग खर्च करने के मामले में भी सबसे आगे हैं. देश के दूसरे शहरों के मुकाबले यहां के लोग ज्यादा खर्चीले हैं. यां यूं कहें कि यहां के लोग शॉपिंग के साथ-साथ दूसरी चीजों पर दिल खोल कर खर्च करते हैं. पिछले कुछ सालों के मुकाबले लोगों की आय में भी कुछ इजाफा हुआ है. हाल में जारी एक रिपोर्ट के आंकड़े कुछ ऐसे हैं:&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;शहरी इलाके में प्रति व्यक्ति मासिक व्यय लगातार बढ़ रहा है। शहरी क्षेत्र में राष्ट्रीय औसत मासिक व्यय १०६० के मुकाबले राजधानी में प्रति व्यक्ति महीने का खर्च १६०६ रुपये है। दिल्ली में २००३ में मासिक व्यय १५६३ रुपये था जो २००४ में बढ़कर १६०६ रुपये हो गया है।&lt;/li&gt;&lt;li&gt;शहरी इलाके के लोग प्रति महीना ३४ फीसदी खाद्य वस्तुओं पर खर्च करते हैं। दस फीसदी खर्च दूध और दूध से बने पदार्थों, सात प्रतिशत मोटे अनाज तथा दालों, दो प्रतिशत खाना पकाने के तेल, चार फीसदी सब्जियों व दो फीसदी फलों पर खर्च करते हैं&lt;/li&gt;&lt;li&gt;गुजरात में शहरी क्षेत्र में प्रति व्यक्ति मासिक व्यय १०९२, हरियाणा में १०५०, पंजाब में १०५९, तमिलनाडु में ११३१ रुपये, आंध्र प्रदेश में ११०२ रुपये, उत्तर प्रदेश में ८२७ रुपये, मध्य प्रदेश में ७९३ रुपये और बिहार में ७८४ रुपये है। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;दिल्ली में ३२.७५ लाख परिवार हैं। २.०३ लाख परिवार ग्रामीण इलाकों में और ३३.७२ लाख शहरी इलाकों में रहते हैं। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;सर्वेक्षण से पता चलता है कि ११ फीसदी परिवारों की मुखिया महिलाएं हैं। दिल्ली में महिलाओं की कुल जनसंख्या ६८.२५ लाख में से लगभग ४९ फीसदी यानी ३३ लाख महिलाएं शादीशुदा हैं। सात प्रतिशत यानी ४.८२ लाख विधवाएं और ०.४५ लाख महिलाएं तलाकशुदा हैं। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;परिवारों में रोजगार के लिहाज से ४७ प्रतिशत के पास नियमित वेतन व मजदूरी का रोजगार है। ३६ फीसदी परिवार स्वरोजगार वाले हैं। ४.८६ फीसदी परिवार मजदूर वर्ग के हैं। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;दिल्ली में ६६ प्रतिशत परिवार अपने घरों में, २६ प्रतिशत किराये के घरों में आठ फीसदी अन्य घरों में रहते हैं। ५९ फीसदी परिवारों के अपने अलग स्वतंत्र मकान है और २३ प्रतिशत फ्लैटों में, १८ फीसदी तंग बस्तियों में रहते हैं।&lt;/li&gt;&lt;li&gt;लगभग ९६ प्रतिशत के पास पक्के घर, तीन प्रतिशत के पास आधे पक्के मकान और एक प्रतिशत के पास कच्चे घर हैं। लगभग ८५ प्रतिशत परिवार खाना पकाने के लिए रसोई गैस का इस्तेमाल करते हैं जबकि बाकी मिट्टी के तेल पर निर्भर हैं।&lt;/li&gt;&lt;li&gt;२००४ के सर्वेक्षण के अनुसार दिल्ली के शहरी क्षेत्र में साक्षरता दर ८६ प्रतिशत है। राष्ट्रीय स्तर साक्षरता की दर ८२ फीसदी है। पुरुष साक्षरता दर ९१ फीसदी और महिलाओं की ८० फीसदी है। सर्वेक्षण से यह भी पता चला है कि कुल साक्षरों में से ३२ प्रतिशत प्राइमरी स्तर के, ३१ प्रतिशत मिडिल और माध्यमिक स्तर के, १३ प्रतिशत उच्चतर माध्यमिक स्तर के,१७ फीसदी स्नातक व पांच फीसदी स्नातकोत्तर या उससे ज्यादा पढ़े हैं। &lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-115884127586104027?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/115884127586104027/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=115884127586104027' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115884127586104027'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115884127586104027'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/09/blog-post_21.html' title='खर्च करने में अव्वल दिल्लीवासी'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-115868360067793186</id><published>2006-09-19T21:55:00.000+05:30</published><updated>2006-09-19T22:03:22.543+05:30</updated><title type='text'>कितने अजीब रिश्ते हैं यहां</title><content type='html'>किसी रिलेशन की शुरुआत जब होती है तो हर समय उस रिश्ते का अहसास हमें  घेरे रहता है. उसे पहले प्यार की खुमारी और न जाने क्या क्या कहा जाता है. कुछ को हंसी-हंसी में यहां तक कहते कि ये शुरुआती पागलपन होता है जो वक्त के साथ दूर हो जाता है. वाकई... वक्त बीतता है तो हंसी-मजाक हकीकत का रुप लेकर सामने होता है. ऐसे में सपने का सा अहसास देने वाले उस मीठे रिश्ते को वास्तविकता से रिलेट कर पाना आसान नहीं होता. तब शुरु होता है सच्चाई को स्वीकार कर पाने का असली सफर और रिश्ते की सही स्वरुप में जीने की असली परीक्षा. कुछ इस परीक्षा में खरे उतरते हैं तो कुछ रिश्तों के कठोर प्रश्नों के बीच उलझ कर रह जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितने अजीब रिश्ते हैं यहां पे.... दो पल मिलते हैं साथ-साथ चलते हैं, जब मोड़ आए तो बचके निकल हैं....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-115868360067793186?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/115868360067793186/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=115868360067793186' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115868360067793186'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115868360067793186'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/09/blog-post.html' title='कितने अजीब रिश्ते हैं यहां'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-115598849875714840</id><published>2006-08-19T17:23:00.000+05:30</published><updated>2006-08-19T17:24:59.086+05:30</updated><title type='text'>साबुन या आरडीएक्स</title><content type='html'>मुंबई के डॉक्टर खालिद ठाकुर के साथ बुरी बीती। और यह सब कुछ हुआ पांच किलो काले साबुन के कारण। डॉ. खालिद मुंब्रा मुंबई में रहते हैं और वहीं उनका क्लीनिक भी है। वह दांतों के डॉक्टर हैं। गत १३ अगस्त को वह अपनी मारुति कार में घरेलू सामान लेने अपने किरयाना दुकानदार के पास गए तो उन्हें सपने में भी ख्याल नहीं था कि वह कितनी बड़ी मुसीबत मोल ले रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन उनकी पत्नी ने उन्हें घर के सामान की एक लंबी लिस्ट थमा दी थी। उन्होंने सारा सामान अपनी कार में लादा और घर लौट आए। सारा सामान तो उतार दिया गया पर पांच किलो कपड़े धोने का साबुन कार की डिक्की में ही भूल गए। फिर वह अपनी कार सर्विस सेंटर पर सर्विस के लिए दे आए। १५ अगस्त के मद्देनजर उस दिन शहर में कड़ी चेकिंग की जा रही थी। इस दौरान एक कार में काली सी चीज मिली और पता चला कि कार एक मुस्लिम व्यक्ति की है तो पुलिस फौरन हरकत में आ गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद जो हुआ वह इस प्रकार है। १५ अगस्त की शाम वह अपने क्लीनिक में मरीजों की जांच कर रहे थे, तभी उनके पास मुंब्रा थाने से फोन आया कि कुछ पूछताछ के लिए वह थाने आ जाएं। तीन बच्चों के पिता खालिद यह सोच भी नहीं सकते थे कि उनकी कार में कपड़ा धोने का साबुन रह गया है, और पुलिस ने उसे साबुन न समझ कर आरडीएक्स (विस्फोटक) समझ लिया है। इधर पुलिस की बात देखिए, ११ जुलाई की घटना के बाद तो उनके लिए दूध का जला छाछ भी फूंककर पीने का सा मामला हो गया था। उन्हें सीधा सा साबुन आरडीएक्स लग लग रहा था। इसकी जांच बम निरोधी दस्ते और दूसरे एक्सपर्ट से भी कराई गई। सबने यह पाया कि यह आरडीएक्स नहीं बल्कि साबुन है।&lt;br /&gt;सीनियर अफसर सुरेश पवार फौरन समझ गए कि यह साबुन है, आरडीएक्स नहीं। पर दूसरे सीनियर अफसर यह मानने को तैयार नहीं हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुरेश पवार ने डॉक्टर खालिद को अपनी कार के साथ घर लौटने की इजाजत दे दी। लेकिन थोड़ी ही देर बाद वागले पुलिस ऑफिस से फोन आया कि यहां बम विरोधी दस्ता उनकी कार में पाए सामान की एक बार फिर जांच कर रहा है, आ जाएं। खालिद फिर अपने कुछ मित्रों के साथ वहां पहुंचे। उनसे लंबी पूछताछ की गई। खालिद ने बताया: वहां एक बार जब बम निरोधी दस्ते के लोगों ने साबुन को बारूद बताया तो मेरा दिल सिर पीटने को हो गया। आखिर यही हमारे बम निरोधी एक्सपर्ट हैं? जिन्हें साबुन और बारूद में भी अंतर नहीं पता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉक्टर खालिद ने बताया: जब मुझ जैसे डॉक्टर के साथ इस तरह का सलूक किया गया तो आम आदमी के साथ कैसा सलूक होता होगा, उसकी कल्पना की जा सकती है। बहरहाल अंत में यही साबित हुआ कि यह साबुन था और उन्हें देर रात घर लौटने की इजाजत दे दी गई। पुलिस का कहना था कि ११ जुलाई के बाद और स्वतंत्रता दिवस होने के नाते हमारी मजबूरी थी कि हम चौकस रहें। पुलिस ने उनसे किसी भी तरह का दुर्व्यवहार करने से इंकार किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सुरक्षा के नाम पर पुलिस की चौकसी की बानगी तो आप देख ही रहे हैं. यही कारण है कि ऐसे अवसरों पर आम नागरिक बाहर निकल कर मुसीबत मोल लेने की बजाए घर में बैठना ज्यादा पसंद करते हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-115598849875714840?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/115598849875714840/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=115598849875714840' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115598849875714840'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115598849875714840'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/08/blog-post_19.html' title='साबुन या आरडीएक्स'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-115538727348184587</id><published>2006-08-12T18:23:00.000+05:30</published><updated>2006-08-12T19:01:59.806+05:30</updated><title type='text'>कभी अलविदा न कहना...</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/5446/1726/1600/KANK.jpg"&gt;&lt;img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/5446/1726/320/KANK.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;करण जौहर की फिल्म कभी खुशी कभी गम जब आई थी तब फिल्म देखकर आने वालों ने ये सलाह दी थी कि फिल्म देखने जा रहे हो तो अपने साथ ढेर सारे ट्यिशू ले जाना मत भूलना. अब उनकी नई फिल्म से भी दर्शक यही उम्मीद लगाए बैठे थे. पर थैक्स टू करण उन्होंने इस बार दर्शकों को रुलाया नहीं. हां नया फार्मूला पेश करने के चक्कर में वह खुद इतना कंफ्यूज हो गए कि दर्शक बेचारे अंत तक ये समझ नहीं पाए कि वास्तव में वे फिल्म के जरिए क्या संदेश देना चाहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म की कहानी न तो प्यार जैसी भावना की सही व्याख्या करती प्रतीत हुई और न ही इसमें अनजाने हालातों में बने संबंधों को सही से दर्शाया गया. कहानी दो ऐसे युवा जोड़ों की है जो अपनी शादी में खुश नहीं हैं या यू कहें कि खुश रहना नहीं चाहतें. ऐसा इसलिए क्योंकि फिल्म देखकर अंत तक ये समझ नहीं आया कि सब कुछ होते हुए भी आप अपने साथी व परिवार से खुश क्यों नहीं हैं? खासकर तब जब आपने अपनी मर्जी से पार्टनर चुने हैं. फिल्म की शुरुआत रानी मुखर्जी और अभिषेक से शादी से होती है. अभिषेक रानी से प्यार करता है और रानी उसके प्यार को स्वीकार करने में 3 साल का समय लगाती है और उससे शादी करने के लिए हां करती है. शाहरुख और प्रीति कॉलेज के दिनों की दोस्ती को शादी में बदल लेते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस दिन रानी की शादी होती है उस दिन एक अजनबी (शाहरुख) मिलता है और वह उसे शादी करने की सलाह देता है जबकि रानी मुखर्जी मोहब्बत और शादी को लेकर असंमजस में है. (रोचक बात ये है कि उसे किसी से प्यार नहीं है फिर भी वह प्यार के इंतजार में है). उसने शादी को एक समझौता मान लिया है जबकि असल में ये समझौता था नहीं (कम से कम फिल्म में ऐसे हालात तो कहीं नहीं थे). दूसरी ओर शाहरुख के पास सब है मां, एक स्मार्ट सेक्सी बीवी, प्यारा सा बच्चा, एक हंसता-खेलता परिवार, फिर भी वह जिंदगी से कुछ और चाहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ओर जहां शाहरुख एक हादसे के बाद अपने सपने को पूरा न कर पाने की भड़ास अपने परिवार पर निकालते हैं, तो दूसरी और शादी के कई साल बाद भी “अपने प्यार” की चाह में रानी पति अभिषेक से प्यार नहीं कर पाती. शाहरुख को अपनी पत्नी से शिकायत है कि उसे अपने परिवार से ज्यादा कैरियर की परवाह है. जबकि रानी को अपने पति का रोमांटिक स्वभाव प्यार करने के लिए मुनासिब नहीं लगता. वह किसी और प्यार की चाह में भटक रही हैं. और यहां से शुरु होता है दो अजनबियों (शाहरुख-रानी) के मिलने का और उनके बीच दोस्ती व तथाकथित प्यार का.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म में अमिताभ बच्चन का एक डायलॉग है कि प्यार और मौत कभी भी आ सकते हैं. एक पुराना फेमस गाना भी है प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है.... पर इसका फिल्म से कहीं लेना देना नजर नहीं आया. फिर भी करण जौहर ने दिखाया कि प्यार हो गया तो मान लेना पड़ा कि चलो दोनों को प्यार हो गया. लेकिन फिर सालों से जिस प्यार की तलाश दोनों को थी उसका त्याग कर दोनों अपने परिवार को जोड़ने की मिसाल कायम करने के लिए अपने-अपने घर लौट आते हैं. पर देखिए यहां उनके प्यार व त्याग को समझने की बजाए अभिषेक और प्रीति उनसे रिशता तोड़ लेते हैं. अंतत: दोनों यह फैसला करते है कि जब उनकी यही सजा है कि उनका परिवार उनकी गलती माफ न करे और उन्हे सजा दे तो क्यों न ये सजा साथ में मिलकर काटी जाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;तो ये था करण का जौरह...&lt;/span&gt; हां, एक बात तो पक्की तौर पर क्लीयर हो गई करण जौहर फिल्म निर्देशक से कहीं ज्यादा बेहतर एक मार्केटर हैं, जो बेहतर पैकेजिंग व मार्केटिंग से अपने हर प्रॉडक्ट को हिट करवा लेते हैं. कहने में कोई दोराय नहीं कि फिल्म के लोकेशंन्स शानदार हैं. एक बड़ा नाम व ब्रॉंड होने का फायदा है कि आप पैसे के बूते पर मैजिक क्रिएट करने की काबलियत तो रखते ही हैं. करण की फिल्मों की खासियत फॉरेन लोकेशंस, महंगे आउटफिट्स, नाच-गाने यहां भी उतने ही लुभावने हैं जितने उनकी दूसरी फिल्मों में थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;Moral of the Kabhi Alwida Naa Kahna:&lt;/span&gt; हमारे पास जो है हम उसमे खुश नहीं रहते बल्कि सुख व खुशी की तलाश में भटकते रहते हैं. शायद इसी चाह ने हम लोगों को जिंदगी की छोटी-छोटी खुशियों से दूर कर दिया है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-115538727348184587?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/115538727348184587/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=115538727348184587' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115538727348184587'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115538727348184587'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/08/blog-post_12.html' title='कभी अलविदा न कहना...'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-115521926791769716</id><published>2006-08-10T19:42:00.000+05:30</published><updated>2006-08-10T19:44:39.626+05:30</updated><title type='text'>अभी और इंतजार....</title><content type='html'>13 साल, दस हजार पन्नों में लिखे गए आरोप, 600 गवाह..... ये है कहानी 1993 मुंबई बम ब्लास्ट हादसे की, जिसे अभी भी फैसले का इंतजार है. 13 साल से न्याय की आस लगाए लोगों को अभी न जाने कितना और इंतजार करना होगा. ये वो लोग हैं जिन्होंने हादसे में अपना सब कुछ गवां दिया. लेकिन फिर भी न्याय की आस नहीं छोड़ी और यह उम्मीद लगाए रहे कि आज नहीं तो कल उन्हें इंसाफ मिलेगा और सैकड़ों मासूमों की जान लेने वाले अपने अंजाम तक पहुंचेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन एक बार फिर हमारी न्याय व्यवस्था की खामी के चलते हादसे के शिकार लोगों निराशा होकर लौटना पड़ा. फिलहाल उन्हें अभी और इंतजार करना है (शायद एक महीना या और...). जहां किसी देश की न्याय व्यवस्था उसका मजबूत पक्ष होती हैं वहीं ये हमारी न्यायिक व्यवस्था “weakest link” के रूप में उभर रही है. पिछले दिनों एक खबर आई जिसमें बताया गया कि हमारे देश में 50 लाख से अधिक मुकदमें पेंडिंग पड़े हैं. ऐसे में शीघ्र न्याय की उम्मीद लगाना व्यर्थ ही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इसके अलावा भी दूसरे पहलू हैं जिसके चलते अपराधी कानून की खिल्ली उड़ाते खुलेआम घूम रहे हैं. मुंबई बम ब्लास्ट पर आज फैसला न आने पर टीवी पर एक वरिष्ठ पत्रकार की टिप्पणी भी गौर करने लायक है कि बिना किसी ठोस कारण के फैसले को टाले जाने का कोई औचित्य नहीं था. यही कारण है कि न्याय के लिए चलने वाली सालों साल की प्रक्रिया आतंकवादियों और अपराधियों के हौसले बढ़ा रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों टीवी कार्यक्रम पर एक कार्यक्रम देखा, जिसमें प्रियदर्शनी मामले में हाई कोर्ट में दाखिल एक याचिक पर सुनवाई में हो रही देरी पर बहस चल रही थी. इस कार्यक्रम में सोली सोराबजी, किरण बेदी और एडवोकेट रानी जेठमलानी शामिल थे. न्याय में हो रही पर जब उनसे पूछा गया कि इसके लिए वो किसे जिम्मेदार मानते हैं तो सभी ने अपने कार्यक्षेत्र का बचाव करते हुए दूसरे पक्ष को जिम्मेदार ठहराया. पुलिस का बचाव करते हुए जहां किरन बेदी जी का कहना था कि पुलिसवाले भी इंसान हैं और यह संभव है कि साक्ष्य जुटाने में उनसे गलती हो जाए. वहीं ठोस साक्ष्य न पेश कर पाने और आरोपियों के बरी हो जाने के लिए उन्होंने पुलिस को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया. पर किसी के पास भी इस बात का जवाब नहीं था कि किस तरह इस व्यवस्था को बदला जाएगा. ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब ढूढ़ने में शायद अभी न जाने कितने साल और लग जाए. और तब तक प्रियदर्शनी मट्टू...., जेसिका लाल..., नीतिश कटारा के परिवार .... और मुंबई बम हादसों के शिकार लोग इसी तरह न्याय की बाट जोहते रहें.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-115521926791769716?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/115521926791769716/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=115521926791769716' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115521926791769716'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115521926791769716'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/08/blog-post.html' title='अभी और इंतजार....'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-115436113007919723</id><published>2006-07-31T21:20:00.000+05:30</published><updated>2006-07-31T21:22:10.830+05:30</updated><title type='text'>किताबों को हिट कराने का मौसम</title><content type='html'>लगता है कि इन दिनों किताबों को हिट कराने का मौसम चल रहा है. जहां देखो एक किताब की चर्चा. दिलचस्प बात तो यह है कि किताब के चर्चा में आने से पहले एक विवाद सामने आता है और पता चलता है फलां-फलां विवाद के बारे में फलां-फलां ने अपनी "नई किताब" में चर्चा की है. इसी कड़ी में आजकल जसवंत जी हर जगह छाए हुए हैं जिनकी किताब "ए कॉल टू ऑनर" बेस्टसेलर में शामिल भी हो गई. अब क्या कहें...... पता नहीं कि किताब से जुड़ा जासूस विवाद न होता तो किताब के पढ़ने वाले कितने होते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब अपनी क्रिकेट टीम के कोच जॉन राइट को ही लीजिए. जिस गांगुली के कसीदे पढ़ते वह नहीं थकते थे अब वह अपनी किताब "इंडियन समर्स" में गांगुली के साथ विवादों का जिक्र कर रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जसवंत की तरह का नुस्खा अपनाने के लिए एक और सांसद ने अयोध्या विवाद के बारे में चर्चा की. फिर खबर आई कि इस बारे अधिक विस्तार से चर्चा सांसद महोदय की नई पुस्तक में है. अब ये अलग बात है कि जसवंत जी की किताब के चलते सांसद जी की किताब लाइम लाइट में नहीं आ पाई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगता है सांसद जी को मार्केटिंग बिजनेस का जरा कम ज्ञान है तभी तो उन्होंने बॉक्स ऑफिस पर चल रही एक हिट फिल्म के समय अपनी फिल्म रिलीज कर दी. अब उन्हें कौन समझाए कि किताब को हिट कराने के लिए सही टाइमिंग पर सही विवाद की जरुरत पड़ती है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-115436113007919723?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/115436113007919723/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=115436113007919723' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115436113007919723'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115436113007919723'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/07/blog-post_31.html' title='किताबों को हिट कराने का मौसम'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-115341030140269276</id><published>2006-07-20T21:10:00.000+05:30</published><updated>2006-07-20T21:15:03.896+05:30</updated><title type='text'>दुनिया है गोल</title><content type='html'>दुनिया गोल है, ई बात अब हमहूं दावे के साथ कह सकता हूं। जी नहीं, हम आपको जोगराफिया नहीं पढ़ा रहा हूं। हमरे कहने का मतलब तो बस ई है कि दुनिया में आप कहीं भी जाइए, स्थिति एके जैसी है। अगर चावल का एक दाना देखकर उसके पकने का अंदाजा चल सकता है, तो हम ई कह सकता हूं कि खाली हमरे लिए ही नहीं, दुनिया के हर देश के लोगों के लिए घर की मुरगी दाल बराबर होती है, अपनी स्थिति से कोई खुश नहीं रहता, जाम हर जगह लगता है औरो भरष्टाचार के शिकार सिरफ हमहीं नहीं, दूसरे देश के लोग भी हैं। हमको तो लगता है कि मरने के बाद स्वर्ग पहुंचने वाले लोग भी निश्चित रूप से अपनी स्थिति से संतुष्ट नहीं रहते होंगे.... (&lt;a href="http://biharibabukahin.blogspot.com/"&gt;पूरा पढ़े&lt;/a&gt;)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-115341030140269276?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/115341030140269276/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=115341030140269276' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115341030140269276'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115341030140269276'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/07/blog-post_20.html' title='दुनिया है गोल'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-115253479054929340</id><published>2006-07-10T17:56:00.000+05:30</published><updated>2006-07-10T18:09:39.883+05:30</updated><title type='text'>हिंदी ब्लॉग जगत की महिमा</title><content type='html'>हिंदी ब्लॉगरों की संख्या जितनी तेजी से बढ़ रही है. उसके बारे में लोगों तक जानकारी भी उतनी तेजी से पहुंच रही है. जिस समय मैं हिंदी ब्लॉगर समूह में शामिल हुई थी मेरे पास इसके बारे में कुछ जानकारी नहीं थी. पर अब नए लोगों के लिए जानकारी की कोई कमी नहीं हैं. इंटरनेट पर हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता इसके उज्जवल भविष्य की ओर संकेत करती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी ब्लॉगिंग पर नवभारत टाइम्स में आज प्रकाशित &lt;a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/1719225.cms" target_="'blank"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;लेख देंखे&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह आगे बढ़ते रहने के लिए हिंदी ब्लॉग जगत को बहुत बहुत शुभकामनाएं...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-115253479054929340?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/115253479054929340/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=115253479054929340' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115253479054929340'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115253479054929340'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/07/blog-post_10.html' title='हिंदी ब्लॉग जगत की महिमा'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-115235372405939798</id><published>2006-07-08T15:27:00.000+05:30</published><updated>2006-07-08T15:45:27.280+05:30</updated><title type='text'>मदद.... मदद... मदद</title><content type='html'>सभी ब्लॉगर मित्रों के अमूल्य सुझाव की जरुरत आन पड़ी है.  दरअसल में काफी समय से एक न्यूज बेस बेवसाइट बनाने के बारे में सोच रही हूं. वैसे मेरा रुझान हिंदी साइट बनाने की ओर ही है. पर मेरे सहयोगी का कहना है कि इंग्लिश सेगमेंट भी होना जरुरी है. अब समस्या ये है कि मुझे कोई नाम ही नहीं सूझ रहा है. जो भी नाम सोचते हैं उसका डोमेन नेम पहले से ही बुक हो चुका है.  अब कुछ ऐसा सोचना है जिसमें न्यूज बेस कंटेंट भी डाला जा सके और डोमेन मिलने की भी गुंजाइश हो.&lt;br /&gt;डोमेन नेम खरीदने का बिजनेस भी खासा चल निकला है.  खैर, साइट के लिए आप लोग नाम सुझाएं. आपके अमूल्य सुझावों का इंतजार है. वैसे मैं और मेरे सहयोगी तो नाम की तलाश में लगे ही हुए है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-115235372405939798?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/115235372405939798/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=115235372405939798' title='28 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115235372405939798'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115235372405939798'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/07/blog-post_08.html' title='मदद.... मदद... मदद'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>28</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-115228610556284027</id><published>2006-07-07T20:58:00.000+05:30</published><updated>2006-07-07T20:58:25.950+05:30</updated><title type='text'>देयर इज नथिंग गुड एंड बैड!!</title><content type='html'>शेक्सपियर ने लिखा है, 'देयर इज नथिंग आइदर गुड ऑर बैड, बट थिंकिंग मेक्स इट सो।' यानी संसार में अच्छा या बुरा कुछ नहीं है। अगर कुछ अच्छा या बुरा लगता है, तो ऐसा हमारी सोच के कारण होता है। हमारी सोच किसी भी स्थिति, घटना, वस्तु या व्यक्ति को अच्छा या बुरा बनाती है। वास्तविक जीवन में क्या घटित हो रहा है, इससे ज्यादा महत्व इस बात का है कि मन में क्या घटित हो रहा है। (&lt;a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/1715285.cms"&gt;पूरा पढ़े&lt;/a&gt;)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-115228610556284027?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/115228610556284027/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=115228610556284027' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115228610556284027'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115228610556284027'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/07/blog-post.html' title='देयर इज नथिंग गुड एंड बैड!!'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-115089676470928248</id><published>2006-06-21T18:57:00.000+05:30</published><updated>2006-06-21T19:02:45.803+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>अब आप अपने पसंदीदा कॉलम को &lt;a href="http://biharibabukahin.blogspot.com/"&gt;नए पते &lt;/a&gt;पर पढ़ सकते है. उम्मीद है जिस तरह आप सभी ने अब तक इन व्यंग्यों को पसंद किया आगे भी आपको ये पसंद आएंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्यवाद...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-115089676470928248?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/115089676470928248/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=115089676470928248' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115089676470928248'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115089676470928248'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/06/blog-post_21.html' title=''/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-115038281099963189</id><published>2006-06-15T20:13:00.000+05:30</published><updated>2006-06-15T20:16:51.373+05:30</updated><title type='text'>'सेल' में सरकार</title><content type='html'>लीजिए, दिल्ली सरकार अब पियोर व्यापारी हो गई है। का है कि जैसे दुकानदार सब होली-दीवाली पर सेल लगाता है न, वैसने दिल्ली सरकारो अब सेल लगाने लगी है। पहले चीजों का दाम ८० परसेंट बढ़ाकर स्टीकर चिपका दीजिए औरो फिर बड़का बैनर पर अप टू ७० परसेंट सेल लिखकर टांग दीजिए। जनता खुश! केतना सस्ता चीज मिल रहा। अब गिरहकट ने कैसे जेब काट लिया ई पता किसको चलता है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो भइया दिल्ली सरकार ने भी तेल के खेल में व्यापारी वाला बुद्धि लगाया। उसको पता था कि पेटरोल-डीजल का दाम बढ़ते ही लोग हाय-हाय करेंगे, सो ऐसा करो कि दाम एतना बढ़ा दो कि जब लोग हाय-हाय करने लगेंगे, तो थोड़ा दाम घटाकर वाहवाही लूट सको। अब सरकार का धंधा देखिए कि पेटरोल का चार टका दाम बढ़ा के ६७ पैसा का सेल लगा दिया, तो डीजल का दो टका दाम बढ़ा के २२ पैसा का सेल लगा दिया। और अब उ सीना तान रही है कि देखो, हम जनता का केतना चिंता करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, इस सरकारी रवैया के लिए जनतो कम दोषी नहीं है। अब का है कि तनिये ठो छूट देख के आप समान लूटने के लिए टूट पडि़एगा, तो आपको कोयो बेकूफ बना सकता है। हमको तो इस तेल में दोसरे खेल नजर आता है। हमरे खयाल से सरकार ने अब पेटरोल कंपनी को छोड़कर पेटरोल पंप मालिक सब से दोस्ती कर ली है। तभी तो दाम घटा के ऐसा रखा है कि पेटरोल पंप मालिक को फायदा हो। अब का है कि आप जाइएगा एक लीटर पेटरोल भराने, जिसका दाम आपको देना पड़ेगा ४६ टका ८४ पैसा। आप इसके लिए काउंटर पर ४७ टका दीजिएगा, तो आप ही बताइए कि आपको १६ पैसा लौटा के कौन देगा? अगर दिन भर में हजार लीटर पेटरोल बिकता है, तो तनि पेटरोल पंप मालिक के फायदा का हिसाब लगा के देखिए। ऐसने हाल डीजल का है, जिसका दाम ३२ टका २५ पैसा रखा गया है। अब आप जब जाइएगा पेटरोल भराने, तो पंप मालिक आपको ७५ पैसा लौटाने के लिए २५ पैसा तो अपने घर में बनाएगा नहीं। मतलब आपको कम से कम २५ पैसा औरो बेसी से बेसी ७५ पैसा के घाटे की तो पूरी गैरंटी है। अब आप लगा लीजिए, पूरा हिसाब औरो दाद दीजिए सरकारी व्यापार बुद्धि को!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, सही बताऊं, तो हमको सरकार दिनोंदिन एकदम खांटी व्यापारी बनती नजर आ रही है। पिछले दिनों हमने पढ़ा कि सात दिन के अंदर हाउस टैक्स जमा कीजिए औरो १५ परसेंट का आकर्षक छूट पाइए। अब इसको भले सरकारी अफसर टैक्स जमा करने के लिए प्रोत्साहन का तरीका मानता हो, लेकिन हमको तो ई पियोर सेल लगता है। अरे भाई, एक तो कानून ही नहीं बनाइए औरो अगर बनाते हैं, तो उसका पालन करवाइए। उसमें काहे का छूट। जब तेल कमपनी सब को आप घाटा में नहीं भेजना चाहते, जनता को तेल के नाम पर सब्सिडी नहीं देना चाहते, तो टैक्स में सब्सिडी काहे का। हमरे खयाल से तो जनता से सब टैक्स वसूलिए औरो पैसा को तेल-पूल के घाटा से बाहर आने में लगाइए। लेकिन जनता को प्लीज जनता को ठगिए मत। का है कि हाउस टैक्स का उनको पांच टका छोड़कर आप उससे ३५ टका किलो परवल खरीदवाते हैं तो लानत है आप पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रिय रंजन झा&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-115038281099963189?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/115038281099963189/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=115038281099963189' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115038281099963189'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/115038281099963189'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/06/blog-post_15.html' title='&apos;सेल&apos; में सरकार'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114976123963680680</id><published>2006-06-08T15:35:00.000+05:30</published><updated>2006-06-08T15:37:20.580+05:30</updated><title type='text'>दूसरे से चार्ज होना</title><content type='html'>आजकल हम मोबाइल फोन रखने वाले आफिस के अपने साथियों से परेशान हूं। रोज कोयो न कोयो हमरे पास चार्जर मांगने आ जाता है औरो चार्जर नहीं मिलने पर एक खरीदकर रखने की मुफ्त में सलाहो दे जाता है। आप ही बताइए, ई अजीब बात नहीं है कि सब दोसरे के भरोसे चार्ज रहना चाहता है। वैसे, बहुत चिंतन के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि वास्तव में हम सब दोसरा के भरोसे ही चार्ज होने के लिए अभिशप्त हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देखिए न वसंत कुंज वालों को। पांच दिन हाड़तोड़ मेहनत करके जब उ लोग डिस्चार्ज हो जाते हैं, तो चार्ज होने के लिए सप्ताह के बाकी दू दिन मॉल में घूमते रहते हैं। इसके लिए उ गुड़गांव तक का चक्कर लगाते रहते हैं, लेकिन दूसरे से चार्ज होने की आदत देखिए कि अपने यहां बन रहे मॉल को बनने से रोकने के लिए कोर्ट पहुंच गए। उ तर्क दे रहे हैं कि मॉल बनने से यहां का परयावरण खराब हो जाएगा। अरे भइया, मॉल बनने से अगर आपकी कालोनी का परयावरण खराब हो रहा है, तो गुड़गांव का परयावरण मॉल बनने से बढि़या तो हो नहीं जाएगा! अगर परयावरण का एतने चिंता है, तो मत जाइए कहीं के मॉल में। ऐसन दोगलई काहे करते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, दूसरे से चार्ज होने के मामले में हमरी पुरुष बिरादरी भी बदनाम है। का है कि अपनी बीवी या गर्ल फरेंड केतनो बढि़या हो, उनकी बांछें दूसरे की जोड़ू को देखकर ही खिलती है। घर में जब तक बीवी के साये में रहेंगे, डिस्चार्ज रहेंगे, एकदम मुरझाए-से, लेकिन जैसने बाहर निकले कि एकदम चार्ज हो जाएंगे। बीवी या अपनी पुरानी हो चुकी गर्ल फरेंड का फोन आएगा, तो महाशय के मुंह से एकदम मरी हुई आवाज निकलेगी, जैसे न जाने दुख का केतना बड़का पहाड़ बेचारे पर टूट पड़ा हो, लेकिन दूसरी कोई महिला फोन पर हो, तो देखिए महाशय के चेहरे का चमन, एकदम खिला होता है! एक मिनट में डिस्चार्ज मूड चार्ज हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी किरकेटिया टीम को ही देखिए लीजिए। मान लिया जाता है कि बिना विदेशी कोच के अपनी टीम चार्ज हो ही नहीं सकती। बेचारा गए, तो गेग चैपल आए, ई जाएंगे तो कोयो और आएंगे, लेकिन कोच बनेगा कोयो विदेशी ही। दूसरे से चार्ज होने की मानसिकता के कारण ही तो हमने मान लिया है कि गावस्कर और कपिल ताऊ ने जिंदगी भर घास खोदी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घास तो अपने परधानमंतरी भी खोद रहे हैं। सरकार के उ मुखिया हैं, लेकिन दूसरे से चार्ज होने की अपनी आदत देखिए कि पेटरोल-डीजल का दाम बढ़ाने के बाद सरकार पर डिस्चार्ज होने का खतरा पैदा हुआ, तो चार्ज करने के लिए उरजा मंतरी मुरली देवड़ा सीधे पहुंच गए सोनिया गांधी के पास। बेचारा परधानमंतरी गए तेल लेने, कोयो नहीं पूछता उनको।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, कांगरेस पारटी में दूसरे से चार्ज होने की संस्कृति बहुते पुरानी है। का है कि अगर किसी राज्य में कांगरेसी सरकार बनने की स्थिति आई, तो वहां का विधायक अपना नेता नहीं चुनता। दूसरे से चार्ज होने की मानसिकता देखिए कि नेता चुनने का काम आलाकमान पर छोड़ दिया जाता है। चुनाव भले ही आप जीत लें, लेकिन सरकार बना लेना बच्चों (विधायकों!) का खेल थोड़े ही है, सो ऊपर से मदद जरूरी हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और तो और अब राहुल गांधी परधानमंतरी बनने की टरेनिंग ले रहे हैं, तो बेचारे को चार्ज होने के लिए विदेश भेज दिया गया। अभी खबर आई थी कि उ सिंगापुर में राजनीति का गुर सीख रहे हैं। अब हम ई सोच-सोच के डिस्चार्ज हो रहा हूं कि भगवान जाने वहां की टरेनिंग से एतना बड़का लोकतांतरिक देश राहुल चला कैसे चला पाएंगे! अब आप ही बताइए, हम अपने को कहां से चार्ज करें!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रिय रंजन झा&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114976123963680680?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114976123963680680/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114976123963680680' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114976123963680680'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114976123963680680'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/06/blog-post_08.html' title='दूसरे से चार्ज होना'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114915610882146691</id><published>2006-06-01T15:29:00.000+05:30</published><updated>2006-06-01T15:31:49.353+05:30</updated><title type='text'>किसकी गरमी काम की</title><content type='html'>आजकल दिल्ली गरम है। एतना गरम कि पूछिए मत, जीना मुहाल हो रहा है। का है कि अगर खाली सूरज की गरमी बर्दाश्त करना हो, तो आप कर लीजिएगा, लेकिन यहां तो गरमी पैदा करने वाला बत्तीस ठो कारण जमा है। कोयो सत्ता की गरमी दिखा रहा है, तो कोयो आंदोलन की, कोयो बहिष्कार की, तो कोयो डीप क्लीवेज की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;का है कि राजधानी में रहने का यही नुकसान है- बात कहीं की हो, भुगतना आपको पड़ता है। अब देखिए न आमिर खान पर बैन लगाया गुजरात ने, उ रहते बम्बे में हैं, लेकिन झगड़ा में पसीना बहा रहे हैं दिल्ली के लोग। हमरे एक लाल झंडा वाले दोस्त इस मुद्दा पर दो बार पिटे- एक बार तब, जब दारू पी के फना पर बैन को अभिव्यक्ति के अधिकार पर हमला बता रहे थे औरो दूसरा बार तब, जब पंजाब में दा विंची कोड पर बैन को वाजिब ठहरा रहे थे। ऐसने हाल राखी सावंत मामले का है। उन पर कोल्हापुरी चप्पल चला कहीं और, लेकिन क्लीवेज की लंबाई पर बहस गरमा रहा है दिल्ली में। आरक्षण का फायदा-नुकसान भुगतना होगा देश भर के लोगों को, लेकिन वातावरण सबसे गरम है दिल्ली में। अब ऐसन में हमरी समझ में ई नहीं आ रहा कि गरमी के इन सब सोर्स में सबसे बेसी पावर किस में है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कोयो शंका नहीं कि सत्ता में बहुते गरमी होती है। तभिये न चुन-चुन के वैसन पोस्ट सब को आफिस आफ परॉफिट से बाहर कर दिया यूपीए वालों ने, जिनसे उनके किसी भाई-बंधु का नुकसान हो रहा था। जया बच्चन के पास भी सत्ता की गरमी होती, तो सरकार को उनकी सीट में परॉफिट थोड़े दिखता। लेकिन इससे पहिले कि हम सत्ता की गरमी को सबसे पावरफुल समझते, राष्ट्रपति ने आफिस आफ परॉफिट वाला बिलवे लौटा के सब कुछ ठंडा कर दिया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्रपति ने सत्ता की गरमी को कम कर दिखाया, तो कोर्ट आरक्षण की गरमी को डीप फ्रिजर में घुसा रहा है। अब आठ हफ्ता बाद जब कोर्ट इस मामले को सुनेगा, तब तक तो दिल्ली में सावन आ जाएगा, इसलिए इसकी चर्चे बेकार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गरमी तो हमको आमिर भाई में भी खूब दिखा था। 'रंग दे वसंती' का चल गई, कुछ बेसिए टेढि़या गए। न आगे देखे औरो न पीछे, कूद पडे़ नर्मदा घाटी में। अब ई फिल्मी परदा तो है नहीं कि हीरो सिक्की पहलवान है, तभियो ऊ गामा पहलवान को हरा देगा। जनता से पंगा लेने वालों को तो भगवानो नहीं बचाते हैं, सो पड़ गए भइया फेर में। सब गरमी खतम हो गई, तो अब कहते फिर रहे हैं कि मैंने गुजरात के बारे में कुछ बोलवे नहीं किया था। बात कहकर मुकरना पड़ जाए, तो भैया ऐसन गरमी किस काम की?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमिर से बेसी बढि़या, तो राखी सावंत की गरमी रही, जो अभियो तक कायम है। उनकी गरमी तो देखिए कि टेढ़ी बात करने वाले एंकर बड़े-बड़े सूरमा का पसीना निकाल देते हैं, लेकिन राखी की गरमी के सामने उनका पसीना निकल गया। सही बताऊं, तो हमको सबसे बेसी गरमी राखी में ही दिखती है। एनर्जी का बड़का सोर्स। बताइए, खाली देह देखके सैकड़ों लोग दंगा पर उतर आया, इससे बड़ी बात और का हो सकती है। वैसे, आश्चर्य हमको इसका है कि एतना मजबूत चप्पल बनाने वाले कोल्हापुर के लोग, एतना कमजोर पेंदी वाले कैसे हो गए! एक हम दिल्लीवाले हैं, जो रोज रोड पर राखी सावंतों को देखते हैं, लेकिन कर कुछ नहीं पाते हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रिय रंजन झा&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114915610882146691?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114915610882146691/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114915610882146691' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114915610882146691'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114915610882146691'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/06/blog-post.html' title='किसकी गरमी काम की'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114865645070470306</id><published>2006-05-26T20:42:00.000+05:30</published><updated>2006-05-26T20:44:15.346+05:30</updated><title type='text'>कमजोरों का बोलबाला</title><content type='html'>बहुत बुरी स्थिति है भाई! सरकार कहती है कि लोग उस पर विशवास करे, लेकिन जनता उसकी सुनिए नहीं रही है। परधानमंतरी डाक्टर सब से कहते हैं कि हम पर विशवास कीजिए, आपका भला होगा, तो वित्त मंतरी कहते हैं कि जमीन सूंघने के बावजूद आप शेयर बाजार में पैसा लगाते रहिए। अब आप ही बताइए, मर रहे आदमी को आप ई कहिएगा कि तुम जिंदा हो रहे हो, तो उ काहे आप पर विशवास करेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे भी परधानमंतरी की बात सुनवे कौन करता है कि डाक्टर सब सुने! बिहार, झारखंड के राज्यपाल ने उनकी बात नहीं सुनी, क्वातरोकी को सरकारी अफसरों ने खाता से पैसा निकालने दे दिया, परधानमंतरी को पते नहीं चला, जयप्रकाश नारायण केंद्र में मंतरी रहते हुए अंडरगराउंड रहे, परधानमंतरी उनको ढूंढ कर पुलिस को नहीं दे सके, अर्जुन सिंह ने समाज को बांटने वाला एतना बड़ा पत्ता खेल दिया, परधानमंतरी टापते रह गए, अब ऐसन में डाक्टर उन पर भरोसा करे, तो कैसे करे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भरोसा तो इसलिए भी करना मुश्किल है कि कारवां गुजर जाता है औरो उ गुबार देखते रह जाते हैं। पूरा दिल्ली टूट गया, दुकान में ताला लटक गया, तब उनकी नींद खुली कि अन्याय हो रहा है, कानून बनाओ। जब करोड़ों टका जनता का डूबा, लाखों का रेवेन्यू सरकार का छूटा, तब जाकर आप कानून बनाते हैं औरो चाहते हैं कि लोग आप पर विशवास करे, ई कैसे संभव है। उ अर्थशास्त्र के पंडित हैं औरो परधानमंतरी भी, लेकिन आश्चर्य है कि उनको देश की आरथिक औकात का पते नहीं है। कुछ दिन पहिले कहा जा रहा था कि उच्च शिक्षा पर खरचा करने के लिए सरकारी बटुआ में पैसे नहीं है, लेकिन आरक्षण आ गया, तो सीट बढ़ाने के लिए उसके पास पैसा आ गया। आश्चर्य तो इहो है कि पराथमिक इसकूल तो सरकार से मेनटेन नहीं होता औरो कालेज में एडमिशन के लिए उ लोगों को आपस में लड़ा रहा है। अरे, जब बच्चा पराथमिक इसकूले नहीं जा पाएगा, तो कालेज पहुंचेगा कैसे? अब सरकार एतना बेवकूफ बनाएगी लोगों को, तो उस पर भला कौन भरोसा करेगा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसने हाल शेयर बाजार का है। आठ दिन में शेयर बाजार आसमान से धरती पर उतर गया, लेकिन सरकार सोयी रही। तीन सौ करोड़ टका इसी देश के लोगों का डूबा, लेकिन सरकार तब जागी, जब लोग लुट-पिट गए। वित्त मंतरी के एक स्पष्टीकरण से बाजार सुधर गया, लेकिन उ हैं कि दो घंटा पहिले मुंह नहीं खोलने की कसम खाकर बैठे थे। माना कि शेयर बाजार में पैसा अमीर आदमी सब लगाता है, लेकिन इसका मतलब ई थोड़े है कि उनको लुटने दिया जाए। ई काहे भुला दिया जाता है कि अमीरो आदमी इसी देश का नागरिक होता है औरो कमाता है, तो बत्तीस तरह का टैक्सो आप उसी से वसूलते हैं। हमको तो लगता है कि इस देश में मजबूत होना ही गुनाह है। इससे तो बढि़या है कि आप कमजोर बने रहिए- कोयो आपकी चिंता नहीं करेगा, तो कम से कम परेशाने तो नहीं करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकारियो फंडा यही है कि आप कमजोर के लिए कुछ मत कीजिए, लेकिन जो मजबूत हो रहा है, उसका टांग खींचकर जमीन पर पटक दीजिए। केतना बढि़या समाजशास्त्र है! वैसे, इसमें आश्चर्य की कौनो बात है भी नहीं! अब का है कि जिस देश में परधानमंतरी बनने के लिए व्यक्ति का कमजोर होना सबसे बड़ी शर्त हो, उस देश में मजबूत आदमी को कौन पसंद करेगा? खुदे मनमोहन जी परधानमंतरी इसीलिए बने काहे कि उ कमजोर थे। अर्जुन सिंह जैसे नख-दंत वाले होते, तो परधानमंतरी बनने का सपने देखते रह जाते! अब आप ही कहिए, जब परधानमंतरी बनने की कसौटी ई है, तो आप पढ़-लिखकर या कमाकर तोप बनने की कोशिश काहे करते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रिय रंजन झा&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114865645070470306?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114865645070470306/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114865645070470306' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114865645070470306'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114865645070470306'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/05/blog-post_26.html' title='कमजोरों का बोलबाला'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114796236947811768</id><published>2006-05-18T19:53:00.000+05:30</published><updated>2006-05-18T19:56:09.926+05:30</updated><title type='text'>दिल्ली में इन्कलाबी माहौल</title><content type='html'>आजकल दिल्ली में वातावरण अचानक इन्कलाबी हो गया है। हर तरफ धरना-परदरशन का जोर है। भले ही समाजिक समस्या को लेकर अपना जवान सब कभियो इन्कलाब जिंदाबाद नहीं करते हों, लेकिन आरक्षण के समरथन औरो विरोध में खूब गला फाड़ रहे हैं, पानी की बौछार झेल रहे हैं। आरक्षण को कोयो सामाजिक समरसता कह रहा है, तो कोयो वोट की राजनीति। ऐसे में हम बहुत कन्फूज हूं।&lt;br /&gt;ऐसने कन्फूजन की स्थिति में हमको एक ठो भयानक सपना दिखा। हम एयर इंडिया के विमान में सवार थे। हवाई जहाज के उड़ने से पहले घोषणा हुई - - आज हम 'समाजिक समरसता' के प्रतिनिधि बिमान में उड़ान भरने वाले हैं। हमारे पायलट 'कोटे' से आए हैं और आज यह उनकी पहली उड़ान है, इसलिए आप लोग कुर्सी की पेटी के अलावा, एक और पेटी से खुद को बांध लें, ताकि हम 'हवाबाजी' का आनंद ले सकें। इस हवाबाजी में अगर किसी की तबीयत बिगड़ती है, तो हमारे साथ 'कोटे' से आए डाक्टर भी हैं, घबराइएगा नहीं उ पराथमिक इलाज करने में सक्षम हैं। हमको खुशी हो रही है कि इस खास उड़ान में माननीय अर्जुन सिंह भी हमारे साथ हैं, जिनको अचानक किसी खास काम से चुरहट जाने के लिए ई बिमान पकड़ना पड़ा है...। अब हम उड़ान भरने के लिए तैयार हैं औरो आपकी सेफ जरनी की कामना करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ई का! जैसने ई घोषणा हुई, एक ठो बूढ़ा आदमी उठा औरो अपने पीए नुमा आदमी को इस बात के लिए डांटते हुए कि उसने काहे इस 'उड़ते ताबुत' में टिकट बुक कराया, बेहोश हो गया। बिमान उड़ते-उड़ते रुक गया आखिर मंतरी जी वाली बात थी। इससे पहले कि बिमान का डाक्टर उसका इलाज करते, मंतरी जी के पीए ने उसे रोका औरो मरीज को लेकर बिमान विदेश रवाना हो गया। आखिर उनका जिंदा रहना देश के लिए बहुते जरूरी जो था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ई तो कोटा की बात है, हम आपको एक ठो डोनेशन वाला डाक्टर की कहानी बता रहा हूं। हमरी बाटनी की प्रोफेसर के पति डोनेशन देकर डाक्टरी पढ़े थे। एक दिन पिताजी की तबीयत खराब हुई, तो प्रोफेसर साहिबा ने पति से दवा लिख देने के लिए कहा। जब वह परचा लेकर मेडिकल स्टोर पहुंचीं, तो दुकानदार ने कहा, 'हमरे यहां मवेशियों की दवा नहीं मिलती है। बाई द बे आपने भैंस कब से पालना शुरू कर दिया?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो ई है महिमा डाक्टरी में शार्टकट की। अब आप ही कहिए कि ऐसन डाक्टर बेटा से कोयो बाप कैसे अपना इलाज करवाएगा? और जब बाप इलाज नहीं करवा सकता, तो दूसरे अनजान आदमी की जान लेने के लिए उसको लाइसेंस काहे दिया जाता है! का है कि डाक्टरी इंजीनियरिंग तो है नहीं कि ग्यान के अभाव में घर का पिलर टेढ़ा भी बन गया, तो बाद में उसको दुरुस्त कर लिया जाएगा। यहां तो अगर किसी डाक्टर ने आपरेशन में गलतियो से कोयो काम वाला नस काट दिया, तो आपको सीधे स्वर्ग का द्वार दिखने लगेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस देश में तो वैसने स्थिति कंटरोल से बाहर है। जहां हालत ई हो कि जाइए बायां जबड़े का बेकार दांत निकलवाने, तो डाक्टर दायें जबड़े का बढि़या दांत निकाल के हथेली पर रख दे, उस देश में कोटा का खयाले बेहोश कर देने वाला होता है! आखिर मुन्ना भाई की झप्पी अगर एतना कारगर होती, तो डाक्टर सब जिंदगी भर किताबी कीड़ा काहे बना रहता!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रिय रंजन झा&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114796236947811768?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114796236947811768/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114796236947811768' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114796236947811768'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114796236947811768'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/05/blog-post_18.html' title='दिल्ली में इन्कलाबी माहौल'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114743395640764265</id><published>2006-05-12T17:07:00.000+05:30</published><updated>2006-05-12T17:09:16.700+05:30</updated><title type='text'>गलतफहमी का झटका</title><content type='html'>भले ही इस सड़ल गरमी में हमरे घर में बिजली नहीं रहती, लेकिन करंट का झटका तो हमको रोज लगता रहता है। वैसे, आप इसको गलतफहमी का झटका कह सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल में सबसे बड़का झटका हमको ताऊ के अरबपति होने की खबर सुनके लगा है। उनके अरबपति होने की बात सुनके हम सदमे में हूं। हम तो सोचते थे कि उ अपने को किसान कहते हैं, तो फसल उगा के अरबपति हुए होंगे, लेकिन हमको का पता कि अरबपति राजनीति की खेती करके भी हुआ जा सकता है! वैसे, राजनीति को चारा बनाकर खाने का आरोप तो अपने 'चपरासी के भइया' पर भी लगा, लेकिन जब तक उ सत्ता में हैं, हमको नहीं लगता कि सीबीआई उनका फार्म हाउस औरो बैंक खाता खोज पाएगी। अब देखिए न ताऊ भी तभिये पकड़ाए, जब हरियाणा की सत्ता हाथ से निकल गई। हम तो ई सोच के संतोष कर लेता हूं कि नेता सब पर कोयो आरोप साबित करना ओतने कठिन काम है, जेतना कि बैल दूहना। तो अब हम ई गलतफहमी पालने की स्थिति में नहीं हूं कि हमरी जेब काटके धनी हुए नेताओं की जेब कोयो असानी से काट पाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गलतफहमी तो हमको बुधिया को लेकर भी थी-- पांच साल का बच्चा पैंसठ किलोमीटर दौड़ेगा कैसे, लेकिन जब उसने दौड़ के देखा दिया, तो अब हम उसको दौड़ाने वालों को कोस रहा हूं। बताइए एक ठो अदना-सा गरीब बच्चा बिना किसी से पूछे रिकार्ड बना लिया, ई कोनो बात हुई! हद तो ई हो गई कि सरकारो से परमिशन नहीं लिया गया। हम तो खुश हूं कि सरकार ने उसको दौड़ने पर ही प्रतिबंध लगा दिया है। और बिना पूछे बनाए रिकार्ड! बिना सरकार से पूछे देश में एथलीट पैदा होने लगे, इससे बेसी गैर कानूनी बात औरो का हो सकता है? तो बुधिया जैसन लोगों की गलतफहमी को देखकर हमको लगता है कि हम बेकारे गलतफहमी के शिकार होने के लिए अपने को कोस रहे थे। यहां तो पूरी दुनिया गलतफहमी का शिकार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब शेन वार्न वाला मामला ही ले लीजिए। उसकी घरवाली इस गलतफहमी में उसको छोड़कर चली गई कि दूसरी महिलाओं पर लाइन मारने वाला उसका पति उसको खुश नहीं रख पाएगा। अब एक साथ दू-दू ठो अंगरेजन सुपर मॉडल को खुश कर उनसे 'हीरो' की उपाधि पाने के बाद आप ही बताइए शेन वॉर्न को कौन बंद कमरे में जीरो मानेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, गलतफहमी का एक ठो औरो उदाहरण है, लेकिन है तनि दुखद। उ परमोद जी थे न। बेचारे माया, उमा, ममता औरो जया जैसी देवियों को साध लेते थे, दुनिया भर की समस्या को मैनेज कर लेते थे, लेकिन गलतफहमी देखिए कि अपना भाई मैनेज नहीं हुआ। उ खुद इस गलतफहमी में थे कि भाई को पाला- पोसा है, उससे काहे का खतरा, तो भाई इस गलतफहमी में था कि भाई का रसूख उसको करोड़पति बना देगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सही बताऊं , तो गलतफहमी के इसी टक्कर में हमको झटका लग रहा है। अब नेता इस गलतफहमी में बईमानी कर-कर के तिजोरी भरता रहता है कि उसका कोयो कुछो नहीं बिगाड़ सकता, तो हम सोचता हूं कि नेता बईमानी कर के कोयो मात्र लखपति बन सकता है, करोड़पति अरबपति नहीं। ऐसे में झटका तो लगेगा ही। चलिए हमरी छोड़िए, आप तो सयाने हैं, इसलिए आप गलतफहमी मत पालिए। झटके से बचे रहिएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रिय रंजन झा&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114743395640764265?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114743395640764265/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114743395640764265' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114743395640764265'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114743395640764265'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/05/blog-post_12.html' title='गलतफहमी का झटका'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114683951726290590</id><published>2006-05-05T20:00:00.000+05:30</published><updated>2006-05-05T20:02:00.830+05:30</updated><title type='text'>जमाना हवाबाजी का</title><content type='html'>जमाना हवाबाजी का है, मतलब बड़ी-बड़ी हांकने का है। आप जेतना हवाबाजी देखाएंगे, ओतना फायदा में रहेंगे। अगर आपकी औकात दो टका की है, तो आप उसको दस टका का बताइए औरो देखिए लोग पर केतना रौब जमता है आपका। दिल्ली में तो हमको सौ में नब्बे लोग हवाबाज दिखता है। कोयो अपनी नौकरी के बारे में बड़ी-बड़ी हांकता है, तो कोयो अपनी रिश्तेदारी औरो बड़े लोगों से अपने संपर्क के बारे में, तो कोयो अपने पैसा के बारे में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, गौर से देखिएगा, तो पूरा देश आपको हवाबाजी में कलाबाजी करते दिखेगा। बाजार हवा में है, कानून हवा में है, समाज हवा में है, पालिटिक्स हवा में है, लोग हवा में है, यहां तक कि पूजा-पाठ तक हवा में है। जमीनी हकीकत के बारे कोयो सोचना नहीं चाहता। औरो यही कारण है कि यहां कुछो व्यवस्थित नहीं है, सब कुछ हवा में डोल रहा है। ऐसे में आप भी तभिये यहां बढ़िया से जी सकते हैं, जब आप नंबर वन के हवाबाज हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आप हवाबाज हैं, तो बढ़िया नौकरी के साथ-साथ सभ्य अंदाज में कहें, तो बढ़िया बीवी भी पा सकते हैं। चमक-दमक में नहीं रहिएगा, तो लड़की आपके तरफ देखेगी भी नहीं। तभिये तो लड़कियों को ई दिखाने के लिए कि हमरे बटुए में बहुते पैसा है, जवान सब झपटमारी करने से लेके गाड़ी चुराने तक से नहीं हिचकते। एतना मेहनत के बाद जब उ बरांडेड कपड़ा औरो गाड़ी से लड़की को इमपरेस कर पाता है, तभिये उ उसकी गर्लफरेंड बनती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसने हाल नौकरी का है। अगर आप गीता के इस सिधांत में विशवास करते हैं कि 'काम किए जा, फल की चिंता मत कर', तो दिल्ली में रेता ढोने वाला गदहा भी आपसे बड़ा गदहा नहीं है। यहां तो हाल ई है कि आप काम भले नहीं कीजिए, लेकिन व्यस्त हरदम दिखए। ऑफिस में कंपूटर पर गेम खेलते रहिए, फोन पर बीवी से बतियाते रहिए, लेकिन हरदम शो कीजिए कि आफिस के काम से आपकी कमर झुकती जा रही है औरो आपके पास टायलेट जाने तक टैम नहीं है। देखिए, आफिस में आपका केतना इमपरेसन जमता है। अगर आप बॉस हैं, तो दिन में पांच बार मीटिंग बुलाइए। कोयो मुद्दा नहीं मिले, तो पिछला दिन के अपने परपोजल के बदला में रोज नया परपोजल पेश करते रहिए। बस ई देखाते रहिए कि आप कुछो कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नौकरी पाना है, तो बायोडाटा में हवाबाजी दिखाइए। अगर चपरासी की नौकरी चाहिए, तो लिखिए कि आप गदहे से भी बेसी सीधे व मूरख हैं औरो आपके मुंह में बोली हैइए नहीं है, भले ही नौकरी मिल जाने के बाद आप बात बात पर अपने अफसर का कालर पकड़ लें। ऐसने अगर आप अफसरी वाला नौकरी ढूंढ रहे हैं, तो ई लिखने से मत चूकिए कि आप एतना बेरहम हैं कि बीस आदमी का काम दो आदमी से करवाकर कमपनी का अठारह आदमी का खरचा बचा सकते हैं। अब जब आप एतना पैसा बचवा सकते हैं, तो ई हवाबाजी में दिखाने में कौनो हरज नहीं है कि आपकी असली औकात आपके अभी के पगार से चार गुना बेसी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो हवाबाजी फायदाकारक है, लेकिन कभियो-कभियो ई नुकसानो कर देता है। देश की धड़कन शेयर बाजार का पूरा मामले हवाबाजी पर टिकल है, तभिये तो दस टका का शेयर कल हजार टका हो जाता है, तो परसों सौ टका का। का है कि जब तक आपको उड़ाने वाले गुब्बारे को कोई छेड़ता नहीं, तब तक आप उड़ते रहिए, पिन चुभा नहीं कि आप गिरे धांय। हमरा एक मित्र है, बड़ी-बड़ी हांक के ही बड़ा आदमी हो गया है। दिल्ली का जेतना बड़का अफसर, मंत्री, नेता औरो बिजनेसमैन है, सब उसका चचा है, फूफा है या भैया है। उ इसी सब के नाम पर कमाता-खाता है। उसके हांकने से तंग होने के बाद हमरे पास एक ही रस्ता बचता है- उसको अपने चचाओं से कराने के लिए एक काम थमा देना, उ भी बिना घूस के। विशवास कीजिए उ महीनों तक हमको दरशन नहीं देता है औरो इसके बाद जब मिलता है, तब कहता है कि उस चचा से उसका रिलेशन खराब हो गया, इसलिए काम नहीं हुआ। हमरा काम भले ही नहीं होता, लेकिन महीनों तक उसकी हवाबाजी से मुक्ति तो मिल ही जाती है! तो आप भी खूब हवाबाजी कीजिए, बस सतर्क रहिए कि पिन न चुभे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रिय रंजन झा&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114683951726290590?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114683951726290590/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114683951726290590' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114683951726290590'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114683951726290590'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/05/blog-post.html' title='जमाना हवाबाजी का'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114631269219229340</id><published>2006-04-29T17:39:00.000+05:30</published><updated>2006-04-29T17:41:38.766+05:30</updated><title type='text'>प्यास बुझाइए मल्लिका के 'कर्व' से</title><content type='html'>प्यास बहुते तरह की होती है। कोई धन की प्यास से पीड़ित होता है, तो कोई तन की प्यास से, लेकिन दिल्ली वाला सब आजकल एक ठो बड़की प्यास- पानी की प्यास से पीड़ित है। ऐसे में हम ई सुन के परेशान हूं कि तीसरा विश्व युद्ध पानिए के खातिर होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, हमको प्यास ही नहीं, दूसरो चीज सब तेजी से बढ़ता दिख रहा है। दिल्ली का टम्परेचर बढ़ रहा है, क्राइम बढ़ रहा है, शेयर बाजार का सेंसेक्स बढ़ रहा है, तो सेक्स का सेंसेक्सो कम नहीं है। सोना की चमक देखकर लोग हैरान हैं, तो जिस चांदी को चोरो नहीं चुराता था, अब सोना से कमपिटीशन कर रहा है। और तो और किरकेटो पीछे नहीं है, रोज कोयो न कोयो पुराना रिकॉर्ड टूट जाता है, मतलब रन औरो विकेट की प्यास भी बढ़ रही है। अब जब एतना चीज के वास्ते तीसरा विश्व युद्ध नहीं होगा, तो ई बात हमरे समझ में नहीं आती कि पानी की खातिर तीसरा विश्व युद्ध काहे होगा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, ई आश्चर्य की बात तो है ही कि बड़की-बड़की प्यास से परेशान नहीं होने वाले दिल्ली के लोग एक ठो छोटकी प्यास, यानी पानी के प्यास से परेशान हो जाते हैं! अरे, जब आप धन की प्यास, मन की प्यास और तन की प्यास से परेशान नहीं होते, तो नाचीज पानी के प्यास से काहे परेशान होते हैं? और जब पानी जैसन चीज आपको एतना परेशान करती है, तो जेतना पसीना आप धन औरो तन की प्यास बुझाने के लिए बहाते हैं, ओतना पसीना पानियो जमा करने के लिए बहा के देखिए, सरकार के भरोसे काहे रहते हैं? जब धन की प्यास बुझाने के लिए लीगल- इलीगल सब काम आप खुदे ढूंढते औरो करते हैं, तन की प्यास बुझाने के लिए घर से बाहर तक का चक्कर लगाते हैं औरो बियाग्रा तक की तस्करी करवाते हैं, तो पानियो का लीगल-इलीगल जुगाड़ खुदे कीजिए। आप ही बताइए कि ई कहां का नियम है कि अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने के लिए पसीना बहाए आप औरो कंठ सूखे तो आपको पानी पिलाए सरकार!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार आपका केतना प्यास बुझाएगी। धन और तन की आपकी बढ़ती प्यास से दिल्ली सरकार पहिले से परेशान है। पैसा कमाने के लिए आपने अवैध निरमाण कराए, यमुना में घटिया केमिकल बहाए, गली-गली में ब्यूटी पार्लर औरो मसाज पार्लर खोलकर उसके आड़ में तन व धन दोनों की प्यास बुझाई, सरकार ने अपनी 'वोट की प्यास' को ध्यान में रखकर आपको अपनी ये सारी प्यास बुझाने भी दी-- उसने हाई कोर्ट में दिल्ली को हर दम साफ-सुथरा बताया। लेकिन दिक्कत ई है कि इस तरह उ कोर्ट के पावर की प्यास तो बुझा सकती है, लेकिन आपकी पानी की प्यास कभियो नहीं बुझा सकती, काहे कि पानी कागज पर नहीं आता। वैसे भी आपके कोर्ट में कागज चलता कहां है, आपको तो पानी से भरा बाल्टी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमरी मानिए, सरकार को छोडि़ए बाजार से कोल्ड डिरिन्क खरीदकर अपनी प्यास बुझाइए। अब तो आपको वैसे भी खुश होना चाहिए, काहे कि 'भीगे होंठ...' वाली मल्लिका सहरावत आपके लिए बोतल बनकर बाजार में गई है। तो बोतल उठाइए औरो उसमें मल्लिका के 'कर्व' को महसूस कीजिए। एक चीज याद आया, काहे नहीं मल्लिका को पानी का पीस एम्बेसेडर बना दिया जाए, तीसरा विश्व युद्ध का खतरे टल जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;का कहे, ई कर्व से पानी की प्यास तो बुझ जाएगी, लेकिन तन की प्यास औरो भड़क जाएगी! तो भाई साहब आप ही बताइए, इसमें मल्लिका की का गलती है? उसकी भी अपनी प्यास है भई। धन की प्यास बुझाने के लिए तन को बोतल बनवाने को अपराध थोड़े कहिएगा। आप तो बस खुद को भाग्यशाली मानिए कि आप प्यासे हैं, वरना मल्लिका आपकी मुट्ठी में काहे होती और कहां से आप महसूस करते 'कर्व' को!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रिय रंजन झा&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114631269219229340?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114631269219229340/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114631269219229340' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114631269219229340'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114631269219229340'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/04/blog-post_29.html' title='प्यास बुझाइए मल्लिका के &apos;कर्व&apos; से'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114563552074293629</id><published>2006-04-21T21:34:00.000+05:30</published><updated>2006-04-21T21:35:21.170+05:30</updated><title type='text'>नाम 'सोनिया' विहार औरो पानी मांगिए अमर सिंह से!</title><content type='html'>अक्सर ई कहा जाता है कि नाम में का रखा है, फूल को किसी भी नाम से पुकारिए फूल फूल ही रहता है! लेकिन हमको लगता है कि ई सब गुजरे जमाने की बात हो गई, अब तो नाम में ही सब कुछ रखा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीवी पर एक ठो विगयापन आता है, जिसमें हरि शब्द का स्पेलिंग कुछ ऐसन समझाया जाता है- - एच फोर हिटलर, ए फोर एरोगेंट, आर फोर रास्कल औरो आई फोर इडियट। अब आप कहिएगा, इसमें तो कुछो नहीं है, एक आदमी के नाम की स्पेलिंगे तो समझाया गया है, लेकिन ऐसन बात है नहीं। जिसको दिक्कत होना है, उसको होना है, आप कुछ नहीं कर सकते। तभिए न जॉब वेबसाइट के ई परचार को देखकर हरि नाम के एक ठो बचवा के बाप ने साइट पर केस कर दिया है औरो एक करोड़ हर्जाना मांगा है। जी हां, एक करोड़ मांगा गया है औरो आप कहते हैं कि नाम में कुछो नहीं रखा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर हम आपको ई कहें कि नाम के चक्कर में दिल्ली की जनता प्यासी मर रही है, तो आप नहीं मानिएगा, लेकिन सच यही है। का है कि दिल्ली सरकार करोड़ों टका लगाके जिस जल संयंत्र से दिल्ली की 'बड़ी प्यास' बुझाना चाह रही है, उसका नामे गलत रखा गया है-- सोनिया विहार जल संयंत्र। अब आप ही कहिए, एतना बड़का औरो वोट जुगाड़ू प्रोजेक्ट का नाम सोनिया गांधी के नाम पर रखिएगा औरो अमर सिंह व मुलायम सिंह से ई उम्मीद कीजिएगा कि उ इसको पानी सप्लाई करे, तो आप से बेसी बेवकूफ दुनिया में कौन हो सकता है? ई तो वही बात हो गई कि 'गांगुली फैंस क्लब' के उद्घाटन के लिए आप ग्रेग चैपल को बुलावा भेजें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, दिल्ली में ऐसन बत्तीसों नाम आपको मिल जाएंगे, जो एकदमे गलत रखा गया है। डीडीए को ही लीजिए, दिल्ली डेवलपमेंट अथारिटी के बदले इसका नाम अगर दिल्ली डिस्ट्रक्टिव अथारिटी रखा जाता, तो बेसी सही रहता। काहे कि डीडीए ने दिल्ली को केतना डेवलप किया है, ई नहिए बताया जाए, तो बढ़िया रहेगा। पहले नगर निगम को लोग नरक निगम कहते थे, तो सामने वाला समझ जाता था कि मजाक किया जा रहा है, लेकिन आज एमसीडी, यानी दिल्ली नगर निगम को अगर आप दिल्ली नरक निगम कहिएगा, तो कोर्ट भी आप पर डिफेमेशन का केस चलाने की इजाजत नहीं देगा। काहे कि कोर्ट खुदे कह चुका है कि एमसीडी पर ताला लगा देना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, खुद सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में कम नहीं है। उसको अंग्रेजी पेपर में एससी लिखा जाता है, लेकिन हम जब पेपर में एससी देखता हूं तो हमको उसका मतलब 'सनकी कोर्ट' समझ में आता है। मतलब ऐसन कोर्ट, जो किसी मामले को पकड़कर महीनो उसी को मथता रहे औरो परिणाम तक पहुंचाने से पहिले कौनो औरो मामला में बिजी हो जाए। इसको सनकी नहीं तो औरो का कहिएगा?&lt;br /&gt;इसी तरह सीपी यानी कनॉट प्लेस को कंजस्टेड प्लेस कहना बेसी बढ़िया होगा। यूं तो डीयू यानी दिल्ली यूनिवर्सिटी को डैमेज यूनिवर्सिटी कहना ही बेसी शोभता है। काहे कि दिनोंदिन उ बर्बादे हो रहा है। सीपी के बगले में बारखम्बा है। उसका नाम सुनकर हमरा एक मित्र वहां बारह ठो खम्भा तलाश रहा था, लेकिन उसे का पता कि गालिब की समाधि को मूत्रालय बना देने वाले हम धरोहर-प्रिय नागरिकों के देश में कोई धरोहर ढूंढना बुड़बकी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली जल बोर्ड को डीजेबी कहा जाता है, लेकिन जिस तरह से दिल्ली वालों का गला पानी के लिए सूखता रहता है, उसे देखके तो इसे डेड जल बोर्ड, यानी मृत जल बोर्ड ज्यादा बेहतर होगा। इसी तरह राजधानी की पुलिस अपने को डीपी लिखती है। वैसे तो इसको दिल्ली पुलिस पढ़ा जाता है, लेकिन इसे डिस्ट्रक्टिव पुलिस पढ़ना बेसी सही होगा। काहे कि अपराधियों को पकड़ने की आशा आप उनसे कर नहीं सकते, लेकिन डिस्ट्रक्शन का काम देकर देखिए उ केतना तेजी से करती है। प्रदर्शनकारियों पर उनसे लाठी चलवाकर देख लीजिए, सीलिंग के लिए दुकान बंद करवाकर देख लीजिए औरो अवैध निर्माण गिरवाने में उनसे मदद लेकर देख लीजिए, काम एकदम चोखा होगा कि आप भी आश्चर्य करेंगे!&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रिय रंजन झा&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114563552074293629?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114563552074293629/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114563552074293629' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114563552074293629'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114563552074293629'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/04/blog-post_21.html' title='नाम &apos;सोनिया&apos; विहार औरो पानी मांगिए अमर सिंह से!'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114502546427763784</id><published>2006-04-14T20:06:00.000+05:30</published><updated>2006-04-14T20:07:45.096+05:30</updated><title type='text'>चढ़ गया बेताल गाछ पर</title><content type='html'>लीजिए, आरक्षण का बेताल एक बेर फेरो गाछ पर चढ़ गया। अब हमरे समझ में ई नहीं आता है कि जब ई संभलता नहीं, तो नेता सब इसको छेड़ता क्यों है! हमको तो लगता है कि 'एक डेग आगे, दो डेग पीछे चलने' में हम सब एतना माहिर हो गए हैं कि अपने ही घर में आग लगाने से पहिले परिणाम के बारे में हम एको बार सोचते नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देख लीजिए, सब कुछ ठीके- ठाक न चल रहा था कि लगे नेता सब गुलाटी मारने। हमको तो ई नेता सब शनि देव का दूत लगता है-- देश का भला होते नहीं देख सकता। जैसने लगेगा कि बिना उसके कुछ किए भी देश विकास के एक्सप्रेस रोड पर दौड़ रहा है, टायर पंचर करने के लिए उ एक लाइन से सौ ठो कांटी रोड पर ठोंक देंगे। लीजिए, अब आप करते रहिए विकास! आपके पास दो ठो बढ़िया इंस्टीच्यूट हुआ नहीं कि लगे थे आप ऐंठने- - विश्वस्तरीय संस्थान है, नॉलेज की खान है, देश की शान है... औरो पता नहीं क्या क्या गलतफहमी हो गई थी आप लोगों को। पांच ठो आईआईएम और आईआईटी नहीं हो गया, समझने लगे थे कि देश ब्रिटेन औरो अमेरिका हो गया। अरे, आपको समझना चाहिए था कि ब्रिटेन औरो अमेरिका में भारतीय नेता जैसन जीव नहीं पैदा होते, इसलिए वहां केम्ब्रिज औरो मेसाचुएट्स जैसन संस्थान है। अगर वहां भी ऐसन जीव पैदा होता, तो केम्ब्रिज औरो मेसाचुएट्स पटना औरो लखनऊ विश्वविद्यालय जैसन सड़ रहा होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसन आप गलतफहमी के शिकार हैं, वैसने ई नेता सब भी हैं। आखिर उ लोग भी अपने को देश का भाग्य विधाते न समझते हैं। वैसे, उ भाग्य विधाता तो हैं ही, देश के विकास में उनका योगदान भले कुछो नहीं हो, लेकिन विनाश में तो उ पूरा-पूरा योगदान करवे करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, आरक्षण जैसन समस्या का एक ठो बढ़िया विकल्प हमरे पास है। चलिए आपको भी बता ही देता हूं। का है कि आश्चर्यजनक रूप से एक्कीसवीं शताब्दियों में भगवान का अस्तित्व कायम है औरो मजबूरी में लोग उसको सृष्टिकर्ता मान लेते हैं। तो काहे नहीं कुछ ऐसन किया जाए कि भगवान को मजबूर किया जाए कि उ मानव उत्पादन वाला अपना फैकटरी में जातिगत कोटा लागू कर दें-- फारवर्ड में मात्र पांच परसेंट काम करने वाला दिमाग फिट किया जाए और बैकवार्ड में हंडरेड परसेंट काम करने वाला दिमाग। सवर्णों के पास दिमागे नहीं होगा, तो पढ़ेगा क्या! और पढ़वे नहीं करेगा, तो आईआईटी औरो आईआईएम जैसन परीक्षा देगा कैसे? और जब परीक्षे नहीं देगा, तो आरक्षण का झंझटे खतम। जब फारवर्ड पढ़ेगा नहीं, तो सब नौकरी बैकवार्डे को न मिलेगा। तब आजादी के पहिले से लेके अभी तक के नेता सब के सपना एके झटका में सच हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ई बात तो आप भी सुने होंगे न कि अपराध मिटाना है, तो उसके स्त्रोत पर चोट कीजिए। यही बात यहां भी लागू होती है। आरक्षण का झंझट जड़ से खतम करना है, तो भगवान के यहां दिमाग का कोटा लागू करवा दीजिए। देखिए, अगर दिमाग होगा, तो लोग उसका उपयोग करेगा ही और उपयोग करेगा, तो ज्यादा नंबर लेके नौकरी और कॉलेज पर कब्जा करवे करेगा। अब हर कोई भारतीय नेता तो है नहीं कि दिमाग रहते हुए भी उसका उपयोग न करे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रिय रंजन झा&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114502546427763784?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114502546427763784/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114502546427763784' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114502546427763784'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114502546427763784'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/04/blog-post_14.html' title='चढ़ गया बेताल गाछ पर'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114485801326681479</id><published>2006-04-12T21:35:00.000+05:30</published><updated>2006-04-12T21:36:54.726+05:30</updated><title type='text'>सुंदरता की कीमत भुगतिए</title><content type='html'>खूबसूरती जेतना बढ़िया चीज है, ओतना ही महंगा भी। विश्वास नहीं हो, तो दिल्लिये को देख लीजिए, सुंदर बनने के चक्कर में केतना भारी कीमत चुकाना पड़ रहा है इसको। खुद तो सुंदर बन रही है, लेकिन दिल्लीवाले भीख मांगने के लिए कटोरा का जुगाड़ कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमको तो दिल्ली ऐसन नबकी दुल्हन लगती है, जिसके ब्यूटी पार्लर के खरचा से बेचारे घरवाले के सामने भूखों मरने की नौबत आने वाली है। आखिर एक दुकान बंद होगी, तो बीस लोगों के पेट पर लात पड़ेगी भाई! ऐसे में हमरे समझ में ई नहीं आता कि ई सब हो किसके लिए रहा है। अगर अस्सी प्रतिशत दिल्ली उजड़ जाएगी और आधा से बेसी दुकान बंद, तो दिल्ली में रहबे कौन करेगा? तब कॉमनवेल्थ गेम में भले ही दिल्ली चकाचक दिखे, लेकिन गेम देखने वाला कोयो नहीं होगा और जो होगा भी, उहो मरियल दिखेगा- कुपोषित औरो कुरूप - एकदम सोमालिया वासी जैसे। खैर, सबसे खुश भिखमंगों का ठेकेदार होगा, क्योंकि कॉमनवेल्थ गेम जैसे मेले में कमाने के लिए उसे कुछ और भिखारी मिल जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भीख नहीं मांगेगा, उ दिल्ली छोड़ देगा और इससे सबसे बेसी खुश होंगी शीला दीक्षित। आखिर दिल्ली की दुर्दशा के लिए उ बाहरी लोगों को जिम्मेदार जो मानती हैं। अब ई बात अलग है कि जहां अवैध निरमाण के वास्ते खुद मुख्यमंत्री को नोटिस मिला हो, उस राज्य में भला बाहरी आदमी को अव्यवस्था फैलाने की का जरूरत है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप ही सोचिए, चकाचक मेट्रो स्टेशन औरो फ्लाई ओवर के सामने में खड़े भिखमंगों की फौज कैसन दिखेगी और विदेशी मेहमानों का रिएक्शन का होगा? तब शायद कोर्ट को भी यह अहसास हो कि इससे बढ़िया तो बदरंग दिल्ली थी। बेसी सुंदर बनाने के चक्कर में बेकारे हमने इसका इज्जत उतार दिया।&lt;br /&gt;वैसे, हमको तो लगता है कि बेसी सुंदर दिखने के चक्कर में इज्जत का उतरना तय ही होता है। अब देख लीजिए, बम्बे फैशन वीक में उ खूबसूरत मॉडलों के साथ का हुआ? भरी सभा में एक की चोली सरक गई, तो दूसरी की स्कर्ट फट गई। अब देह की ऊंचाई-निचाई के एक-एक इंच को झलकाने के लिए बेताब रहिएगा, तो ऐसने न कपड़ा फटेगा औरो इज्जत उतरेगा! कोर्ट भी नहीं चाहता कि दिल्ली का एको इंच गंदा दिखे, इसलिए न उ लोगों को भिखारी बना रहा है। बहुत सीधा फंडा है, सुंदरता की कीमत बेइज्जत होकर चुकाइए और मुगालते में जीइए कि आप बहुते सुंदर हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, सुंदरता के मुगालते में तो आप भी जी रहे हैं और इसकी कीमत बेइज्जत होकर चुका रहे हैं। बेचारी यमुना आपके सौंदर्यबोध के चलते नाला बन गई है और आप पानी के लिए ऊपी के हाथों बेइज्जत हो रहे हैं। आप सुंदर दिखने के लिए जेतना अधिक मेहनत करते हैं, यमुना ओतना अधिक परदूषित होती है। भोर में दांत चमकाने के बहाने टन के हिसाब से पेस्ट का केमिकल यमुना में बहाते हैं, तो गोरा बनने के लिए देह में बेहिसाब साबुन घिसते हैं। अब चमकने के लिए एतना केमिकल परयोग करेंगे, तो उसको पीने वाली यमुना नाला ही बनेगी ना! और जब यमुना नाला बनेगी, तो आपका गला ऐसे ही सूखता रहेगा और ऊपी आपकी इज्जत उतारता रहेगा। तो आप भी सुंदर बनते रहिए और उसकी कीमत ऊपी से पानी की भीख मांगकर चुकाते रहिए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Article: PRJ&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114485801326681479?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114485801326681479/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114485801326681479' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114485801326681479'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114485801326681479'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/04/blog-post_12.html' title='सुंदरता की कीमत भुगतिए'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114475424871797998</id><published>2006-04-11T16:42:00.000+05:30</published><updated>2006-04-11T16:47:29.630+05:30</updated><title type='text'>खुश रहना है तो रोकर देखिए</title><content type='html'>आपने हास्य चिकित्सा या संगीत चिकित्सा के बारे में तो सुना होगा, लेकिन क्या रोकर खुद को तनाव से मुक्ति दिलाई जा सकती है? रोकर मन का भार हल्का कर लेने के फार्मूले को अब थेरेपी के रूप में प्रयोग किया जा रहा है.  जापान में वीपिंग थेरेपी तेजी से लोकप्रिय हो रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग रोकर तनावमुक्त और तरोताजा महसूस करते हैं। रोने से व्यक्ति की कुंठाएं और तनाव आंसुओं में बह जाता है। रोने के समय व्यक्ति खास तरह के आनंद का अनुभव करते हैं। असाही शिंबुन अखबार ने 1858 लोगों पर इस थेरेपी को लेकर यह सर्वे कराया। एक 34 वर्षीय व्यक्ति ने कहा कि जब से उन्होंने यह प्रयोग अपने जीवन में अपनाया है, वे अधिक खुश होने लगे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114475424871797998?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114475424871797998/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114475424871797998' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114475424871797998'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114475424871797998'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/04/blog-post.html' title='खुश रहना है तो रोकर देखिए'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114381185521705016</id><published>2006-03-31T19:00:00.000+05:30</published><updated>2006-03-31T19:59:33.600+05:30</updated><title type='text'>व्यर्थ है यह मूर्ख दिवस</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;हे नादान आम आदमियों&lt;br /&gt;                हमेशा मूर्ख बनते रहो &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;आज मूर्ख दिवस है, यानी लोगों को बेवकूफ बनाने का एक सुनहरा दिन। आज आप दूसरों को गुस्से में अपने बाल नोचने की हद तक पहुंचाने लायक मूर्ख बनाने का अधिकार रखते हैं और वह भी बिना कोई गाली खाए! आमतौर पर जब आप कोई खास दिवस मनाते हैं, तो उसके पीछे उद्देश्य यह होता है कि उस दिन किसी ऐसे उपेक्षित चीज या फिर शख्स को याद कर लिया जाए, जिसे आप साल भर याद नहीं रखते, जैसे आप महिला दिवस, शहीद दिवस आदि मनाते हैं। ऐसे में मेरे समझ में यह बात नहीं आती कि आप लोग मूर्ख दिवस क्यों मनाते हैं? क्योंकि आप तो डेग-डेग पर दूसरों के द्वारा मूर्ख बनाए जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वैसे, आप इतने भोले हैं ही कि आपको मूर्ख बनाने में दूसरों को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है। अब अगर बिना किसी मेहनत के कोई मूर्ख बन जाए, तो उसे मूर्ख नहीं बनाने वाला ही तो बेवकूफ कहलाएगा न। ऐसे में आपको बेवकूफ बनाने वालों की भी कोई गलती नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आप ही देख लीजिए कि आपको सालों भर मूर्ख बनाया जाता है और आप आप हैं कि आज मूर्ख दिवस मना रहे हैं। अभी-अभी सरकार ने अध्यादेश जारी कर आपको कुछ दिनों के लिए ही सही, मूर्ख तो बना ही दिया। आप यह सोचकर खुश हैं कि सरकार ने मिक्स्ड लैंड यूज के तहत आपको फूल लिबर्टी दे दी है कि आप नीचे दुकान रखिए और ऊपर मकान। कितने भोले हैं आप! आपको नहीं पता कि कल कोर्ट इस अध्यादेश को मानने से इनकार भी कर सकता है। तब सरकार आपसे कहेगी, 'लो, मैंने तो तुम्हारे कल्याण लाने के लिए कानून बनाया, लेकिन कोर्ट ने लंगड़ी लगा दी। अब मैं क्या करूं?' फिर वह आपसे सहानुभूति जताते हुए एक नया चुग्गा डालेगी और मुझे पूरा विश्वास है कि आप उस पर भी विश्वास कर लेंगे और अगले चुनाव में कांग्रेस को डुबाने की बात नहीं करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे ज्यादा मूर्ख तो आप बाजार के हाथों बनते हैं। आप 'सेल' में जाकर सौ रुपये की चीज दो सौ में खरीदते हैं और फिर भी खुशी-खुशी सबको यह बताते फिरते हैं कि आपने वह चीज सस्ते में 'लूट' ली है। ऐसे में अगर कोई आपसे यह कह दें कि आप ठगा गए हैं, तो बुरा मानने में आपको मिनट नहीं लगता। आप मान लेते हैं कि सामने वाले के लिए 'अंगूर खट्टे हैं' वाली बात है। वह तो आपकी सस्ती खरीदारी से जल रहा है। तो इतने बेवकूफ हैं आप।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे तो विश्वास नहीं होता कि आप एक रुपये के लिए भी मूर्ख बन सकते हैं, जबकि हकीकत यही है कि बाजार आपको एक रुपये के लिए मूर्ख बना डालती है। आप कोई घटिया-सा डिटरजेंट या साबुन भी थोक में सिर्फ इसलिए खरीद डालते हैं कि उसकी खरीद पर एक रुपये की छूट का ऑफर होता है। तब आप एक मिनट को भी यह नहीं सोचते कि यह छूट आपकी सेहत पर भारी पड़ सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हद तो यह है कि आप खुद यह जानते हुए भी मूर्ख बन जाते हैं कि आपको बेवकूफ बनाया जा रहा है। इस तरह से मूर्ख बनाने में अपने देश की मनोरंजन इंडस्ट्री सबसे आगे है, लेकिन आप इतने भोले हैं कि आप उनका कभी बुरा नहीं मानते। क्या आपको याद है कि टीवी पर आने वाले रियलिटी शोज के अमित शाना, अभिजीत सावंत, काजी तौकीर, देबोजीत, विनीत आदि के रोने-गिड़गिड़ाने और इमोशनल ब्लैक मेलिंग के झांसे में आकर कितने रुपये एसएमएस और फोन कॉल्स में फूंके हैं या फिर करोड़ों रुपया जीतने के लिए केबीसी, कम या ज्यादा और डील या नो डील में कितने कॉल्स किए हैं? नहीं याद है न। होगा भी नहीं, यही तो बाजार की मीठी चाकू है, जिससे आपकी जेब काट ली जाती है और आपको पता भी नहीं चलता। कितने मूर्ख हैं आप कि गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए आप दो रुपये दान नहीं कर सकते, लेकिन ऐसे शोज के लिए एक एसएमएस पर छह रुपये खर्च करने में भी आपको कोई हिचक नहीं होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपकी बेवकूफी का फायदा आपके बॉस भी कम नहीं उठाते। वह आपको साल भर यह आश्वासन देते रहते हैं कि आपके काम को देखते हुए इस बार वह आपको जरूर जबर्दस्त इंक्रीमेंट दिलवाएंगे, लेकिन होता कुछ नहीं। फिर भी आप इस आशा में ऑफिस में हाड़-तोड़ मेहनत करते रहते हैं कि अगले साल जरूर आपकी सेलरी अच्छी-खासी बढ़ जाएगी। यह सिलसिला कई सालों तक चलता रहता है और फिर आप इतने घिसे-पिटे हो चुके होते हैं कि कोई दूसरा आपको अपने यहां नौकरी नहीं देता!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां तक कि चौबीस घंट का खबरिया चैनल भी आपको मूर्ख बनाता रहता है। जब सचिन क्रिकेट टीम में नहीं होता, तब भी उसकी पूरी जीवनी दिखाता है और जब शतक मारता है, तब भी। अमिताभ की अमित कथा तब भी दिखाई जाती है, जब अमिताभ बीमार पड़ते हैं और तब भी दिखाई जाती है, जब जया बच्चन राज्यसभा से विदा होती हैं। और आप भी कम नहीं हैं, महीने में पांच बार एक ही चीज देखकर भी आपका जी नहीं उबता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलचस्प बात यह है कि मनोरंजन के नाम पर जो टीवी सीरियल आपको जितना अधिक बेवकूफ बनाता है, आप उसकी टीआरपी रेटिंग उतनी ही हाई कर देते हैं। अब तो मैं विश्वास करने लगा हूं कि आपको कोई मूर्ख बना रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह ज्यादा चालाक है, बल्कि वह इसलिए सफल हो जाता है कि आप अव्वल दर्जे के बेवकूफ हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आप बेवकूफ नहीं होते, तो चोपड़ाओं या जौहरों की फिल्में बनाने वाली दुकानें इतनी कमाई नहीं कर रही होतीं। वे अपनी पिछली फिल्म में ही थोड़ा-सा तड़का लगाकर आपके सामने परोस देते हैं और आप हैं कि उसे नई डिश समझकर उस पर टूट पड़ते हैं। आप बोस पर बनी अच्छी फिल्म को नकार सकते हैं, आप गांधी के बहाने संवेदनशील फिल्म बनाने वाले अनुपम खेर की हौसला आफजाई नहीं कर सकते, लेकिन मसाले में रंगी बसंती आपको बहुत भाती है। स्थिति तो यह है कि बेचारे गूंगे इकबाल की क्रिकेट में आपको कोई दिलचस्पी नहीं होती, लेकिन आमिर की मसालेदार क्रिकेट आपसे पूरा लगान वसूल लेती है। ऐसे में मुझे तो यही लगता है कि कुछ लोगों ने आपको मूर्ख बनाने के लिए आपकी कमजोर नस पहचान ली है और वे उसी के अनुसार आपको आसानी से बेवकूफ बनाते रहते हैं। आप हैं कि खुशी-खुशी बनते भी रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही अगर आप पुरुष हैं, तो आपको अंदाजा होगा कि कैसे आपकी बीवी साल भर मूर्ख बनाकर आपसे काम निकालती रहती हैं और अगर आप महिला हैं, तो आपको यह पता होगा कि कैसे हर असंभव काम को करने के लिए आपको नई जूलरी का प्रलोभन दिया जाता है। अगर आप बच्चे के अभिभावक हैं, तो आपको पता होगा कि बच्चे जब आपको बेवकूफ बना रहे होते हैं, तो कितने मासूम लगते हैं और अगर आप बच्चे को बेवकूफ बना रहे होते हैं, तो आपको कितना संतोष मिलता है, यह सोचकर कि आपने उसे फुसला लिया है। फिर यह काम तो साल भर चलता रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, मुझे लगता है कि आप मूर्ख बन जाते हैं, तो इसमें बहुत ज्यादा आपकी गलती भी नहीं है। दिक्कत यह है कि आप अव्वल दर्जे के संवेदनशील लोग हैं, इसलिए आप जल्दी बेवकूफ बन जाते हैं। रोने-धोने और पारिवारिक मूल्यों की बातें पता नहीं क्यों आपको इतना द्रवित कर देती हैं कि आप मूर्ख बन जाते हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, लीजिए, लगे हाथ मैंने भी आपको मूर्ख बना डाला। आपने सोचा होगा कि मैंने कितनी बड़ी-बड़ी बातें कर लीं, लेकिन आप ही बताइए इसमें कौन-सी बात मैंने नई कही है? फिर इतना बड़ा लेख पढ़कर आप भी तो मूर्ख ही बन गए न! अब आप ही बताइए, जब साल भर आप बेवकूफ बनते रहते हैं, तो फिर आज मूर्ख दिवस क्यों मना रहे हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;आपका&lt;br /&gt;महामूर्खाधिपति&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114381185521705016?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114381185521705016/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114381185521705016' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114381185521705016'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114381185521705016'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/03/blog-post_31.html' title='व्यर्थ है यह मूर्ख दिवस'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114372243662720301</id><published>2006-03-30T18:09:00.000+05:30</published><updated>2006-03-30T18:10:52.706+05:30</updated><title type='text'>दोहरे लाभ का चक्कर</title><content type='html'>दिल्ली में आजकल खूब झगड़ा हो रहा है। जनता जनता से लड़ रही है, नेता नेता से लड़ रहा है, तो कोर्ट सरकार से। कोई किसी को दोहरा लाभ होते नहीं देखना चाहता। अगर आप नेता हैं, तो लाभ का दो पद नहीं चलेगा औरो अगर जनता हैं, तो दोहरा लाभ नहीं चलेगा। खैर, जनता औरो नेता सब का आपस में लड़ना तो उनका जनम सिद्ध अधिकार है, लेकिन दुकानदार से जो रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन सब लड़ाई लड़ रहा है, उहो कम मजेदार नहीं है। हमरे मित्र हैं बाबू साहेब। एक ठो ऐसने एसोसिएशन के उ लीडर हैं। उ दू घंटा कोर्ट में इसलिए टैम देते हैं, ताकि एम्स रोड वाली अपनी दुकान बंद होने से बचा सके, तो पांच घंटा एसोसिएशन की मीटिंग में इसलिए टैम देते हैं, ताकि अपनी कॉलोनी के दुकानदारों की दुकान बंद करवा सके। दिल्ली का आधा आदमी अभी आपको बाबू साहेब के जैसे आधा दिन कोर्ट का समर्थन करते, तो आधा दिन कोर्ट को गरियाते मिल जाएंगे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतलब ई कि अपना तो दोहरा लाभ सब लेना चाहता है, लेकिन दूसरा ई फायदा उठाए, ई बात किसी को हजम नहीं हो रहा। अब कांग्रेसिये सब को देख लीजिए, जया बच्चन को लाभ के दू ठो पद पर देखना नहीं चाहते थे, लेकिन सोनिया लपेटे में आ गईं, तो सब को मिर्ची लग गई। हमको तो लगता है कि ई सब ईर्ष्या के कारण हो रहा है। आखिर घर में पत्नी और बाहर में प्रेमिका से गुटरगूं करने का दोहरा लाभ किसी और को होते कोई कैसे देख सकता है। हां, अगर खुद ऐसन मौका मिले, तो ई पुण्य कार्य कोयो छोड़ना नहीं चाहता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ई ईर्ष्या बड़ी खराब चीज है हो। अब जो हमरे बाबू साहेब उनको कोयो और दिक्कत नहीं है। दिक्कत है तो बस एतना कि उनका पड़ोसी अपने घर में दुकान चलाता है। बाबू साहेब को ई बात बहुते अखरती है। कहां तो 20 किलोमीटर दूर अपनी दुकान पर रहकर दिन भर में उ घरवाली का एक-दू चुम्मा ही ले पाते हैं औरो उहो फोन पर, जबकि उनका पड़ोसी दिन भर बीवी की आंचल की हवा खाता रहता है। उसका दुकान का दुकान चल रहा है औरो चौबीसो घंटे बीवी का प्यारो मिल रहा है। बाबू साहेब की आंखों में पड़ोसी को मिल रहा यही दोहरा लाभ चुभ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, बाबू साहेब दोहरा लाभ के विरोधी वैसने नहीं हैं। परिस्थिति ने उनको ऐसा बना दिया है। उ खुद हरियाणा से हैं, जहां लोग सब को बेटी तो नहीं चाहिए, लेकिन बेटे की शादी के लिए लड़की जरूर चाहिए। तमाम जुगत लगाकर उ बेटी का बाप होने से तो बच गए, लेकिन जबसे उनके नौकर ने लड़की खरीदकर शादी की है, उ चिंतित हो रहे हैं। बेटी को पालने और शादी की खरच से तो उ बच गए, लेकिन लड़कियों के अकाल में उनके बेटे को दस साल बाद बीवी नहीं मिलेगी, इसको लेकर उ चिंतित हैं। और तो और उनका दांव तब भी उल्टा पड़ा था, जब उन्होंने अपने सोसाइटी के आगे की झुग्गी बस्ती को ई सोचकर तुड़वा दिया था कि इससे सोसाइटी बदसूरत लगती है। सोसाइटी तो खूबसूरत लगने लगी, लेकिन झुग्गी टूटने से उसमें रहने वाली उनकी नौकरानी ने भी नौकरी छोड़ दी। फिर तो बाबू साहेब की बीवी ने बाबू साहेब की ऐसी फजीहत की कि सोसाइटी की खूबसूरती को वर्षों याद रखेंगे।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रिय रंजन झा&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114372243662720301?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114372243662720301/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114372243662720301' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114372243662720301'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114372243662720301'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/03/blog-post_30.html' title='दोहरे लाभ का चक्कर'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114311636834882563</id><published>2006-03-23T17:47:00.000+05:30</published><updated>2006-03-23T17:49:29.936+05:30</updated><title type='text'>काहे का वसंत?</title><content type='html'>अब तो होली भी हो ली और वसंत भी लगभग बीतने वाला है। ऐसे में हमने सोचा कि ई आकलन किया जाए कि अब मौसम या परब जैसन चीज लोग सब पर कौनो असर करती है कि नहीं। लोग कहते हैं कि होली दुश्मनों को दोस्त बना देती है और वसंत प्यार-मोहब्बत वाला मौसम है, लेकिन हम इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि ई सब खाली कहने-सुनने की बात है। फैक्ट तो ई है कि मौसम और परब-उरब अब आदमी सब पर कुछो असर नहीं करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देखिए अपने खुराना जी को, ऐन होली के मौके पर भाइयों ने उनको बेआबरू करके पार्टी से विदा कर दिया। अब बताइए, उनके लिए होली किस काम की? होली काम आती, तो शीला दीक्षित और रामबाबू शर्मा अभियो एक-दूसरे का टांग नहीं खींच रहे होते। शीला तो रंग-अबीर के साथ रामबाबू की जेब में अपने साथ ऑस्टेलिया चलने के लिए एयर टिकट ठूंस रही होतीं। ऐसने अगर होली काम की होती, तो जया बच्चन अभियो यहां संसद भवन के गलियारे में घूम रही होतीं। कलाकार सब को ससम्मान अपना सदस्य बनाने वाले संसद से उन्हें बेगाना होकर निकलना नहीं पड़ता। रंग-अबीर से काम चलता, तो सब बैर-भाव भूलकर सोनिया अपने खुर्राट चेला सब से कहतीं--होली जैसे हंसने-खेलने वाले परब के तुरंत बाद किसी को रुलाना ठीक नहीं। चलो रहने दो इनको राज्यसभा सदस्य, जब हम दो ठो पोस्ट पर रह सकती हूं, तो ई क्यों नहीं रह सकतीं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और तो और अगर होली काम की होती, तो दूध की नदी बहाने वाले वर्गीज कुरियन अभियो अमूल दूध पी रहे होते। होली के हसीन मौका पर अगर उ अमूल बटर से अपने विरोधियों को नहीं मना सके, तो नेताओं की बटरिंग करके तो कुर्सी बचा ही सकते थे! परब पर तो बटरिंग को 'बाई डिफाल्ट' वाजिब माना जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि असली होली तब होती थी, जब रंग-अबीर के साथ मानवता का जशन मनाया जाता था। तब राजा सब होली से पहले सैकड़ों कैदियों को छोड़ देते थे औरो लोग मौत का बदला लेना भी भूल जाते थे। अब तो कोर्ट औरो सरकार होलियो के दिन गरीब जनता पर बुलडोजर चलाने की पलानिंग करती है औरो जिस आदमी के स्वस्थ रहने के लिए पूरा देश प्रार्थना करता है, उस 'सदी के महानायक' को एक अदना व्यापारी के जैसे ऐन होली के मौका पर इनकम टैक्स ऑफिस का चक्कर लगाना पड़ता है। सच कहूं, तो हमको तो कभियो-कभियो चिंता होने लगती है कि देश एतना सुधर जाएगा, तो इसका भविष्य का होगा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तनिक वसंत की महिमा देखिए। अगर वसंत प्यार-मोहब्बत का मौसम होता, तो रानी को भूला करके अभिषेक भला ऐश्वर्या की जनम कुंडली काहे मिलवा रहे होते? कम से कम अभिषेक ममता बनर्जी से तो सीख ले ही सकते थे। जैसन ममता ने कांगेस को बंगाल में और राजग को दिल्ली में चुनावी हनीमून के लिए परपोज किया, वैसने परपोजल अभिषेक रानी और ऐश्वर्या को भी दे सकते थे। वसंत में नया प्यार होने का मतलब ई थोड़े है कि आप गरमी में हुए प्यार को भूल जाइए? वैसे, हमको कांग्रेस सबसे ज्यादा वसंत विरोधी दिख रही है। अब देख लीजिए, अमर भैया का पूरा वसंत खराब करने का आरोप उसी पर लगा है कि नहीं। का है कि वसंत जैसन मौसम में उनके जैसन रसिया का अगर टेलिफोन टेप हो रहा है, तो प्यार-मोहब्बत को लेकर शिवसेना औरो कांग्रेस में कहां कौनो फरक रह जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और तो और अगर वसंत में एतना ही प्यार बरसता, तो वसंतोत्सव पर पाकिस्तान पहुंच करके जार्ज बुश मुशर्रफ को वर्दी उतारने के लिए गरिया काहे रहे होते? तब तो बसंती बयार में बौरा करके मुश बुश से कहते-- प्यारे इस डरेस में तुम खूब जमते हो, जनम भर इसे ही पहने रहो। वसंती बयार केतना फीका हो गया है, इसका परमाण ई भी है कि सचिन जैसे भगवान को उनके बम्बे वालों, मतलब 'मराठी मानूषों' ने भी ऐन वसंत के महीने में हूट कर दिया! अब ई तो वसंत की औकात हो गई है कि बीस-पच्चीस रन उस पर भारी पड़ रहा है। अब आप ही बताइए, काहे की होली और काहे का वसंत?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Article: PRJ&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114311636834882563?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114311636834882563/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114311636834882563' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114311636834882563'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114311636834882563'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/03/blog-post_114311636834882563.html' title='काहे का वसंत?'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114310728267303582</id><published>2006-03-23T15:16:00.000+05:30</published><updated>2006-03-23T17:28:00.380+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;सभी ब्लॉगर मित्रों को होली की हार्दिक शुभकामनाएं. हैरान न हों..... भारतीय पोस्टल सर्विस की तरह त्योहार बीतने के बाद पहुंच रहे शुभकामना संदेश की भांति आप तक मेरा ये संदेश देरी से नहीं पहुंचा है बल्कि मेरी अस्वस्थतता के चलते आप लोगों को बधाई देने में देरी हुई है. इसी कारण पिछले 15-20 दिनों से ब्लॉग पर कुछ कार्य नहीं हो पाया. उम्मीद है आप सभी की होली अच्छी बीती होगी. अब मैं भी मंडली में फिर क्रियाशील होने के लिए पूरी तरह स्वस्थ्य हूं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;आज आप सब के लिए प्रिय रंजन झा की कलम से वसंत व होली विशेष....&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114310728267303582?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114310728267303582/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114310728267303582' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114310728267303582'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114310728267303582'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/03/blog-post_114310728267303582.html' title=''/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114310716204931098</id><published>2006-03-23T14:56:00.000+05:30</published><updated>2006-03-23T17:45:31.170+05:30</updated><title type='text'>दिल्ली की होली</title><content type='html'>होली जैसा परब और दिल्ली जैसा शहर। यहां के अपार्टमेंट कल्चर में जहां कि ई पूछ के रंग लगाना पड़ता है कि कहीं सामने वाला बुरा न मान जाए, एडिटर के निरदेश पर हम निकल पड़े होली का तैयारी देखने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले हम पहुंचे कुरताफाड़ होली खेलने वाले 'गरीबों के मसीहा' के पास। हमने पूछा अबकी बेर केतना कुरता फाड़ना है? नराज हो गए, 'धुर बुड़बक, जले पर नमक छिड़कते हो। मीसा की महतारी का राज खतम हो गया, बारह ठो लोगों का पेट चलाने के लिए अकेला एक रेलवे वाला राज बचा है। उस पर कुरता फाड़े, तो देह ढकने के लिए कुरता का तुम दोगे?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीके कहा उन्होंने, पिछले साल तो बिहार जैसन भैंस तबेले में थी, जब चाहा दुह लिया, अब का बैल दूहेंगे! अब हम जाना तो रबड़ी जी के पास भी चाहते थे, लेकिन जब से उनने विधानसभा में सत्ता पक्ष को चप्पल दिखाया है, हम कोनो गुस्ताखी करने से डर रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गरीबों के मसीहा का ई हाल देखा, तो सोचा तनिक गरीबो सब को देख लिया जाए। सो पहुंच गए कलुआ की झुग्गी में। वहां हड्डी का ढेर लगा था। हमने पूछा होली ...? बोला, 'एकदम टंच। इससे बढ़िया होली का होगा... आलू के भाव मुर्गा बिक रहा है... सुबह से शाम तक खाता रहता हूं... सब कुपोषण महीने भर में दूर हो गया। बर्ड फलू बहुत सही चीज है हो, ई साल भर नहीं रह सकता?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बर्ड फलू के नाम सुनते ही हमरा होश गुम हो गया। वहां से निकले, तो चंदरमोहन जी के कुत्ता सब पीछे पड़ गया। तनिए दूर पर घेर के लगा भूंकने, 'बेकारे भाग रहे थे, तुम्हरे जैसे निरीह आदमी को काटकर हम क्या करूंगा? हमलोग तो ई कह रहा हूं कि हमरी होली एकदम झकास है। सहिए कहता है आदमी सब कि एक दिन कुत्ता का दिन भी फिरता है। देख लो, विदेशी ही सही, लेकिन अपना एक भाई, उस समाधि तक तो पहुंचिए न गया, जहां तुम भी नहीं जा सकते। हमरा लिए ई गरव का बात है, इसलिए एतना खुश हूं कि भर रात 'फाग के राग' में बिना कोनो कारण के भूंकता रहता हूं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले कि ऊ टांग उठाता हमको रंगने के लिए, हम भाग लिए। रास्ते में कुछ कामरेड दादा भांग वाला रसगुल्ला उड़ाते मिल गए। अजीब ई था कि एतना भांग खाने के बाद भी उनको नशा नहीं आ रहा था! फिर जला हमरे दिमाग का भुकभुकिया ...याद आया कि आजकल तो ई लोग सत्ता के नशा में हैं। एतना बड़ा नशा के सामने भला भांग कहां से असर करेगा! खैर, हमने पूछा होली... ? बोल पड़े, 'होली तो होली, हम तो दीवालियो अभिए मना रहा हूं। का है कि बिहार चुनाव का हीरो के जे राव चुनाव आयोग छोड़ चुके हैं। मतलब ई बंगाल में सत्ता के रास्ता का सबसे बड़का कांटा खुदे निकल गया। अब तो सत्ता तय है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी समय बगल से कोर्ट के एक ठो जज गुजर रहे थे। बेचारा कार से निकले, कमर झुका हुआ था। बोले, 'काम करते-करते कमर टूट गया। दिल्ली में सरकार तो कोर्ट से ही चलता है। आज जेसिका लाल का हत्यारा ढूंढो, कल पूरा दिल्ली का नाला साफ करवाओ ... दिल्ली में व्यवस्था कायम करने से फुर्सत मिले, तब न होली मनाएं।' तब तक वहां दिल्ली के कुछ नेता सब रंग-अबीर पोत के पहुंच गए। कहने लगे, 'जज तो बेकारे शहर के अंदेशे में काजी जी जैसे दुबले हो रहे हैं। भांग खाके होली मनाएंगे, सो नहीं, तो हमरी फटी में टांग अड़ाते हैं। हमरी होली टंच है काहे कि हमरा होटल अवैध निरमाण के बावजूद टूटा नहीं है औरो उ नेताजी का अवैध घर भी सुरक्षित है। होली का हाल तो बेचारा जनता सब से पूछो, जिनका आशियाना कोर्ट की किरपा से एमसीडी वालों ने ढहा दिया।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बारी थी नई दिल्ली टीशन की। पेसेंजरों का एतना भीड़ कि देखके होश गुम हो गया। कोई विदेशी पतरकार देखता, तो अपने एडिटर को खबर करता--हम भारत में इतिहास का सबसे बड़ा माइग्रेशन (देशांतरण) देख रहा हूं! आप कहें, तो आठ कॉलम की खबर लिख दूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उसको क्या पता कि ई तो यहां हर होली-दिवाली का दृश्य है। हम पलेटफारम पर पहुंचे ही थे कि पीछे से आए लोगों के रेला ने उठा के हमको गाड़ी के बगल में पटक दिया। एक भाई साहब से पूछा कि कहां जा रहे हैं? बोला, 'टरेन में चढ़ गए तो अपने घर सहरसा औरो आपके कारण नहीं चढ़ पाए तो भाभी जी से होली खेलने आपके घर... पता नहीं कहां कहां से आ जाते हैं!' एतने में एक धक्का औरो लगा... अब हम बॉगी में हूं। निकलने का कोई रास्ता अब है नहीं, सो हमहूं जा रहा हूं अब घर। वैसे, एक बात बताऊं, बढ़िया ही हुआ कि हम टरेन में चढ़ गए। अब तो घर जाने का बहाना है, ऑफिस से तो वैसे छुट्टी नहिए मिलती!&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Article: PRJ&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114310716204931098?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114310716204931098/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114310716204931098' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114310716204931098'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114310716204931098'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/03/blog-post_23.html' title='दिल्ली की होली'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114131032918744314</id><published>2006-03-02T20:05:00.000+05:30</published><updated>2006-03-02T20:08:49.456+05:30</updated><title type='text'>भूखल पेट हाई वे पर चलने का सुख</title><content type='html'>लीजिए, सरकार ने बजट-बजट खेल लिया। जैसन कबड्डी खेलते हैं, न वैसने। का कहे, खेल काहे कहते हैं? अरे भाई, जब खुदे सरकार उस बात पर कायम नहीं रहती, जो बजट में कहती है, तो ई खेले न हो गया। कबड्डी में तो तभियो एक बार लंगड़ी मारकर पिलयर आउट हो जाता है, यहां तो सरकार साल भर लंगड़ी मारती रहती है। आज ई टैक्स, कल उ टैक्स। अब देख लीजिए, इस बजट में सरकार ने कोयो नया टैक्स नहीं लगाया न, लेकिन एक महीना बाद जब नून-तेल खरीदने जाइएगा, तो पिताजी याद आ जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे भी हमरा मानना है कि सरकार बेकारे बजट बनाती है। उसके हाथ में तो कुछो है नहीं, सब कुछ बाजार तय करता है, तो फिर काहे का बजट? कल्हे अगर डीजल-पेट्रोल वाली कंपनी अपना दाम बढ़ा दे, तो सरकारी बजट धरले रह जाएगा। नून-तेल से लेकर कपड़ा-लत्ता तक, सब कुछ महंगा। सरकार बनाती रहे बजट! अब जो चीज आपके हाथ में है ही नहीं, उसमें आप हाथ डाल रहे हैं, तो इसको खेले न कहिएगा। इस बजट के चलते तो हमरे साथ भी खेल होते-होते बच गया! का है कि बजट से पांच दिन पहले हमरे पंडित जी मिले, कहने लगे, 'जजमान, ई बजट पर पंडिताई पर सर्भिस टैक्स लगने वाला है। बजट से पहले ब्याह कर लीजिए, सस्ते में निबट जाइएगा, नहीं तो बाद में दक्षिणा महंगा बैठेगा।' हमने हड़बड़ाकर शादी नहीं की औरो संजोग देखिए कि पंडिताई पर टैक्स भी नहीं लगा। अब अगर पंडितजी की बात हम मान लेते, तो आज बजट के पहले कार खरीदने वालों की तरह बैठ के माथा धुन रहे होते कि नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, तो हम खेल की बात कर रहे थे। का है कि कबड्डी में एक ठो पिलयर को पकड़ने के लिए दस ठो पिलयर दौड़ता है, बजट में भी दस तरह का टैक्स औरो सरचार्ज वाला भूखल कुत्ता भूखल गरीब पर छोड़ दिया जाता है। मजबूत हैं तो बच जाइएगा, कमजोर हैं तो निगम बोध घाट है ही। खेल में कमजोरे लोग न हारता है, आप मरिए जाइएगा, तो कौन बड़का बात हो गया? सरकार के पास आपके पेट को देखने के अलावा भी बहुते काम है। उसको देश का चेहरा चमकाना है, सड़क, मॉल औरो पुल बनवाना है, उस पर कार चलवाना है, आपको विदेशी शराब औरो कोल्ड ड्रिंक पिलवाना है, चावल-दाल के बदला में आपको पास्ता औरो नूडल्स खिलवाना है, हर हाथ में कंप्यूटर औरो मोबाइल देना है...। ई सब होगा, तो आप भूखल पेट भी दुनिया में सिर उठा कर जी पाइएगा। गलोबल पीपुल कहलाइएगा। भूखल पेट हाई वे पर आप घिसट कर भी चल सकते हैं। इसका अपना सुख है। आम रोड पर तो एक डेग नहीं चल सकते, काहे कि उन पर रोड से बेसी गड्ढा होता है। अब तो आप बूझिए गए होंगे कि सरकार हाई वे पर आम सड़क से बेसी ध्यान काहे दे रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;का कहे खेती औरो कुटीर उदयोग को सब्सिडी चाहिए? काहे का सब्सिडी, भाई? खेती आप ठीक से करते नहीं औरो कुटीर उदयोग का जो मतलब आप समझते हैं, उसका तो भगवाने मालिक है! कुटीर उदयोग का मतलब घर में बैठकर छोटका-मोटका रोजगार करना होता है, लेकिन आप हैं कि घर में रहकर बच्चा पैदा करने को कुटीर उदयोग समझते हैं! अब अगर आपको यही कुटीर उदयोग चलाना है, तो सब्सिडी नहिए दिया जाए, इसी में फायदा है। वैसे, आपका भी क्या दोष दें, जब बेरोजगारी में घर में बैठल रहिएगा, तो कुछ न कुछ खुराफात तो कीजिएगा ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, चिंता छोडि़ए। चिंता से चतुराई घटता है, इसलिए हम चिंता करता ही नहीं हूं। का है कि मुर्दा पर एक किलो लकड़ी डालिए कि एक टन लकड़ी, बेचारे पर कौन फरक पड़ने वाला है! हम तो वैसे भी कुपोषण के शिकार हूं, एक-आध सिरिंज खून सरकार औरो निकाल लेती है, तो क्या फरक पड़ेगा?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Article: PRJ&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114131032918744314?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114131032918744314/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114131032918744314' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114131032918744314'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114131032918744314'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/03/blog-post.html' title='भूखल पेट हाई वे पर चलने का सुख'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114088165194906714</id><published>2006-02-25T21:00:00.000+05:30</published><updated>2006-02-25T21:13:18.060+05:30</updated><title type='text'>दूसरे ग्रह का प्राणी</title><content type='html'>हमको जिस चीज की शंका बहुते दिन से थी, उ अब सही साबित हो रही है। दिल्ली की कानून-व्यवस्था को देखकर हमको लगता था कि यहां जेतना गलत काम होता है, सबको दूसरे गरह का पराणी सब अंजाम देता है। उ तो गलत काम सब करके भाग जाता है, फंसता बेचारा दिल्ली का आदमी है। ई बात अलग है कि कभियो दिल्ली पुलिस इसके लिए पाकिस्तान को गलिया देती है, तो कभियो बेचारे हरियाणा औरो ऊपी के गुंडा-बदमाश को उसकी गाली सहनी पड़ती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देख लीजिए, एतना साल के बाद दिल्ली पुलिस ने ई तो साबित करिये न दिया कि जेसिका लाल का मरडर किसी मानव ने नहीं किया है! पुलिस को लगा कि एके ठो पिस्तौल से गोली मारी गई थी, लेकिन फारेंसिक विशेषज्ञ दो ठो पिस्तौल की बात कर रहा है। अब चूंकि दिल्ली पुलिस गोली मारने वाले एको ठो आदमी को नहीं पकड़ पाई औरो नेता के आरोपी बेटा सब केस से बरी हो गया, तो हमरे खयाल से कोर्ट को भी अब मान ही लेना चाहिए कि जेसिका को मारने के लिए दोसरे गरह का पराणी सब आया होगा। वैसे भी सुंदर लड़की के पीछे तो हजारों आदमी लगा रहता है, एक-दो ठो दोसरे गरह का पराणी लग गया, तो कौन बड़का बात हो गया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, बिग्यानी पतरकार संजय बाबू ई सुनके हंसते हैं, लेकिन हमरे पास दोसरा गरह के पराणी का एक ठो नहीं, बत्तीस ठो परमाण है। अब देखिए, दिल्ली में जेतना अवैध निरमाण हुआ एमसीडी के ओभरसियर-इंजीनियर ने एको ठो को बनते देखा? नहीं देखा। सिरी फोर्ट में जो अंगरेज महिला से बलात्कार हुआ था, उसका दोषी पकड़ाया? नहीं पकड़ाया। एम्स वाले बलात्कार का दोषी पकड़ाया? नहीं पकड़ाया। 84 के सिख दंगा में किसी को सजा मिली? नहीं मिली। अब अपराधी पकड़ाएगा, तभिये न उसको सजा मिलेगी। औरो अपराधी तभिये पकड़ाएगा, जब उ आदमी होगा। अगर अपराधी आदमी होता, तो हजारों अवॉर्ड पाने वाली दिल्ली पुलिस से उ कैसे बच जाता? इसलिए आप मानिए या नहीं मानिए, हमको तो हंडरेड परसेंट लगता है कि दिल्ली में जेतना गलत काम होता है, दोसरे गरह का पराणी सब करता है औरो इसीलिए उ पकडै़वो नहीं करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही जेतना अवैध निरमाण हुआ है, आप विशवास कीजिए सब दूसरे गरह के पराणियों ने रातों-रात किया है। दिन में करता, तो पकड़ा नहीं जाता। अब चूंकि न तो दूसरे गरह का पराणी दिखता है और न उसका बनाया निरमाण, इसलिए हमरा मानना है कि बेचारे एमसीडी के निर्दोष इंजीनियर सब को माफ कर देना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, हमरे एक मित्र का कहना है कि दिल्ली के अफसर हों या एमसीडी के करमचारी, सब में दोसरा गरह से आए पराणियों ने एक ठो नायाब रोग फैला दिया है। ई रोग का नाम है लॉ-ब्लाइंड (जैसन 'कलर ब्लाइंड' होता है, वैसने), जो घूस से फैलता है औरो इससे ग्रस्त आदमी को बस वही चीज देखाई पड़ता है, जो कानून के अनुसार हो। मतलब उनको गलत काम औरो गलत आदमी दिखवे नहीं करता है। अब जो चीज दिखता ही नहीं है, उस पर कंट्रोल तो भगवान ही कर सकते हैं। सो, भूल जाइए पुलिस, सरकार औरो कोर्ट को, भगवत भजन कीजिए। दोसरा गरह के पराणियों से आपकी रक्षा बस भगवाने कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Article: PRJ&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114088165194906714?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114088165194906714/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114088165194906714' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114088165194906714'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114088165194906714'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/02/blog-post_25.html' title='दूसरे ग्रह का प्राणी'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114044176074117590</id><published>2006-02-20T18:51:00.000+05:30</published><updated>2006-02-20T18:53:03.103+05:30</updated><title type='text'>फितरती बेईमान होते हैं राजनेता!</title><content type='html'>भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में लोगों की यह आम धारणा है कि नेता और खास कर राजनेता बेईमान होते हैं। वर्ल्ड इकोनामिक फोरम के लिए 60 देशों में वॉयस ऑफ पीपुल की ओर से किए गए एक सर्वेक्षण में 61 प्रतिशत लोगों का मत था कि राजनेता बेईमान होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल राजनेताओं को यह जान कर थोड़ी राहत मिल सकती है कि उनके प्रति लोगों की सोच में थोड़ा सकारात्मक बदलाव आ रहा है क्योंकि 2004 के ऐसे ही सर्वेक्षण में 62 फीसदी लोग इन्हें बेईमान मानते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजनेताओं की बनिस्बत आर्थिक नेताओं के बारे में लोगों की थोड़ी अच्छी राय है। 40 फीसदी लोग ही उन्हें बेईमान मानते हैं। उनकी छवि में भी थोड़ा सुधार आया है। 2004 में 43 फीसदी लोगों की निगाह में आर्थिक नेता बेईमान थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सर्वेक्षण पिछले साल नवंबर और दिसंबर में किए गए। सर्वेक्षण के दायरे में 60 देशों के 50,000 लोगों को शामिल किया गया। विश्व आर्थिक फोरम का कहना है कि ये नतीजे दो अरब से ज्यादा लोगों के विचारों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114044176074117590?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114044176074117590/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114044176074117590' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114044176074117590'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114044176074117590'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/02/blog-post_20.html' title='फितरती बेईमान होते हैं राजनेता!'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-114002104432225533</id><published>2006-02-15T21:55:00.000+05:30</published><updated>2006-02-15T22:00:44.753+05:30</updated><title type='text'>एक कानपुरिया की तलाश</title><content type='html'>आज अतुल अरोरा जी का संस्मरण "लाइफ इन ए एचओवी लेन" पढ़ा. संस्मरण इतना पसंद आया कि आज ही 10 के 10 अध्याय पढ़ डाले. बीच में छोड़ने का मन नहीं हुआ. एक कानपुरिया के अमेरिका तक के सफर की दास्तान वाकई शानदार है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्मरण को पढ़कर एक मित्र &lt;strong&gt;रवि अवस्थी&lt;/strong&gt; की याद आ गई, जिससे अब कोई संपर्क नहीं है. आखिरी बार कब बात हुई थी ये भी याद नहीं. शायद कोई छह-सात साल पहले. अचानक इस मित्र की याद शायद इसलिए आ गई कि वो भी एक कानपुरिया ही है और कभी उसका भी सपना यूएस जाना था.&lt;br /&gt;संभव है आज उसका सपना पूरा हो गया हो और उसे दिल्ली के अपने पुराने संपर्कों की याद तक न हो. पर न जाने क्यों फिर भी आज उसे तलाशने की इच्छा हो रही है. ऐसा नहीं है कि इससे पहले कभी उसकी याद नहीं आई पर यही सोचकर तस्सली कर ली कि संपर्क करने का कोई साधन नहीं है. जिस समय दोस्ती हुई थी उस समय न तो मोबाइल क्रांति भारत में हुई थी और न ही इंटरनेट का इतना प्रचार-प्रसार था कि मेल इत्यादि की जानकारी होती. लगता नहीं कभी उससे संपर्क हो सकेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रवि दिल्ली के लाजपत नगर में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम करता था और अपने दोस्त पंकज के साथ जनकपुरी में महावीर एन्कलेव में रहता था. पंकज भी रवि के ही ऑफिस में काम करता था. रवि से मेरा परिचय पड़ोस में रहने वाली मेरी एक मित्र के जरिए हुआ था. रवि से उतना अधिक मेरा परिचय नहीं था. बस कुछेक बार फोन पर बात हुई थी और दो या तीन बार संक्षिप्त मुलाकात. एक बार उसने बताया था कि उसे अरहर की दाल और चावल पसंद है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस इतनी ही पहचान थी उससे. अब वो कहां है, क्या कर रहा है कुछ पता नहीं. अब कभी उस कानपुरिये से बात होगी लगता नहीं.  हो सकता है वो भी इसी तरह पुराने दोस्तों को याद करता हो....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-114002104432225533?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/114002104432225533/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=114002104432225533' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114002104432225533'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/114002104432225533'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/02/blog-post_15.html' title='एक कानपुरिया की तलाश'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113958913687367551</id><published>2006-02-10T21:56:00.000+05:30</published><updated>2006-02-10T22:02:17.226+05:30</updated><title type='text'>दिल्ली, यानी दिल का बाजार</title><content type='html'>दिल्ली को दिलजला सब दिल का बाजार मानता है, जबकि हमको ई प्यार का शेयर बाजार लगता है। उधर, शेयर बाजार में सेंसेक्स 10,000 पार कर रहा है, इधर लव का सेंसेक्स दिल्ली में टाप पर है। लेकिन 14 तारीख को आप इसका राग 'विरोध बजरंगी' भी सुनिएगा, लेकिन हमरा मानना है कि 'बाजार के धुन' के सामने कुछ नहीं सुनाई देता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइए, हम आपको घुमाते हैं बाजार। शेयर बाजार के स्मॉल कैप, मिड कैप, बिग कैप जैसन शेयर के जैसे यहां भी आपको इन्वेस्टमेंट के लिए हर तरह का मुर्गा-मुर्गी मिल जाएगा। रंग, रूप, साइज औरो भविष्य को देखकर निवेश करते रहिए बस। जोखिम आपका। जैसे लोग बेसी कमाई कराने वाले शेयर में निवेश करता है, ई नहीं देखते कि उ दारू का है कि दवाई का, वैसे ही यहां भी तड़क-भड़क देखके निवेश होता है, अंदर कोयो नहीं झांकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ई है डीयू। यहां दिल के बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) आपको भारी दिखेगा। ई निवेशक सब लिवाली के लिए जेतना उतावला रहता है, ओतना ही बिकवाली के लिए भी। यहां के निवेशक (इस्टूडेंट) को थोड़ा भी घाटा का अनुमान हुआ कि उ धराधर बिकवाली (छुटकारे) पर उतारू हो जाते हैं और लव का सेंसेक्स जमीन सूंघने लगता है। मतलब खूंटा तोड़के फरार। जबकि जेएनयू में खुदरा निवेश बेसी होता है, मतलब ई कि आप एक ठो शेयर को पकड़ के बैठे हैं। निवेश करके चांदी काट रहे लोगों को जैसे बाजार की जोखिम से डराने वाले लोग वहां बहुते हैं, वैसने देवदास बनने का खतरा बताने वाले लोग यहां बहुते हैं। जबकि हकीकत ई है कि ऐसन लोग खुदे निवेश नहीं कर पाने के चलते मर रहे होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर दिल्ली के प्यार-व्यवस्था (अर्थव्यवस्था जैसे) का पैमाना जानना हो, तो आप डीयू (दिल-लगी यूनिवर्सिटी कहिए) को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) और जेएनयू (जान-निसार यूनिवर्सिटी कहिए) को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) मान सकते हैं। डीयू का लव मीटर हमेशा जेएनयू से हाई रहता है, जैसे बीएसई का एनएसई से होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे शेयर बाजार भारतीय अर्थव्यवस्था को परभावित करती है, वैसने प्यार का व्यापार दिल्ली की अर्थव्यवस्था को। उ जो सीढ़ी पर बैसल भाई साहब एक घंटा से मोबाइल पर बतिया रहे हैं, उ देश से गरीबी मिटाने के उपाय पर किसी से चर्चा नहीं कर रहे, बल्कि रोमांस फरमा रहे हैं। ई गुटर-गूं में मोबाइल औरो फोन कंपनी सब यहां रोज लाखों रुपया कमाती हैं। इरफान खान 'नाक बचाने' के लिए 10 रुपया का रिचार्ज कूपन खरीदने की सलाह मुफ्त में थोड़े देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ई प्यार है कि दिल्ली के बिजनेसमैन सब जंगलो में मंगल कर रहे हैं। लोदी गार्डन औरो बोंटा पहाड़ी से लेकर बुद्धा गार्डन तक में दिल के मरीज सब रोज हजारों रुपया का कुरकुरे और कोल्ड ड्रिंक गटक जाता है। बेचारा 'जवान' सब दुख सह के गर्लफ्रेंड को महंगा-महंगा गिफ्ट देता है। इन्हीं लोगों के चलते तो बरिश्ता से लेकर मैकडोनाल्ड तक आबाद है औरो ब्यूटी पार्लर से लेकर स्नो-पाउडर के दुकान तक चल रहा है। प्यार नहीं मिलता, तो लोग देवदास बन जाते हैं, तभियो फायदा बाजारे का होता है, दारू खूब बिकती है। तो ई है प्यार का अर्थशास्त्र। अब आप ही कहिए इस अर्थशास्त्र में 'बजरंगी' सब बेकारे न समाजशास्त्र घुसाने लगता है!&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Article: PRJ&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113958913687367551?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113958913687367551/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113958913687367551' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113958913687367551'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113958913687367551'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/02/blog-post_10.html' title='दिल्ली, यानी दिल का बाजार'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113932975597645643</id><published>2006-02-07T21:48:00.000+05:30</published><updated>2006-02-07T22:05:16.160+05:30</updated><title type='text'>आदर्श प्रेमी की विश लिस्ट</title><content type='html'>&lt;a href="http://itsme.wordpress.com/2006/01/28/perfect-lover"&gt;अमित&lt;/a&gt; जी ने आपने किस झमेले में डाल दिया. अभी तो चलना भी पूरी तरह आया नहीं कि आपने दिग्गजों के साथ रेस में खड़ा कर दिया, वो भी बिना किसी पूर्व सूचना के. अब जिस तरह क्लास में पिछली सीट पर बैठने वाले कमजोर छात्र से टीचर महोदय अचानक कोई प्रश्न का जवाब पूछ बैठते हैं, तो बेचारे छात्र की जो हालत होती है, बस वही इस समय मेरी भी है. वैसे प्रश्न बेहद सामान्य व आसान है और प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में इस मुद्दे को लेकर तकरार भी होती रहती है (अब ये मत पूछिएगा कि किस से), लेकिन जब से आपने आदर्श प्रेमी या भावी जीवनसाथी के बारे में लिखने के लिए टैग किया गया है, मानो रोज मन में आने वाली बातों को शब्द नहीं मिल रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे मैंने कभी दोस्ती, प्यार वगैहर के बारे में सोचा नहीं था. ये सब मुझे अपने स्वभाव के विपरीत लगते थे. जैसे कि अमित ने अपनी टिप्पणी में कहा है विचार उग्र हैं, साथ ही स्वभाव भी. इसलिए हमेशा ही प्यार-मोहब्बत को अपने स्वभाव के विपरीत पाती थी. साथ ही स्कूल-कॉलेज के दिनों में कभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया. लेकिन फिर एक दिन ऐसा भी आया जब खुद को दोस्ती की डोर से बंधा पाया और दोस्ती की ये डोर अब इतनी उलझ गई है कि हम चाहकर भी इसे सुलझा नहीं पा रहे. इसलिए इसे वक्त के हाथों में छोड़ देना ही बेहतर समझा है. फिर जो भी होगा, अंततः अच्छे के लिए ही होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लीजिए बात कहा से कहा पहुंच गई. खैर वापिस मुद्दे पर चलते हैं. पिछले कुछ सालों में मैंने जो अनुभव किया है वो ये है कि जब तक हम किसी रिलेशन में बंधे नहीं होते, तो उसके बारे में जो विचार हमारे मन में होते हैं वह किसी संबंध में बंधने के बाद पूरी तरह बदल जाते है. यानी संबंधों की वास्तविकता हमारे ख्यालों से काफी अलग होती है. अक्सर लोगों को कहते सुना है कि जो जैसा है, उसे उसी रूप में स्वीकार करना चाहिए, लेकिन जब व्यावहारिक तौर पर ऐसा करने के बारी आती है तो ये काफी कठिन साबित होता है और हम अपने साथी को अपने अनुसार बदलने की कोशिश करने लगते हैं. यानी अपने प्रेमी/प्रेमिका को आदर्शों के अनुसार ढालने की कोशिश करते है. इसका एक दूसरा अर्थ यह है कि हम सभी ने अपने जीवनसाथी के बारे में कुछ न कुछ सोचा हुआ है कि उसे कैसे होना चाहिए. बस कभी ये आदर्श हमें साथी मिलने से पहले मालूम होते है तो कभी इनका अहसास हमें बाद में होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;आदर्श प्रेमी की विश लिस्ट&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. सबसे पहले तो उसे आपका दोस्त होना चाहिए. दोस्त ऐसा, जिसे आप अपने मन की हर छोटी बड़ी बात बता सके, वो भी बिना किसी बंदिश या सोच विचार के. इस बात पर फिल्म "कल हो न हो" के अंतिम सीन में प्रीति जिंटा ने एक डायलॉग भी कहा था, ठीक से याद नहीं पर कुछ ऐसा था, 'पति में दोस्त ढूंढते हैं मैंने अपने सबसे अच्छे दोस्त में अच्छा पति पा लिया'. सो पति तो आसानी से मिल जाते हैं, दोस्त मिलना जरा मुश्किल है. इसलिए पहली और सबसे बड़ी प्राथमिकता यही है.&lt;br /&gt;2. दोस्त बनने के बाद जरुरी है कि वो आपको भी अपना दोस्त मानें. अर्थात सिर्फ आपकी सुने नहीं अपनी सुनाए भी.&lt;br /&gt;3. आपकी हर जरुरत में आपके साथ हो. आपको कभी साथ मांगने की जरुरत न पड़े.&lt;br /&gt;4. धैर्यवान हो. चूंकि मैं स्वभाव से कुछ क्रोधी प्रकृति हूं और जल्दी धैर्य खो देती हूं, इसलिए चाहूंगी कि ऐसे समय पर धैर्य से काम ले. चूंकि बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं कि एक के गुस्सा होने पर दूसरे को शांत हो जाना चाहिए वरना तिल का ताड़ बनते देर नहीं लगती.&lt;br /&gt;5. किसी भी विवादित मुद्दे को टालने की बजाए, आराम से बैठकर बात करके उस मुद्दे को सुलझाने का प्रयास करे.&lt;br /&gt;6. आप पर विश्वास करे. खुद भी आगे बढ़े और आपको भी आगे बढ़ाए.&lt;br /&gt;7. आपकी कमियों व अच्छाइयों दोनों को अपनाए. पुरुषों अच्छाइयों की तारीफ करने में जितनी कंजूसी दिखाते हैं, कमियां गिनाने में उतनी ही तेजी दिखाते हैं. कमियां दूर भी की जा सकती हैं अगर उन्हें पॉजिटिव एप्रोच के साथ बताया जाए.&lt;br /&gt;8. और अंत में.... महोदय कभी-कभार छुट्टी के दिन बेड-टी बनाकर पिलाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;और अब इस कड़ी का सबसे कठिन काम टैग करना...&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://www.shashisingh.co.in/mumbaiblogs/"&gt;शशि&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;- कोई ओर चारा नहीं, संकट की घड़ी में सबसे पहले मित्रों की ही याद आती है न इसलिए.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;प्रतीक&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;- संभव है आपको भी किसी ने शिकार बनाया हो. पर चलिए मुझे फिलहाल कोई और सूझ नहीं रहा है.&lt;br /&gt;गाड़ी का टाइम हो गया है, इसलिए अब दिमाग काम नहीं कर रहा. आज जल्दी में इतना ही. कमजोर और नए बच्चों को थोड़ी रियायत दीजिए और गलतियों पर ज्यादा ध्यान न दें.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शुभ रात्रि&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113932975597645643?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113932975597645643/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113932975597645643' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113932975597645643'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113932975597645643'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/02/blog-post_07.html' title='आदर्श प्रेमी की विश लिस्ट'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113897819751443966</id><published>2006-02-03T20:17:00.000+05:30</published><updated>2006-02-03T20:20:03.393+05:30</updated><title type='text'>बिहार कॉलिंग!</title><content type='html'>दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उस दिन विसेसर चचा मिल गए। दिल्ली आते तो बहुतों को देखा था, लेकिन बोरिया -बिस्तर समेट के यहां से जाना पहली बार देख रहा था। इससे पहले कि आश्चर्य से हमरी आंख बाहर निकल आती, उ फुसफुसाए- 'बिहार कॉलिंग'... नीतिश बाबू गांधी मैदान में मास्टरी का जुवाइनिंग लेटर लेकर बैठल हैं, खाली आपके पास बीएड की डिगरी होनी चाहिए। इसीलिए ई मुलुक को टा-टा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमरा तो जैसे माथा चकरा गया। अटल जी अगर हजार पूर्ण चांद देख चुके हैं, तो विसेसर चचा जरूर पांच सौ देख चुके होंगे। अब इस उमर में उ मास्टर का नौकरी करेंगे, तो उनके कलम-घिस्सू बेटा पप्पुआ को नौकरी कहां से लगेगी? ई कैसन क्रांतिकारी विचार है भाई? चचा बोले, 'ई तो नीतिश का 'बिग बाजार' के जैसे 'महा छूट ऑफर' है, जो पहले पहुंचे, सारा लूट ले। हम धरती पर पहिले आए, इसीलिए बीएड कर पाए, इसलिए अब हमको नौकरी मिलेगी, भले ही पप्पुआ हमेशा से बेसी विदवान हो। अगर हमहूं पप्पुआ जैसे लालू कालीन अभिशप्त पीढ़ी के होते, तो बीएड का होता है, कभियो नहीं जानते। उनको नौकरी तो देनी नहीं थी किसी को, तो काहे का ट्रेनिंग स्कूल? बेकारी में लोग गाय-भैंस ही तो चराएंगे, सो सारा पैसा चरवाहा विद्यालय के खाते में दे दिया और बाद में उसे भी चर लिया।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक हम संभल चुके थे, 'बीएड कॉलेज नहीं होने से तो चलिए एक ही पीढ़ी बर्बाद हुई, लेकिन आप मास्टर बनेंगे, तो वहां की सात पीढ़ी बर्बाद होती जाएगी।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनके चचा तंबाकू ठोंकने में मगन हो गए और हम सोचने में। हमको नीतिश बाबू पर तरस आने लगा। अच्छा- खासा आदमी कुर्सी पर बैठते ही बौरा गया! सच कहूं, तो हमको बिहार के सीएम के कुर्सिये में खोट नजर आने लगा है- भगवानों बैठ जाएं, तो चिरकुट हो जाएं। हम चिंता में थे कि पार्किंग का ठेकेदारी करते-करते 'ए पलस बी का होल स्क्वायर' वाला बेसिक फारमूला तक भूल चुके चचा पढ़ाएंगे का? तनिके देर में हमको पप्पुआ दोषी लगने लगा? अब आप ही बताइए, उसको नीतिश के राज में नौकरी चाहिए थी, तो चचा से पैदा होने का इंतजार क्यों किया? किसी और का बेटा होकर पहले दुनिया में आ जाता। वैसे, दोष चचो का नहीं है। का है कि चाची मिलवे नहीं की थी, तो चचा क्या खाकर पप्पुआ को पैदा करते!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि पप्पुआ अपनी गलती नहीं मानता। गलती है तो लालू, नीतिश औरो चचा की। ऐसन में उ क्यों भुगते? उसने तो सिकंदर और बाबर के पूरा खानदान से लेकर सोनिया गांधी के नाती तक का नाम रट के जीके मजबूत किया है। परीक्षा हो, तो उ मास्टर बने। लेकिन नीतिश अड़ल हैं कि बीएड नहीं किया, तो नौकरी नहीं मिलेगी। अरे भाई, जब 15 साल पहिले राज्य से बीएड कॉलेज खतम हो गया है, तो डिगरी कहां से लाएगा लोग?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, हमको पप्पुआ के लिए इसकोप अभियो नजर आ रहा है। का है कि चिकना घड़ा पर कभियो रंग नहीं चढ़ता है। इतने साल में सब ज्ञान को तंबाकू के गर्दा में उड़ा चुके विसेसर चचा को क्लास में टिकने लायक बनाने के लिए नितीश को उन्हें दस आदमी से ट्यूशन पढ़वाना होगा। बस हो तो गया! उन दस में एक पप्पुआ तो होगा ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Article: PRJ&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113897819751443966?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113897819751443966/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113897819751443966' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113897819751443966'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113897819751443966'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/02/blog-post.html' title='बिहार कॉलिंग!'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113870220425277861</id><published>2006-01-31T15:12:00.000+05:30</published><updated>2006-01-31T15:40:04.536+05:30</updated><title type='text'>'ओउम' की शक्ति</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/5446/1726/1600/OM.jpg"&gt;&lt;img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/5446/1726/320/OM.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;'ओउम' परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ नाम है, जिसने सारे संसार की रचना की है. वह अजर है, अमर है, सर्वव्यापक है, रक्षक है. इसमें परमात्मा के अनेक रूपों और गुणों को प्रकट करने की शक्ति है. 'ओउम' शब्द में तीन अक्षर है- 'अ', 'उ' और 'म'.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये तीन अक्षर परमात्मा के तीन महान् गुणों को प्रकट करते है. &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;'अ' &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;परमात्मा की उस शक्ति का वाचक है, जिससे वह संसार को उत्पन्न करता है. &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;'उ' &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;परमात्मा की उस शक्ति का नाम है, जिससे वह संसार की रक्षा करता है. &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;'म'&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; परमात्मा की उस शक्ति का परिचायक है, जिसके माध्यम से वह प्रलय करती है. इस तरह 'अ' ब्रह्मा का वाचक है , 'उ' विष्णु का और 'म' महेश का. जब हम 'ओउम' का उच्चारण करते हैं, तब हमारी वाणी भगवान के इन गुणों को प्रकट करती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अ' के उच्चारण के लिए हमें अपना मुंह खोलना पड़ता है. इसी तरह यह सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है. 'उ' का उच्चारण करते समय मुंह खुला रहता है और होंठ मूड़े हुए होते है. यह धारण, रक्षण और पालन का सूचक है. 'म' का उच्चारण करते समय होंठ बंद करने पड़ते है. यह किसी तत्व की समाप्ति को दर्शाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह 'ओउम' का उच्चारण या जाप करते समय हम न सिर्फ यह जानते हैं कि परमात्मा संसार का उत्पादक, रक्षक और प्रलयंकर है, बल्कि यह भी जानते है कि प्रकृति का यह नियम अनादि काल से चला आ रहा है और अनन्त काल तक चलता चला जाएगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113870220425277861?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113870220425277861/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113870220425277861' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113870220425277861'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113870220425277861'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/01/blog-post_31.html' title='&apos;ओउम&apos; की शक्ति'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113836731700611423</id><published>2006-01-27T18:35:00.000+05:30</published><updated>2006-01-27T18:38:50.563+05:30</updated><title type='text'>वो जलता रहा, चैनलों का कैमरा चलता रहा</title><content type='html'>भारत में खबरिया चैनलों की शैशवास्था का यह चरम उदाहरण था। पटियाला के एक व्यापारी द्वारा आत्मदाह और इस आत्मदाह के वीभत्स दृश्य का लाइव प्रसारण! फूलों की माला से लकदक व्यापारी। चारों तरफ से तमाशा देख रहे लोगों का घेरा। इस भीड़ में कई चैनल वाले और पुलिस वाले भी। व्यापारी ने खुद पर पेट्रोल डाला। माचिस निकाली और आग लगा ली। धधकती आग में व्यापारी जलने लगा। चैनलों को अद्भुत मसाला मिल गया। मौत के मुंह में खुद को ढकलते व्यक्ति के लाइव प्रसारण का मौका हमेशा नहीं मिलता! मसालेदार खबरों की तलाश में लगे रहने वाले चैनलों के लिए इससे अच्छा मसाला क्या हो सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यापारी मर गया। लेकिन कोई यह पूछने वाला नहीं कि जब वह ऐसी हरकत कर रहा था तो किसी ने उसे रोका क्यों नहीं? अगर आम जनता को इतनी अक्ल नहीं थी तो प्रबुद्ध मीडिया में से किसी ने उसे रोका क्यों नहीं? वे बस मजा लेकर उसे देखते रहे और भावनाओं में बह गया वह बेचारा व्यापारी चैनलों के कैमरे देखकर कुछ ज्यादा ही उत्साहित हो गया। इसके बाद का अंदाजा शायद उसे नहीं रहा होगा। खबरिया चैनलों को थोड़ी देर के लिए ही सही अपनी जिम्मेदारी भी समझ में आई। उनमें से एक ने आत्मदाह के लाइव प्रसारण को दिखाते हुए यह भी दिखाया- 'ये दृश्य आपको विचलित कर सकते हैं।' इसे खबरिया चैनलों का उपकार ही समझिए कि उन्होंने इस वीभत्स दृश्य को दिखाने के साथ-साथ पट्टिका पर यह भी लिख दिया, लेकिन दिखाया बार बार। लगातार।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113836731700611423?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113836731700611423/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113836731700611423' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113836731700611423'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113836731700611423'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/01/blog-post_27.html' title='वो जलता रहा, चैनलों का कैमरा चलता रहा'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113827279380572250</id><published>2006-01-26T16:22:00.000+05:30</published><updated>2006-01-26T16:23:13.893+05:30</updated><title type='text'>गणतंत्र नहीं, 'गन' तंत्र दिवस कहिए</title><content type='html'>आज दिल्ली में गणतंत्र दिवस मनाया गया। हालांकि जैसे यह मना, उससे तो मैं एकदम कन्फ्यूज गया हूं कि ई गणतंत्र दिवस था कि 'गन' तंत्र दिवस। हर तरफ बंदूकों का साया! ये कैसा गणतंत्र है भाई, जिसमें राष्ट्र गौरव का पर्व भी 'गन' के दम मनाया जाए? ये तो आतंकियों की 'गन' को रोकने के लिए पुलिस द्वारा 'गन' के बल पर 'गण' पर शासन की बात हो गई। मतलब गणतंत्र की एक दूसरा ही परिभाषा हो गई यह तो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या बोले, यह सब सुरक्षा के लिए जरूरी है? हां, ठीक ही कहते हैं, लेकिन तब इतनी नौटंकी करने की जरूरत क्या है? हमारी मानिए, जो सब राजपथ पर करते हैं, उसके बदले में राष्ट्रपति भवन में झंडा फहराइए, कम से कम 26 जनवरी को जनता दिल्ली की सड़कों पर बेरोक-टोक घूमकर गणतंत्र दिवस का जश्न तो मना सकेगी। क्या है कि आप जिस 'गण' के लिए गणतंत्र दिवस मनाने की बात करते हैं, वह तो उस दिन सबसे ज्यादा पराधीन और भयभीत रहती है। बस बंद, मेट्रो बंद, न इंडिया गेट पर आइसक्रीम खा सकते हैं और न ही चांदनी चौक पर चाट, फिर काहे का 'गण' और कैसी गणतंत्र की ठाठ! यह तो वही बात हो गई कि दूल्हा अपने ब्याह में ही न जाए और बराती ब्याह की खुशी में नाच-नाचकर बेहोश होते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, यहां के लोग भी कम नहीं हैं। अगर खाली वे नौकर और किराएदार का वेरिफेकेशन करा ले, तो पुलिस की टेंशन आधी हो जाए, लेकिन सब अपने को रॉबर्ट बढ़ेरा ही न समझता है। सेक्युरेटी चेकिंग में भी शर्म आती है! पचास रुपए जिसकी पॉकेट में रहते हैं, वह बस में ऐसे संभलकर रहेगा, जैसे आसपास सब पॉकेटमार ही हो, लेकिन वही चचा जान और खाला जान अपने किराएदार के आतंकी साबित होने पर ऐसे आंख का बटन निकालेंगे, जैसे उनको आदमी पहचानने ही नहीं आता! रखेंगे 'सीधा-सादा' नेपाली नौकर, जो सस्ता होता है और चांय-चूं नहीं करता है, लेकिन पुलिस को नहीं बताएंगे। एक दिन जब वह 'टेढ़ा' हो जाएगा और टेंटुआ दबाकर सब माल ले जाएगा सीमापार, तब सब मिलके पुलिस का पोस्टमार्टम करेंगे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;... और पुलिस? पूछिए मत। 364 दिन अगर ड्यूटी को 'गोली देकर', वसूली में व्यस्त रहिएगा, तो 365वें दिन गोली-बंदूक के बल पर ही न शांति बनाइएगा, चाहे वह राष्ट्रीय पर्व ही क्यों न हो। कर्फ्यू लगाकर अगर आप कहते हैं कि '26 जनवरी शांति पूर्वक निबट गया', तो लानत है भाई आप पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;... और नेता? हमारा तो मानना है कि यह पर्व बूटा सिंह जैसे 'राजनेताओं' को ज्यादा आनंद देता है, जो सुप्रीम कोर्ट में तो लोकतंत्र का खलनायक है, लेकिन कहता है मैं इस बार 26 जनवरी पर गांधी मैदान में 'सलामी लूंगा'। गौर कीजिएगा, उन्होंने यह नहीं कहा कि गांधी मैदान में तिरंगे को 'सलामी दूंगा'।&lt;br /&gt;जय हो लोकतंत्र की! जय हो इसके खेवनहारों की!!&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Article: PRJ&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113827279380572250?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113827279380572250/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113827279380572250' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113827279380572250'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113827279380572250'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/01/blog-post_113827279380572250.html' title='गणतंत्र नहीं, &apos;गन&apos; तंत्र दिवस कहिए'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113811336084283905</id><published>2006-01-24T20:01:00.000+05:30</published><updated>2006-01-24T20:06:01.210+05:30</updated><title type='text'>साइबर स्पेस पर शिकंजा</title><content type='html'>&lt;ul&gt;&lt;li&gt;अभी हाल में सर्च इंजन गूगल ने अपनी वीडियो साइट पर 'ब्लफ मास्टर' और 'बंटी और बबली' जैसी लेटेस्ट बॉलिवुड फिल्में मुफ्त में बांटनी शुरू कर दीं। यह खुलेआम कॉपीराइट की डकैती थी, जिसके खिलाफ यशराज फिल्म ने कानूनी कार्रवाई की धमकी दी।&lt;/li&gt;&lt;li&gt;कुछ अरसा पहले एक इंटरनेट साइट सीनेट ने एक धमाका किया। उसने गूगल के सीईओ एरिक श्मिड्ट के निजी जीवन, राजनीतिक दान, रिहाइश और तनख्वाह के ब्यौरे प्रकाशित कर दिए। यह सारी जानकारी उसने गूगल पर सर्च के जरिए ही निकाली, यह दिखाने के लिए कि गूगल लोगों की जिंदगी के बारे में कितना ज्यादा जानता है। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;पिछले दिनों नेट पर 'एपिक 2014' नाम से आठ मिनट का एक वीडियो रिलीज हुआ। यह आज से आठ साल बाद की एक फेंटेसी है, जिसमें दिखाया गया है कि कैसे गूगल और अमेजन के एक साझा अवतार 'गूगलेजोन' ने मीडिया पर कब्जा कर लिया है, जो हर पाठक के लिए उसकी निजी पसंद और जरूरत के हिसाब से न्यूज, एंटरटेनमेंट और जानाकरी का एक पैकेज मुहैया कराता है। यह सारा मैटर इंटरनेट से जोड़-तोड़ कर गूगलेजोन के सॉफ्टवेयर रोबोट तैयार करते हैं और इस पर्सनल मीडिया ने मास मीडिया को तबाह करके रख दिया है। नतीजतन न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे ताकतवर अखबार नेट से हटने को मजबूर हो गए हैं। &lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;पश्चिम में हंगामा मचा हुआ है और इस हंगामे के केन्द में है गूगल। वह सर्च इंजन जो आज इंटरनेट पर जानकारी की तलाश का सबसे बड़ा मीडियम बन चुका है, इस कदर कि इंटरनेट की कल्पना गूगल के बिना नहीं की जा सकती। दुनिया भर में नेट पर हर रोज जो 25 करोड़ खोजें होती हैं, उनका आधा गूगल के हिस्से आता है। भारत में 90 परसेंट, यानी तीन करोड़ नेट खोजों पर गूगल की छाप लगती है। सिर्फ आठ बरस में गूगल ने याहू और एमएसएन जैसे सर्च इंजनों को दूर पीछे छोड़ दिया है। वह इंटरनेट का चौधरी बन चुका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी हाल तक गूगल को इंटरनेट की आत्मा कहा जा रहा था। पूछा जा रहा था कि क्या वह साइबर स्पेस का भगवान है? माना जा रहा था कि उसने लाखों (और शायद करोड़ों) वेब पेजों-पोर्टालों के इस विश्व व्यापी बीहड़ में ऐसा रास्ता खोल दिया है कि सब कुछ सुगम लगने लगा है। नेटिजन के लिए गूगल मनपसंद जानकारी पाने का सबसे पहला जरिया बन गया, क्योंकि उसके सर्च इंजन का कोई जवाब नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आज माहौल बदल रहा है। गूगल को एक ऐसे विशालकाय ऑक्टोपस की तरह देखा जा रहा है, जिसकी बांहें पूरे नेट को घेरे हुए हैं। वह हर क्षण साइबर स्पेस के अंधेरे भूगर्भ में रेंगता रहता है, वहां सुरंगें बनाता है और चुपचाप हर चीज दर्ज करता रहता है। वह नेट की सूक्ष्म से सूक्ष्म धड़कन को रेकॉर्ड करता है, लेकिन जब वह यह सब आप-हम तक लेकर आता है, तो बदले में हमारे डेस्कटॉप के जरिए हमारे जीवन में भी अदृश्य रास्ते बना चुका होता है। हर सर्च गूगल के दिमाग में हमेशा के लिए दर्ज हो जाती है और साथ में तारीख, समय और आईपी एड्रेस भी। गूगल हम सब के बारे में कुछ न कुछ जानता है। वह हमारे गूढ़ रहस्यों का अकेला साझीदार है। हमारे खुफिया ब्यौरों तक उसकी पहुंच है। इसके अलावा जब कोई गूगल टूलबार को अपने पीसी में इंस्टॉल करता है, तो अपनी हार्ड डिस्क में गूगल के लिए एक सेंध बना देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और उसका इस तरह सर्वव्यापी, सर्वज्ञाता होना लोगों में डर पैदा कर रहा है। यह डर वाजिब भी है। गूगल के पास लोगों के बारे में जितनी सूचना है, उतनी आज से पहले किसी के पास नहीं हुई, शायद सरकारों के पास भी नहीं। इसलिए अब कहा जाने लगा है कि गूगल ऐसा शैतान है, जो इंटरनेट पर कब्जा कर लेना चाहता है। उसकी तुलना '1984' के बिग ब्रदर से की जा रही है, जो हर इंसान पर नजर रखता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह है कि गूगल इस हैसियत से क्या कर सकता है। वह जानकारी के इस खजाने का कमर्शल इस्तेमाल कर सकता है। उसके गलत फायदे उठा सकता है। दूसरे कॉरपोरेशनों को बेच सकता है, या फिर उन सरकारों को, जो अपनी जनता की जिंदगी पर पकड़ बनाए रखना चाहती हैं। यानी मामला प्राइवेसी का है और इसके साथ ही कॉरपोरेट मॉरेलिटी का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गूगल का सिद्धांत है, 'बुरा मत करो'। लेकिन इस वादे पर यकीन तब दरकना शुरू हुआ, जब गूगल एक विशाल कंपनी में बदलने लगा। एक तरफ उसकी पहुंच, आमदनी और मार्केट वैल्यू तेजी से बढ़ी, तो दूसरी तरफ उसमें वैसी ही प्रवृत्तियां नजर आने लगीं, जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम के शहंशाह माइक्रोसॉफ्ट में हैं-अपने प्रतिद्वन्द्वी को मिटा देने की। जल्द ही ऐसा लगने लगा कि गूगल बाजार पर एकछत्र राज के लिए बेताब है और अपनी भलमनसाहत छोड़ रहा है। लोगों को उसकी सर्च प्राथमिकताओं में भेदभाव नजर आने लगा। उसने अपने आलोचकों का मुंह बंद करने की कोशिश की और घमंड के अहसास से घिरा नजर आने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल अभी अस्पष्ट इरादों और जनता के नजरिए का है, लेकिन सोचिए गूगल अगर चाहे, तो इंटरनेट पर उसका शिकंजा सचमुच कस सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो साइबर स्पेस का खुलापन, जो उसकी असली ताकत है, खतरे में पड़ जाएगा। लेकिन क्या किसी कानून से इसे रोका जा सकता है? वह इलाज तो मर्ज से भी बदतर होगा। उम्मीद कोई है, तो सिर्फ टेक्नोलॉजी से, जिसकी एक हरकत गूगल को हाशिए पर धकेल सकती है। या फिर नेटिजन का सात्विक क्रोध गूगल की भटकन को अलोकप्रिय और इसलिए अलाभकर बना सकता है। आखिरकार बाजार पर हमारी पसंद का राज अभी बचा हुआ है। बस, वह पसंद सही हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;साभारः एनबीटी&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113811336084283905?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113811336084283905/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113811336084283905' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113811336084283905'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113811336084283905'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/01/blog-post_24.html' title='साइबर स्पेस पर शिकंजा'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113777526970362815</id><published>2006-01-20T22:01:00.000+05:30</published><updated>2006-01-20T22:11:09.936+05:30</updated><title type='text'>कहीं गूंजने न लगे मेरी मुम्बई...मेरी दिल्ली की आवाज़</title><content type='html'>&lt;a href="http://apniduniya.blogspot.com/2006/01/blog-post_18.html"&gt;अंधेर नगरी सभी हैं राजा&lt;/a&gt; पर तरुण जी का निठल्ला चिंतन पढ़ा. इस लेख ने दिन में घटे घटनाक्रम की याद ताजा कर दी, जो मन में एक प्रश्न छोड़ गया था. लेख पढ़कर यही अहसास हुआ कि चिंतन निठल्ला नहीं बेहद गंभीर हैं.  तरुण जी ने अपने लेख में जिस पलायन की बात कही है उसका असर तो शहरों पर दिखने ही लगा है. महानगर की ओर पहुंचने वाली हर सड़क से न जाने कितने हजारों लोग रोजी-रोटी की तलाश में हर दिन, हर पल शहरों की ओर रुख कर रहे हैं. और रही बात अपना शहर, अपना राज्य को रोना रोने वालों की, तो वो अब सभी जगहों पर शुरु हो गया है. बस अंतर यह है कि मुम्बई में ये आवाज सुनी जा चुकी है, दूसरी जगहों पर अभी ये आवाज़ लोगों के दिलों में धीरे-धीरे घर कर रही है. संभव है दूसरे शहरों से इसकी गूंज भी जल्द ही सुनाई पड़ने लगे. ऐसा कहने के पीछे एक कारण यह भी है कि आज दिन में बस में एक छोटा सा वाक्या हुआ. हालांकि देखा जाए तो कहने के लिए ये वाक्या कुछ नहीं था, सिर्फ बस में सफर कर रही दो महिलाओं की आपसी बातचीत भर थी. फिर भी उसे सुनने के के बाद मन में ये प्रश्न उठा था कि क्या आज के युग में यह संभव है कि लोग अपने शहर, अपने राज्य और अपने देश तक सीमित रहें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज दोपहर जब मैं बस से ऑफिस आ रही थी तो कुछ स्डैंड बाद ही दो महिलाएं बस में सवार हुई. दोनों ही देखने में अध्यापिका लग रही थी. उनमें से एक महिला को मेरे साथ वाली सीट मिल गई और दूसरी पास ही खड़ी हो गई. वे दोनों घर जाने की जल्दी में थी इसलिए अपने ब्लूलाइन के ड्राइवर जी को जगह-जगह बस रोकने के लिए कोसती जा रही थी (वैसे ये काम तो दिल्ली की ब्लू लाइन बसों में सफर या यूं कहें suffer करने वाला यात्री दिन में एक बार करता ही है). खैर, बस का ड्राइवर यात्रियों की हड़बड़ी से बेखबर आदत के अनुसार बस को चलाता रहा. एक बस स्टॉप से जैसे ही बस चली कि कंडक्टर ने सड़क पर, जहां आस-पास कोई स्टैंड नहीं था, 8-10 लोगों को सामान से लदे-फदे देखते ही बस को हाथ मारकर सड़क के बीचों-बीच ही रुकवा दिया और उनसे पूछने लगा कि कहां जाना है. जवाब सुनते ही उसकी तो मानो लॉटरी लग गई. भाग्य से सवारियां उसी के रुट की थी. इतनी सारी सवारियों को बस में चढ़ाने में हुई देरी से मेरे पास बैठी आंटी का पारा कुछ और बढ़ गया. फिर उन्होंने पहले तो ड्राइवर कोसा और बाद में जिन सवारियों की वजह से देर हुई उन्हें देखकर कहा- बांग्लादेशी हैं. उसके बाद वे बोलीं सभी को दिल्ली में ही जगह मिल रही है.... आ जाओ दिल्ली में सब समा जाएंगे. बस उन्होंने ये कहा ही था कि उनकी महिला मित्र भी अपने नेपाली नौकर की गाथा लेकर शुरु हो गईं और बताने लगी कि कैसे उनका नौकर धीरे-धीरे अपने परिवार को यहां लेकर आ गया और किस तरह वे लोग दिल्ली के बिजली-पानी का मुफ्त इस्तेमाल कर रहे हैं वगैहर-वगैहर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी बातें सुनकर एक क्षण के लिए दिल्ली की बदहाली मेरे दिमाग में कौंधी और लगा कि बोल तो सही रही हैं दोनों. पर दूसरे ही पल ये ख्याल आया कि हम भी किसी राज्य से यहां आए हैं और हमारे देश के लोग भी दूसरी जगहों पर जा रहे हैं, कुछ वैधानिक तरीके से &lt;a href="http://www.kalpana.it/hindi/blog/2006/01/blog-post_18.html"&gt;कुछ असंवैधानिक रुप से&lt;/a&gt;. किसी को कहीं आने-जाने से रोक पाना कैसे संभव है. सभी कामकाज और रोजगार की तलाश में यहां से वहां भाग रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल दिल्ली को दिनोंदिन बदहाल होते देख यहां के निवासी (मेरे जैसे, जो शायद खुद या उनके बाप-दादा किसी जमाने में दिल्ली में रोजी-रोटी कमाने के चक्कर में आए थे) बाहरी क्षेत्रों से आने वालों को दोषी मानने लगे हैं. ये सही है कि महानगरों में बढ़ रही भीड़ अव्यवस्था बढ़ा रही है और रोज नई परेशानियां पैदा कर रही है, जिसे नियंत्रित किए जाने की सख्त जरुरत है. लेकिन दूसरा सच यह भी है कि आज के दौर में किसी को राज्य या देश की सीमाओं बांधना संभव नहीं है. सबसे ज्यादा जरुरी है कि गांवों और कस्बों में रोजगार के अवसर मुहैया कराने की, ताकि इस पर कुछ हद तक काबू पाया जा सके. बाकी दूसरे कारण भी हैं जिन्हें दूर किया जाना जरुरी है. नहीं तो वह दिन बहुत दूर नहीं कि मेरी मुम्बई, मेरी दिल्ली.... मेरा राज्य.... जैसी आवाज़े चारों ओर से सुनाई पड़ने लगे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113777526970362815?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113777526970362815/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113777526970362815' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113777526970362815'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113777526970362815'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/01/blog-post_20.html' title='कहीं गूंजने न लगे मेरी मुम्बई...मेरी दिल्ली की आवाज़'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113758977647090344</id><published>2006-01-18T18:37:00.000+05:30</published><updated>2006-01-18T18:39:36.646+05:30</updated><title type='text'>बार बाला से किसकी मौज</title><content type='html'>दिल्ली के पियक्कड़ सब आजकल बहुते खुश हैं। अब बार में सुंदरी के हाथ से सुरा जो मिलेगी, मतलब नशा का डबल डोज न हो गया! एतना खुश हैं कि अपना अवैध निर्माण गिरता देखकर भी उनको दुख नहीं हो रहा। हमको तो लगता है कि अब दिल्ली का कायाकल्प हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब कहता है कि इससे ला एंड आर्डर की स्थिति बिगड़ेगी, लेकिन हमको लगता है सुधर जाएगी। एक बार 'बार बाला' सब को काम पर पहुंचने दीजिए, फेर देखिएगा रोड पर कैसे मवालियों का अकाल हो जाता है। सब बांका रात भर मयखाने में रहेगा औरो दिन भर हैंगओवर में। आप छेड़ने की बात करते हैं! रोड पर लड़कियां तरस जाएंगी, कोई उनको देखने वाला नहीं मिलेगा। और बार में...? बाला सब उनको एतना टंच पिला देंगी कि उनसे गिलास नहीं संभलेगा, आप बंदूक-पेस्तौल चलाने की बात करते हैं। औरो ऐसने चलता रहा, तो एक दिन दिल्ली के सब बदमाश डैमेज लिवर औरो किडनी के साथ एम्स में भरती होकर इलाज के अभाव में मर जाएगा। पूछ लीजिए अपने रवि बाबू से, इसका इलाज केतना महंगा होता है। न हींग लगा न फिटकरी औरो रंग देखिए क्राइम कंट्रोल केतना चोखा हो गया... आप सरकार को बेकूफ समझते हैं। हां, कुछ भलो लोग मरेगा, लेकिन का कीजिएगा, कुछ पाने के लिए कुछ तो गंवाना ही पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप बूझ नहीं रहे हैं कि एक सरकारी तीर से केतना शिकार हो गया। अब सरकार का रेवेन्यू तो बढ़वे करेगा, ऐसन तथाकथित बुद्धिजीवियो सब निबट जाएगा, जिसको बिना पिये बौद्धिक बहस में मजे नहीं आता है या ई कह लीजिए कि जो पीने के बाद ही बुद्धिजीवी बन पाता है। होश में रहेगा, तब न सरकार की आलोचना करेगा। 'बार बाला' पिला के एतना टाइट कर देगी कि सरकार को गटर में फेंकते-फेंकते उ खुदे गटर के बगल में लुढ़क जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार की मौज तो औरो सब है, जैसे- लोग जब मयखाना में पैसा बहाएगा, तो अवैध निरमाण के लिए पैसे नहीं बचेगा, लोग कारो नहीं खरीद पाएगा। फिर सरकार को कोर्ट में अवैध निरमाण के वास्ते फजीहत नहीं झेलनी पड़ेगी। ऐसे में कोयो बच्चा को प्राइवेट स्कूल में नहीं भेज पाएगा? मतलब सब सरकारिये स्कूल में पढ़ेगा। सरकार कहेगी- देख लो प्रशासन, अवैध निर्माण खतम... शिक्षा का स्तर सुधार दिया, परदूषण औरो टरैफिक कंट्रोल हो गया। फायदा औरो सब है। हमर ऐगो दोस्त जब मुंबई के बियर बार में जाता था, तो बार डांसर को हजार रुपया टिप देते भी ऐसे शर्माता था, जैसे देना तो उसको दस हजार था, लेकिन चेकबुक घरे भूल आया। यही बात यहां भी होगी। विशवास कीजिए, जल्दिये दिल्लीवाला सब पांच रुपया को लेकर ऑटो वाला से हुज्जत करना छोड़ देगा। लोग का दिल बड़ा हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, मौज तो बिना पट्टा के घूमे वाला उ जंतुओं सब का हो जाएगा। जब लोग सब पीके यहां-वहां लुढ़कल रहेगा, तो जंतु सब को 'टांग उठाने' के लिए हर चार कदम पर एगो खुला मुंह तो जरूरे मिल जाएगा। झूठे पूरे पार्क का चक्कर लगाना पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौज 'बार बाला' औरो बार मालिको सब का है। पांच 'पटियाला' के बाद, गिलास में खाली सोडे गिरेगा, लेकिन दाम पूरा शराब के आएगा। मौज समाज का भी है। सामाजिक समरसता आ जाएगी। शराब के एतना नशा के सामने बाकी सब नशा लोग भूल जाएगा। मतलब अब निरीह लोग सब को सत्ता के नशा या पद औरो पैसा के नशा से घबराने की जरूरत नहीं होगी। ऐसन समाज की कल्पना तो प्लूटो और अरस्तूओं ने नहीं किया होगा!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113758977647090344?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113758977647090344/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113758977647090344' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113758977647090344'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113758977647090344'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/01/blog-post_18.html' title='बार बाला से किसकी मौज'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113715290851957298</id><published>2006-01-13T17:15:00.000+05:30</published><updated>2006-01-13T17:18:29.490+05:30</updated><title type='text'>ट्रैफिक पुलिस का आदेश</title><content type='html'>मेरा एगो नेता मित्र है। नेता है, इसलिए सब कुछ को राजनीतिक चश्मे से देखता है। उ मोटरसाइकिल को बीजेपी मानता है, तो टरैफिक पुलिस को आरएसएस। दिल्ली टरैफिक पुलिस के सड़क सुरक्षा सप्ताह में दिल्ली के रोड पर उसका एक्सपीरियंस देखिए:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन फटफटिया पर बैठा उ सत्ता से हटे बीजेपी के जैसे हिचकोले खाता जा रहा था। बैरीकेड पर एगो टरैफिक पुलिस उसको संघ के जैसे घूरते मिल गया। उ रुकना तो चाह रहा था, लेकिन कमबख्त इंडिया शाइनिंग के नियोन वाला विज्ञापन से आंखे चुंधिया गई। जब तक संभलता, पुलिस को ठोंक चुका था। वैसे, रोक-टोक से तंग होकर उसको ठोंकना तो उ बहुते दिन से चाहता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, पुलिस पट्ठा मजबूत निकला। खुद उठा, उसको उठाया और टूटे स्टैंड वाला फटफटिया को पांच-दस गो ईंटा के 'सामूहिक नेतृत्व' के सहारे खड़ा कर दिया। अब उ फटफटिया का निरीक्षण कर रहा था। पुर्जा-पुर्जा ढीला था। लौह पुरुष जैसा हेडलाइट बूझने से पहले खूब चमक रहा था, गियर बदलने पर गाड़ी जैसे दुलत्ती मारते पीछे भागती थी, चेन का खांचा सब बीजेपी की दूसरी लाइन के झोलटंगा नेता के जैसे एक-दोसरा को लंगड़ी मार रहा था, तो फ्री-व्हील उमा जैसे थोड़े-थोड़े समय पर पूरी चेन को उतारने पर अड़ल था। फ्री-व्हील से परेशान ब्रेक अक्सर जैसे ऑफ द रिकॉर्ड ब्रीफिंग करने लगती थी औरो फेर सब कुछ भगवान भरोसे हो जाता था। साइलेंसर को सूंघकर पुलिस ने इहो पता लगाया कि गाड़ी मिट्टी के तेल में पेट्रोल मिलाकर चल रही है! पुलिस परेशान, आखिर क्या करे? जिस दिव्य- दृष्टि वाले संजय को जोश में गड़बड़ी रोकने के लिए भेजा था, उहो मिलावटी निकला! भोपाल वाला सीडी सामने था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, पुलिस ने उसको चाल, चरित्र व चिंतन बदलने को कहा औरो चालान बुक निकाला। लेकिन पुलिस परेशान! आखिर केतना गड़बड़ी के लिए चालान करता उ। उसको गोस्सा आ गया, 'अपने बल पर खड़ा नहीं हो सकता, लेकिन हेडलाइट देखो केतना तेज है! आंख चुंधिया रही है।' फिर क्या था, हेडलाइट बदल दी गई औरो कम वाट का एगो बलब लगा दिया गया। भविष में गाड़ी एतना तेज हेडलाइट नहीं लगा सके, इसके लिए स्टैंड के बदला में 'सामूहिक नेतृत्व' का ईंटा जोड़ने का आर्डर हुआ। और फ्री-व्हील? उसको फेंक दिया गया। समस्ये खतम! अब विकल्प तलाशा जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ई सबसे गाड़ी की परेशानी बढ़ गई है। उसके दिमाग में एके गो प्रश्न है - एतना कंट्रोल में दिल्ली के रोड पर कहीं गाड़ी चलती है? उ भी तब, जब रोड पर ऐसन ब्लू लाइन बस चल रही हो, जो चंद्रबाबू, मुलायम व अमर के साइकिल औरो जयललिता व ममता के घास-पात को मिट्टी में मिलाने पर तुला हुआ हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमरे खयाल से तो अब गाड़ी के पूर्जा सबको ई फैसला ले ही लेना चाहिए कि बेलगाम ब्लू लाइन से दबके अकाल मौत मरा जाए या पुलिस का आदेश माना जाए। आप का सोचते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Article: PRJ&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113715290851957298?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113715290851957298/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113715290851957298' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113715290851957298'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113715290851957298'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/01/blog-post_13.html' title='ट्रैफिक पुलिस का आदेश'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113708209965443424</id><published>2006-01-12T21:34:00.000+05:30</published><updated>2006-01-12T21:38:34.396+05:30</updated><title type='text'>समय का उपवास</title><content type='html'>समय जिसे भारतीय मनीषियों ने काल भी कहा है, अपनी सुविधा के लिए हमने उसे कई हिस्सों में बांटा है। दिलचस्प बात यह है कि आज हर कोई समय की कमी महसूस करता है। समय धन भी है और उससे ज्यादा भी। मौजूदा दौर का मनुष्य अगर किसी से आक्रांत है तो समय से। अगर समय प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती है, तो समय की गिरफ्त बड़ी जबरदस्त है। सभ्यता ने एक शब्द और खोजा है- डेडलाइन। एक ऐसी अदृश्य रेखा जो निरंतर लोगों के सिर पर हांट करती रहती है। कई लोग इस डेडलाइन से इतने आक्रांत हैं कि अपनी पहले से कठिन जिंदगी को और दूभर बना लेते हैं। चौबीस घंटे घड़ी देखते रहने की आदत हमारी जिंदगी को यंत्रवत बना डालती है और इसका हमें आभास तक नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यस्तता के इस दौर में आप अपनी आमदनी पर कोई विपरीत असर डाले बिना ही एक मजेदार अभ्यास आप सकते हैं। कुछ खास नहीं करना है, बस अवकाश के दिन अपनी घड़ी को ताले में बंद कर रख देना है। हर चीज को बिना प्रबंधन के होने दीजिए। स्वस्फूर्त ढंग से। आपको लगेगा कि जैसे आप किसी दासता से मुक्त हो गए हैं। सप्ताह में कम से कम इस दिन आप बिना किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के काम कर के देखिए। संभव है यह अभ्यास कुछ अटपटा सा लगे। आपको लगे कि बड़ी अजीब मुसीबत में फंस गए हैं। लेकिन यह मुसीबत नहीं है। समझिए कि यह भी समय का उपवास ही है। और कोशिश कीजिए कि किसी से समय ही नहीं पूछें इस दिन। बस वह काम करते रहिए, जो आपको अच्छा लगता है। नतीजा यह होगा कि एक मजेदार घटना घटेगी। आपको लगेगा कि कुछ छूट गया है, लेकिन आप जो कर रहे हैं, वह और भी अच्छा है। आपकी स्वाभाविक शक्तियां एक बने बनाए ढांचे से बाहर सोच रही होंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रचनात्मक लोगों की एक खूबी यह होती है कि वे फ्रेम को तोड़ते हैं। फ्रेम से बाहर जाकर सोचते हैं। वे सीमाओं से परे जाते हैं। लेकिन नतीजे अमल में लाने के लिए जरूरी है कि कार्यक्रम और समयविहीनता में एक तालमेल बैठाया जाए। समयविहीनता का यह दिन, जब आप समय की काराएं तोड़ते हैं, देखेंगे कि आप एक उत्फुल्लता से भरे हुए हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113708209965443424?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113708209965443424/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113708209965443424' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113708209965443424'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113708209965443424'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/01/blog-post_12.html' title='समय का उपवास'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113647144687594392</id><published>2006-01-05T19:57:00.000+05:30</published><updated>2006-01-05T20:00:46.890+05:30</updated><title type='text'>बुड़बक नहीं बनना इस साल</title><content type='html'>ई साल हम बुड़बक नहीं बनना चाहता हूं, इसलिए पिछला साल से सबक लूंगा। इस साल के लिए हमने जो सोचा है, कुछ चीज आपको भी बताता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम खूब घूस खाऊंगा, लेकिन सांसदों के जैसे नहीं कि कुर्सिये से हाथ धोना पड़े, बल्कि एमसीडी के अफसर की तरह। पहले घूस लेकर अवैध निर्माण कराओ औरो फेर खुदे तोड़ने पहुंच जाओ। बंदा फेर घर बनाएगा, मतलब एक बेर औरो आपको घूस पहुंचाएगा। घूसखोरी में ऐसी मौज दुनिया में कहीं और देखे हैं आप?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कानून अपनी जेब में करना है, इसलिए सत्ताधारी पार्टी का एमपी या फेर केंद्रीय मंत्रियो बन सकता हूं। देखे थे न जयप्रकाश यादव को, बदमाश भाई को थाने से जबर्दस्ती छुड़ा लिया। बिपक्षी सब हो हो नहीं करता, तो अभियो उ मंत्री रहते। कानून के रक्षक बनने का शपथ खाने के बाद एतना तो आप देश को 'खा ही सकते हैं! उ शहाबुद्दीने को देख लीजिए। अगर पाक का नमक भी केकरो घर में मिल जाए, तो उ पाक एजेंट हो जाता है औरो हिरण का नाखूनों मिल जाए, तो मेनका गांधी के चेला सब हल्ला करने लगता है, लेकिन मरल हिरण के साथ वीरता दिखाने वाला फोटुआ खिंचाके और घर में पाकिस्तानी गोली रखके भी मियां जी का कुछो नहीं बिगड़ा। पुलिस पकड़वो किया उनको, तो बिजली चोरी के जूर्म में, जैसे पुलिस न होकर बीएसईएस का करमचारी हो! ऐसे में इस साल भगवान औरो चैनल सब से हम दुआ करूंगा कि सारा बिपक्ष दुर्योधन बनकर चक्रव्यूह में फंस जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आदर्श की बात करें, तो हमरे लिए चुनौती के पी एस गिल बनना है, ताकि सबको जड़ से 'खतम' कर दूं। फिर चाहे उ पंजाब से आतंकवाद खतम करने की बात हो या फिर देश से हॉकी के खेल को। आखिर रोम के जलने के समय नीरो की तरह बंसी हर कोई थोड़े बजा सकता है! कलेवर चाहिए इसके लिए। हां, उमा भारती हम कभी नहीं बनूंगा, क्योंकि बेआबरू होकर अपने ही कूचे से हम नहीं निकलना चाहता हूं। आप चाहे जितना मोटा खंभा हो, अगर घर ही कहे कि उसको आपका सहारा नहीं चाहिए, तो डूब मरने वाली बात होती है। इससे बढ़िया तो इस खुशफहमी में जीना है कि दुनिया इसलिए है, क्योंकि हम हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस साल के हमरे एजेंडे में शादी भी है, लेकिन बीवी घर लाने से पहले हमको उ मशीन चाहिए, जो जासूसी वाला कैमरा को जाम कर देती है। उ परभात बाबू को देख लीजिए, बेचारा हनीमून के लिए शिमला नहीं गया, क्योंकि वहां चोरी-चोरी ब्लू फिलम बन जाती है। ई जासूसी कैमरा भी बड़का आफत है हो! बीवी लाएंगे, तो एगो घरो चाहिए, लेकिन बैंक नेगेटिव एरिया में लोन नहीं देती और मिडिल क्लास लायक दिल्ली में पॉजिटिव एरिया आपको कहीं दिखा है? माइक्रोस्कोप खरीदूंगा इस साल, ताकि ऐसन एरिया ढूंढ सकूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, ई सब बात 'खट्टा अंगूर' वाली है, भगवान करे आपका पूरा साल 'मीठा अंगूर' वाला हो।&lt;br /&gt;वैसे, टीवी पर आने के लिए हम पीआरओ भी बन सकता हूं, लेकिन तभिये, जब हमरे पास अमर सिंह जैसे यूपी कंपनी, मुलायम कंपनी, सपा कंपनी, अंबानी कंपनी, सहारा कंपनी और बच्चन कंपनी जैसे क्लाइंट हो औरो यूपी, दिल्ली से लेकर मुंबई तक का एरिया।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Article: PRJ&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113647144687594392?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113647144687594392/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113647144687594392' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113647144687594392'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113647144687594392'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/01/blog-post_05.html' title='बुड़बक नहीं बनना इस साल'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113619736587319627</id><published>2006-01-02T15:51:00.000+05:30</published><updated>2006-01-02T15:52:47.676+05:30</updated><title type='text'>आलू ने भी साथ नहीं दिया लालू का</title><content type='html'>एगो कहावत है खुदा मेहरबान, तो गदहा पहलवान। एकदम सटीक कहावत है। लेकिन दिक्कत ई है कि लोग इसके मर्म को समझने की कोशिशे नहीं करता है। अपने मसीहा जी को ही लीजिए। खुदे ई कहावत दोसरा के लिए बत्तीस बार कहते रहे हैं, लेकिन कभियो ई नहीं सोचे कि ई उन पर भी लागू हो जाएगी। जब तक उ पहलवान थे, किसी की औकात आलू से बेसी की नहीं थी। एक उ थे और एक आलू था! लेकिन खुदा क्या रूठे कि जिस आलू को अपने हाथों से खेतों में लगाया, उहो किसी और का होने वाला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज्य की सड़क उ भले हेमा के गाल की तरह नहीं बना सके, लेकिन उनकी गाल जरूर हीरोइनों की तरह लाल हो गई थी। लेकिन समय का फेर देखिए, आजकल सूखे गोभी की तरह मुरझाए हुए हैं। का है कि ध्वजा-प्रेमी भाजपाई और उसका छोटका भाई सब चुनाव जीतने के बाद उनके किला पर अपना ध्वजा फहराने को लेकर अड़ा है। एक तो किला छिन रहा है औरो ऊपर से लोग उनकी रईसी का मजाक ऐसे उड़ा रहे हैं, जैसे कभी सत्ता जाने के बाद सद्दाम हुसैन का उड़ाते थे। कोयो कहता है कि गरीब का मसीहा स्विमिंग पुल में नहाता था! कोयो कहता है एसी में रहने वाला उनका शाही घोड़ा औरो गाय-बैल सब अब रोड पर आ जाएगा औरो उ सामंत सब भी, जो अब तक उन पर पलते रहे हैं? का करें, सुन-सुन के दिल बैठा जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन कुछो हो, उनका सेंस ऑफ ह्यूमर अभी गया नहीं है। कहने लगे 'अरे, लोग जिसको स्विमिंग पुल कह रहा है, उ तो तालाब है। तालाब को सिमेंटेड करा दिया, तो उ का स्विमिंग पुल हो गया? हद हो गई भाई! उ भी तो हम लचारी में बनवाए थे। जानते हैं हमको एक कम एक दर्जन बच्चा है। अगर एक आदमी आधो घंटा बाथरूम बंद रखता, तो भगवाने मालिक था। तालाब में तो सब एके बेर घुसता था और नहा के बाहर आ जाता था, जैसे भैंस सब नहाता है। औरों उ गाय-गोरू? हम जा रहे हैं सबको हाई कोर्ट से लेकर सचिवालय तक में खूटिया देंगे। जब रोड जाम होगा, तब बात सबके समझ में आएगी कि किसी का आशियाना उजाड़ना केतना महंगा पड़ता है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, मसीहा जी का ई कदम खतरनाक है। का है कि पंद्रह साल में सड़क पर सर्वहारा छाप गाय-बैल सब के संख्या बहुत बढ़ गया है और अब तक उसके हिस्सा का चारा खाकर पल रहा मसीहा जी के बुर्जुआ गाय-माल अगर रोड पर आ जाएगा, तो दंगे न होगा। रहने दो भाई किला उन्हीं के पास, झंडा कहीं और फहरा लो, लेकिन तब सामंत सबका क्या होगा?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113619736587319627?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113619736587319627/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113619736587319627' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113619736587319627'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113619736587319627'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2006/01/blog-post.html' title='आलू ने भी साथ नहीं दिया लालू का'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113604989264370224</id><published>2005-12-31T22:40:00.000+05:30</published><updated>2005-12-31T22:54:52.656+05:30</updated><title type='text'>बदलने की जरूरत</title><content type='html'>'द मांक हू सोल्ड हिज फरारी' का नायक जूलियन मेंटल अमेरिका का एक सफल वकील अचानक अपनी फरारी, मकान सब कुछ बेचकर हिमालय में निकल पड़ता है। एक संतुलित जिंदगी की खोज में। वह लौटकर आता है, तो अमेरिकवासियों की जिंदगी बदलने के लिए। रॉबिन एस. शर्मा की यह किताब दुनिया में अच्छी खासी संख्या में बिकने वाली किताबों में से है। आखिर वह कौन सी बात है, जो आदमी के भीतर ऐसा अहम परिवर्तन ला देती है? और वाकई क्या ऐसे किसी परिवर्तन की जरूरत भी है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वास्तव में सब पूर्णता के लिए छटपटा रहे हैं। संघर्ष और प्रतिस्पर्धा भी इसी पूर्णता की छटपटाहट है। सब लोग लगातार प्रतियोगिता में नहीं रह सकते। तो वह पूर्णता क्या है? भारतीय दर्शन ने हमें यही सिखाया था। भीतरी ज्ञान की आंखें खोलनी होंगी। गुस्सा, घृणा, द्वेष और डर जैसे नकारात्मक विचारों से मुक्ति पानी होगी। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि कैसे ये नकारात्मक विचार गर्दन में जकड़न, अल्सर, अस्थमा या त्वचा की कई समस्याएं पैदा करने के कारण बनते हैं। आधुनिक विज्ञान खोजने में लगा है कि सकारात्मक विचार स्वस्थ ही नहीं बनाते, बल्कि रचनात्मक ऊर्जा का विस्फोट करते हैं। आप एक ऐसे व्यक्ति में बदलते हैं, जिसका स्विचबोर्ड उसी के पास होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परिवर्तन की कुंजी आपकी चेतना के परिवर्तन में है। चेतना में परिवर्तन से विचार और भावनाएं बदल जाती हैं। मन और शरीर बदल जाते हैं। कौन आदतों और अतीत की गुलामी से मुक्त नहीं होना चाहता? आदतें हमारी रचनात्मक शक्ति को निगल जाती हैं। अतीत की यादें हमारी स्मृति का सबसे ज्यादा हिस्सा घेरकर रखती हैं, ठीक कंप्यूटर की हार्ड डिस्क की तरह। वह कौन सा क्षण है, जब हम बदल सकते हैं? इसका जवाब बहुत पहले जनक ने अष्टावक्र को दिया था- अधुनैव। अभी ही। किसी भी समय या फिर कभी नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉबिन एस. शर्मा के संन्यासी जूलियन मेंटल की तरह क्या आपको भी नहीं लगता कि आपने जो पीछे छोड़ दिया और जो भविष्य में है, वह उतना महत्वपूर्ण नहीं। महत्वपूर्ण है, तो यह कि आपके भीतर क्या है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;चलिए आइए फिर हम क्यों देर करे अपने भीतर को जानने की उसे पहचान कर अपनी जिंदगी का रुख बदलने की। नववर्ष की शुरुआत हम एक नई सकारात्मक ऊर्जा से करें... इसी के साथ सुर की ओर से सभी को नववर्ष की बहुत-बहुत शुभकामनाएं!!!&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;साभारः हिंदुस्तान&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113604989264370224?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113604989264370224/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113604989264370224' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113604989264370224'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113604989264370224'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2005/12/blog-post_31.html' title='बदलने की जरूरत'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113560691783490248</id><published>2005-12-26T19:50:00.000+05:30</published><updated>2005-12-26T19:51:57.843+05:30</updated><title type='text'>कम होने का नाम ही नहीं ले रही पीड़ा</title><content type='html'>दुख का समंदर लाई सूनामी को तो एक साल बीत गया लेकिन इसके पीड़ितों का दुख बीतता हुआ नजर नहीं आता और न ही जल्द इसकी कोई संभावना नजर आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहायता के लंबे चौड़े प्रयासों के बावजूद विनाशकरी लहरों में अपना सबकुछ गंवा चुके लोगों की जिन्दगी एक साल बाद भी नरक जैसी स्थिति में पल पल सामने आती निराशा के साथ चल रही है। हालात ये हैं कि इस कुदरती हादसे की शिकार महिलाओं को तो शारीरिक और यौन शोषण के गर्त तक में गिरना पड़ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनामी पीड़ितों की यह दुखद कहानी किसी और ने नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ के दो विशेषज्ञों ने अपने बयान में कही है। एशिया में आए इस समुद्री जलजले के एक वर्ष पूरा होने के अवसर पर इन विशेषज्ञों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वह भारत, इंडोनेशिया, श्रीलंका, मालदीव, थाइलैंड और सोमालिया के सूनामी पीड़ितों की जिन्दगी को फिर से खुशहाल बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत अपना कर्त्तव्य पूरा करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आतंरिक रूप से विस्थापित हुए लोगों के मानवाधिकार मामलों में संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान के प्रतिनिधि वाल्टर किडलिन और आवास विशेष अधिकारी मिलून कोठारी ने पीड़ितों को मूलभूत सुविधाएं पर्याप्त रूप से उपलब्ध न होने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब त्वरित कदम उठाने चाहिए ताकि इन लोगों में उम्मीद की किरण जाग सके।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113560691783490248?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113560691783490248/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113560691783490248' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113560691783490248'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113560691783490248'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2005/12/blog-post_26.html' title='कम होने का नाम ही नहीं ले रही पीड़ा'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113544635069674334</id><published>2005-12-24T23:14:00.000+05:30</published><updated>2005-12-24T23:15:50.696+05:30</updated><title type='text'>गांगुली को क्रिसमस का तोहफा</title><content type='html'>क्रिसमस के दिन बच्चों के चहेते सेंटा क्लॉज उन्हें कोई उपहार न दें भला ऐसा कैसे हो सकता है. सेंटा भी आज के दिन अपने किसा बच्चे को दुखी और मुंह लटकाए बैठा नहीं देख सकते. उनके पिटारे में सभी के लिए कुछ न कुछ ऐसा होता है जिनसे बच्चों के मुरझाए चेहरे खिल जाते हैं. तभी तो कहते है कि सेंटा किसी न किसी रूप में आकर अपने प्रिय बच्चों को खुशियां दे जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा ही एक तोहफा क्रिसमस के त्योहार पर गांगुली दादा को भी मिला, जिससे पिछले कई हफ्तों से मुरझाए उनके चेहरे पर फिर से मुस्कान लौट आई. गांगुली दादा के लिए आज चयन समिति के अध्यक्ष किरन मोरे सेंटा क्लॉज के रूप में आकर उन्हें उनका मनपसंद तोहफा दे ही गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सौरभ गांगुली को टीम में वापस शामिल करने के चयन समिति के फैसले से न सिर्फ गांगुली प्रसन्न हैं, बल्कि क्रिकेट के दीवाने उनके चाहनेवालों ने भी राहत की सांस ली है. दिल्ली टेस्ट में श्रीलंका के खिलाफ अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद अहमदाबाद टेस्ट में गांगुली को शामिल नहीं किए जाने के चयन समिति के फैसले की देश भर में काफी आलोचना हुई थी, जो यकीनन सही थी. ये सही है कि गांगुली ने कोच और कप्तान के बीच के झगड़े को सरासर मीडिया के सामने लाने की गलती थी, लेकिन इस गलती की सजा उन्हें कप्तानी गंवा कर भुगतनी पड़ी थी. गांगुली को भी अपनी गलती का अहसास हो गया था, पर अहमदाबाद टेस्ट में जिन दलीलों के आधार पर गांगुली को टीम से बाहर किया गया था, उसे भी वाज़िब नहीं कहा जा सकता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांगुली की प्रतिभा को लेकर शायद ही किसी के मन में शंका हो. लेकिन अहमदाबाद टेस्ट के लिए गांगुली को बाहर किए जाते समय चयनकर्ताओं के अध्यक्ष किरण मोरे उनके अनुभव और ढेरों रनों को नजरअंदाज कर गए थे. इस फैसले से गांगुली के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया था.&lt;br /&gt;ये सही है कि व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर टीम भावना जरूरी है और गांगुली ने इसे भूलने की गलती की थी. खैर अब जबकि गांगुली को टीम में शामिल कर लिया गया है तो यही कहा जा सकता है कि अंत भला तो सब भला. उम्मीद है कि पिछले गलतियों से सबक सीख कर आने वाले नए साल में खिलाड़ी और क्रिकेट से जुड़े लोग राजनीति से ऊपर उठकर टीम के हित को सर्वोपरि मानकर काम करेंगे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113544635069674334?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113544635069674334/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113544635069674334' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113544635069674334'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113544635069674334'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2005/12/blog-post_113544635069674334.html' title='गांगुली को क्रिसमस का तोहफा'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113527002901272220</id><published>2005-12-22T22:13:00.000+05:30</published><updated>2005-12-22T22:20:35.926+05:30</updated><title type='text'>धर्म और संस्कृति के ये रखवाले!!</title><content type='html'>लीजिए जनाब अपने देश की धर्म व संस्कृति पर इतना बड़ा संकट आ जाए और हमारे देश की धर्म और संस्कृति के रखवाले (तथाकथित) संगठन चुपचाप बैठे रहे यह कैसे संभव है. मेरठ के प्रेमी जोड़ों पर पुलिस ने दो-चार थप्पड़ क्या मार दिए कि पड़ गए सब बेचारे पुलिसवालों के पीछे. बस फिर क्या था धर्म, परंपरा और संस्कृति के रखवालों को तो आगे आना ही था. लीजिए अब वे अपने जाबांज पुलिसकर्मियों का साथ देने के लिए आ गए है &lt;a href="http://www1.navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/1342828.cms"&gt;मैदान में&lt;/a&gt;. अब जरा कोई ऐसी-वेसी हरकत तो करके दिखाए. वो तो उन प्रेमियों के दिन जरा अच्छे थे जो उन पर पुलिस से पहले इन संगठनों की नजर नहीं पड़ी वरना तो मजाल की देश में संस्कृति के खिलाफ कुछ भी ऐसा वैसा (प्यार-व्यार, वैलेंनटाइन-डे वगैहर-वगैहर) हो जाए. &lt;a href="http://www1.navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/1342828.cms"&gt;(देखे संपादकीय)&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देखिए ना जिस दिन टीवी पर पुलिसवालों के इस स्पेशल ऑपरेशन को दिखाया गया, उसी दिन टीवी पर एक और न्यूज दिखाई गई. खबर कुछ यूं थी कि एक मुस्लिम युवा ने अपने हिंदू लड़की के साथ शादी कर ली. बस शहर में हो गया बवाल. उसी पर हमारे एक प्रसिद्ध हिंदूवादी संगठन के महान नेता टीवी कैमरे के सामने भड़कते हुए बोले, ये मुस्लमानों की सोची समझी चाल है, इस तरह वो हिंदु संस्कृति को नष्ट कर रहे है. ये तो मोहम्मद गजनी के समय से होता आ रहा है. इस तरह की शादी को कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब भला वे तो ये समझने से रहे कि प्यार अंधा होता है, ऊंच-नीच, जात-बिरादरी, धर्म नहीं देख पाता. इसलिए उनका और उनकी सोच के लोग का मानना भी सही है कि कोई भी ऐसी चीज जो धर्म-संस्कृति न देख पाती देश के लिए घातक है. इसलिए बेचारे पुलिसवालों को, जिन्होंने देश की खातिर इतना बड़ा काम किया उनका समर्थन तो करना ही पड़ेगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113527002901272220?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113527002901272220/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113527002901272220' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113527002901272220'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113527002901272220'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2005/12/blog-post_113527002901272220.html' title='धर्म और संस्कृति के ये रखवाले!!'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113525385286135151</id><published>2005-12-22T17:43:00.000+05:30</published><updated>2005-12-22T17:47:32.873+05:30</updated><title type='text'>मूड एकदम फ्रस्टिया गया है</title><content type='html'>उस दिन उ हमरे घर आया। बहुत परेशान था। का है कि अपने राज्य में अपहरण का धंधा अब मंदा हो गया न, इसलिए घोर बेरोजगारी में दिन काट रहा है। जब मूड एकदम फ्रस्टिया गया, तो सोच लिया कि अब कोनो और रोजगार करेगा। इत्ते में बम्बे से भाई सब का ऑफर आ गया कि यहीं आ जाओ और फिरौती से कमाया पैसा शो बिज में लगाओ। चोखा धंधा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उ बम्बे नहीं जाएगा। कह रहा था कि जब किसी की इज्जत उतारकर ही तिजोरी भरना है, तो यहीं रहकर कमाऊंगा। पैसा के साथ इज्जतो मिलेगा। अब उ भट्ट कैंप को ही लीजिए। एतना बढि़या-बढि़या हीरोइनों का सब कुछ दिखा दिया, लेकिन एको गो फिलिम हिट नहीं हुआ। बेचारा इमरान का दोनों होंठ सूज गया है चुम्मा लेते-लेते, लेकिन दर्शक उसको देखने सिनेमा हॉल नहीं आया। क्या फायदा ऐसे बिजनेस में पैसा लगाने से?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने लगा-- शो बिज के बदले न्यूज बिज में पैसा लगाऊंगा। स्टिंग ऑपरेशन का एजेंसी खोलूंगा और स्लो चैनल को तेज करने का ठेका लूंगा। एक दर्जन एमपी के बदले अगर 70-75 लाख मिल सकता है, तो हम तो एमपी सब के लाइन लगा देंगे। नोट लेते और चड्डी उतारते नेता, अभिनेता और अफसर के वीडियो क्लिप ही न चाहिए, हम सब उपलब्ध कराऊंगा। अब देखिएगा हमरा चमत्कार। पिछला इलेक्शन के हमर जोर नहीं चला, तो नेता सब को लगने लगा था कि हमरा दिन बीत गया। लेकिन अब हम सबको 'नाथ' दूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाकी लोग तो बेकूफ है, जो नेता-अभिनेता सब को फांसने के लिए दस गो बहाना ढूंढता है और सुंदर लड़की सब को बत्तीस बार भेजता है। अरे, अपन फैक्टरी में बनल एगो देसी कट्टा कनपट्टी पर रखिए और सामना में कैमरा धर दीजिए। देखिए, कैसे बिना एको पैसा लिए, उ लाखों रुपया लेने की बात कबूलता है। अपन चड्डी उतारने की तो बात छोडि़ए, दोसरो के चड्डी फटाफट उतार देगा। का कहे, ई धंधा चलेगा, दौड़ेगा भाई। एक बेर जहां वीडियो चैनल पर चल गया, फेर के पूछने आता है कि उ वीडियो बना कैसे? एक बेर उतरा इज्जत फेरो नसीब नहीं होता है। इज्जत चड्डी थोड़े है कि फिर से पहन लीजिएगा। हमर स्टिंग ऑपरेशन में लोग कैमरा के सामने या तो चुपचाप पैसा जेबी में करेगा, नहीं तो चुपचाप 'ऊपर' प्रस्थान कर जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, जरूरी नहीं है कि सब कुछ चैनल को ही बेचूंगा। इज्जत बचाना हो तो कोयो अपनो नेगेटिव हमसे खरीद सकता है या फिर बिपक्षी पाटी भी उ ले सकता है। सबके लिए फिक्स रेट- - घूस लेने वाला 20 लाख, चड्डी उतरल 40 लाख, परी के साथ 60 लाख...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार ई धंधा चल गया, तो जल्दिये एगो स्टिंग ऑपरेशन सीखाने वाला स्कूलो न खोल देंगे। पढ़कर निकलिए, नौकरी फिक्स। हंड्रेड परसेंट कैंपस सिलेक्शन। अब बताइए, इसके लिए दिल्ली से बढि़या जगह कोनो और होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;BY: PRJ&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113525385286135151?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113525385286135151/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113525385286135151' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113525385286135151'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113525385286135151'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2005/12/blog-post_22.html' title='मूड एकदम फ्रस्टिया गया है'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113518340569286331</id><published>2005-12-21T22:10:00.000+05:30</published><updated>2005-12-21T22:13:25.710+05:30</updated><title type='text'>प्रेमियों पर बरसा पुलिस का कहर</title><content type='html'>अभी कल की ही बात है। मेरठ के गांधी पार्क में पुलिस द्वारा प्रेमी- प्रेमिकाओं को जमकर धुना गया। ऐसी ही एक घटना पहले भी घटी थी और तब रेस्टोरेंट में बैठे प्रेमी जोड़े पुलिस का निशाना बने थे. महिलाओं के साथ छेड़खानी करने वाले मनचलों के खिलाफ अभियान चलाने के नाम पर पुलिस ने इस ऑपरेशन 'मजनूं' को चलाया. परंतु टीवी पर इस ऑपरेशन का नजारा देखकर तो कहीं से ऐसा नहीं लगा कि पुलिस का शिकार 'मनचले' थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुलिस के इस कार्रवाई की पूरे देश में निंदा हो रही है। प्रश्न यह है कि सही कौन है- कानून-व्यवस्था दुरुस्त रखने के नाम पर कार्रवाई करने वाली पुलिस या फिर व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर घटना की आलोचना करने वाले लोग।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली के संदर्भ में इस घटना को देखें, तो दिल्ली के युवा इस मामले में थोड़े नसीब वाले हैं. दिल्ली में तो मेरठ के गांधी पार्क जैसे पार्कों की बहुतायत है। लोदी रोड, बुद्धा जयंती पार्क, पुराना किला, जापानी पार्क, बोंटा पहाड़ी..... नाम गिनने लगे, तो हर दस किलोमीटर पर यहां कम से कम दो ऐसे पार्क निकलेंगे, जो प्रेम-प्रेमिकाओं की सभी गलत-सही हरकतों का रोज गवाह बनते हैं। परंतु अभी तक यहां के युवाओं को ऐसी घटना का शिकार नहीं होना पड़ा है. लेकिन ऐसा नहीं है कि वे पुलिस की मनमानी और जोर जबरदस्ती का शिकार नहीं होते. वर्दी का रौब दिखाकर पार्कों में बैठे प्रेमी जोड़ों से 20-50 रूपए वसूलना आम है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं हमारे प्रजातंत्र के इन सिपाहियों को बसों में दो-चार रूपए का टिकट लेने के बजाए 'स्टाफ' की धौंस देकर बेचारे बस कंडक्टरों को धमकाते हुए आप कहीं भी देख सकते हैं. सवाल यह है कि क्या कानून व्यवस्था को दुरस्त करने और मनचलों से निपटने का यही एकमात्र उपाय बचा था? क्या सिर्फ एक खाकी वर्दी के नाम पर पुलिस को किसी भी हद तक जाने का अधिकार मिल जाता है? पता नहीं कानून व्यवस्था बिगाड़ने के लिए कौन ज्यादा जिम्मेदार है अपराधी या हमारे वर्दीधारी.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113518340569286331?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113518340569286331/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113518340569286331' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113518340569286331'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113518340569286331'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2005/12/blog-post_21.html' title='प्रेमियों पर बरसा पुलिस का कहर'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113473333957711327</id><published>2005-12-16T17:07:00.000+05:30</published><updated>2005-12-16T17:12:19.590+05:30</updated><title type='text'>दिलवालों की ई दिल्ली!!!</title><content type='html'>कहते हैं कि दिल्ली दिल वालों की है। मतलब ई कि आप दिल्ली आए नहीं कि आपका दिल बड़ा हो गया। ई सच है कि झूठ हमको पता नहीं, लेकिन ऐसा लोग कहते हैं। वैसे, हमको तो लगता है कि यहां के लोगों की सोच बड़ी है या चलिए आप इहो कह सकते हैं कि यहां के लोग सोचते बड़े-बड़े हैं।&lt;br /&gt;मेरा एगो मित्र है। तनि हसोड़ किसम का है। विशवास कीजिए, दिल्ली के बारे में उसकी सोच सुनके आप भी हैरान रह जाइएगा। उ दिल्ली के बड़प्पन के बारे में जो महसूस करता है, उ हम आपको बता रहे हैं- -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली का दिल देखना हो, तो यहां का व्याकरण ज्ञान देखिए। लिंग भेद का यहां कोनो जगह नहीं। नर-मादा सब ईश्वर की संतान है, तो भेद काहे का? तभिए तो इतना बड़ा शहर, लेकिन लोग कहते हैं- - मेरी दिल्ली, प्यारी दिल्ली। अब हमरे समझ में यह नहीं आता कि जब लखनऊ 'प्यारा' शहर है और चंडीगढ़ भी 'प्यारा', तो दिल्ली 'प्यारी' कहां से हो गई?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां का हमरा एक दोस्त कहता है कि ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हम स्त्रियों का बहुत सम्मान करते हैं। हां, शायद ऐसा ही होगा। अब ई बात अलग है कि यहां मादा भ्रूण हत्या वाला क्लीनिक गली-गली में भरल पड़ल है। वैसे, ठीके है, ई तो सब 'सभ्य' समाज में आजकल हो रहा है। दिल्लियो में हो रहा है, तो कौन खराब है। हमरा दोस्त कहता है, 'स्त्रियों का सम्मान देखना हो, तो यहां के बसों में जाकर देखिए। बस में बाएं तरफ का सम्मानजनक स्थान उनके लिए आरक्षित होता है।' हां, उ ठीके कहता है। वैसे, कभी-कभार आपको ई अफसोस हो सकता है कि ई सम्मान इसी चार-पांच सीट तक है, इससे एको सीट बेसी पर नहीं। अगर कोनो बस में इन सीटों से ज्यादा महिलाएं आ जाएं और भीड़ ठसमठस हो, तो फिर उनके 'सम्मान' के लिए जो हाथ और कुहनियां 'आगे' आती हैं, उसका भगवाने मालिक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;का है कि दिल्लीवालों का ई मामले में भी जवाब नहीं है कि लोग किसी चीज को छोटा नहीं समझते और बड़े के 'बड़ापन' को सम्मान देने में अपना बड़प्पन समझते हैं। दरअसल, ओ संख्या बल से बहुत डरते हैं और उसका पूरा-पूरा सम्मान करते हैं। क्या कीजिएगा, राजनीति का सबसे बड़ा अखाड़ा संसद यहीं है न, इसलिए संख्या बल का एतना खयाल रखना पड़ता है। यहां के लोग कहेंगे- - मैं तो शहादरे जा रहा था..... मैंने छोले-भटूरे खाए हैं और दही-भल्ले भी। गनीमत है कि चावले नहीं खाते और दूधे नहीं पीते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ई बड़ा सोच इनकमो के मामला में है। लोग दिन-रात कमाने में लगे रहते हैं, पैसा बनाते रहते हैं, न परिवार को देखते हैं और न समाज को। लोग एतना मशगूल रहते हैं अपने काम में कि चड्ढ़ा साहब की मैयत में जाने के लिए दो पड़ोसी नहीं मिलते। और दूनंबरा पैसा में भी ऐही सोच है। सीबीआई जहीं हाथ डालती हैं, वहीं से लाखों-करोड़ों की नकदी मिल जाती है उसको। यही नहीं, लोगों का दिल इहो मामला में बड़ा है कि ई सब बात से 'नोट छापने वाले' की सामाजिक सेहत पर कोनो असर नहीं पड़ता। दुनिया सुबह-सुबह पेपर पढ़कर उनकी कारगुजारियों पर अफसोस व रोष जता रही होती है, तो उ महाशय पड़ोसी और ओकर कुत्ता के साथ अपना कुत्ता टहला रहे होते हैं। अब कहिए, एतना बड़ा दिल है, तभिये न दिल्ली दिल वालों का कहलाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113473333957711327?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113473333957711327/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113473333957711327' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113473333957711327'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113473333957711327'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2005/12/blog-post_16.html' title='दिलवालों की ई दिल्ली!!!'/><author><name>Priya Ranjan Jha</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://photos1.blogger.com/blogger/5348/1981/320/pj.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113446933296297287</id><published>2005-12-13T15:50:00.000+05:30</published><updated>2005-12-13T15:52:12.973+05:30</updated><title type='text'>भ्रष्ट बताने का तरीका</title><content type='html'>आज तक चैनल ने कल कथित रूप विस्फोट किया, लेकिन क्या वाकई यह विस्फोट है? मुझे नहीं लगता। मेरा मानना है कि इसमें कुछ ऐसे सरल व सीधे सांसद फंस गए हैं, जो चुग्गा को पहचान नहीं पाए। ऐसी बात नहीं है कि यह चुग्गा सिर्फ इन्हीं सांसदों को मिला और ये फंस गए, वास्तव में स्टिंग ऑपरेशन करने वाली टीम ने कइयों को निशाना पर लिया होगा, लेकिन जो सीधे थे, वे इसमें फंस गए। हमें यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि जितने सांसद मामले में फंसते दिख रहे हैं, उनमें से ज्यादातर अब तक साफ-सुथरे चरित्र वाले रहे हैं और उन पर कभी कोई गंभीर आरोप नहीं लगे हैं। जबकि दूसरी ओर, इसी संसद में ऐसे कई सांसद हैं, जिन पर देशद्रोह का आरोप न सिर्फ लगा है, बल्कि साबित भी हो चुका है, लेकिन उन्हें कोई कुछ कहने वाला नहीं है। स्टिंग टीम की असफलता इस बात में भी दिखती है कि उसने जिस तरह के प्रश्न को उठाने के लिए कथित रूप से पैसा दिया था, वे बेहद ही सामान्य किस्म के थे और उन प्रश्नों के उत्तर जानकर कोई किसी तरह का लाभ नहीं उठा सकता। मेरे खयाल से यह ऑपरेशन तब ज्यादा सफल कहा जाता, जब किसी गंभीर व विवादास्पद मामले को उठाने के लिए कोई सांसद रिश्वत लेता। हमें यह बात माननी ही पड़ेगी कि हमारे यहां के अधिकांश सांसद बेईमान और भ्रष्ट हैं। विश्वास कीजिए अगर वे ऐसा नहीं होंगे, तो वे जीतकर संसद पहुंच ही नहीं सकते। अपने देश में बिना किसी तगड़े पॉलिटिकल बैकग्राउंड या आर्थिक सपोर्ट के चुनाव लड़ना और उसे जीतना असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर है। ऐसे में आप तभी चुने जाते हैं, जब आप हर विद्या में पारंगत हों। सांसदों को अपने क्षेत्र में विकास के काम करवाने के लिए हर साल एक बड़ी राशि मिलती है। हकीकत यह है कि इतनी बड़ी राशि का एक बड़ा हिस्सा जिले का कलक्टर और सांसद महोदय की जेब में जाता है, लेकिन उस पर किसी का ध्यान नहीं जाता। मेरा मानना है कि भ्रष्टाचार ऐसी चीज नहीं है कि आप पतीले में खौलते चावल में से एक को निकालकर चावल के पकने का अंदाजा लगा सके। आज तक का यह खुलासा यह साबित नहीं करता कि सभी सांसद बेईमान हैं और न ही यह कि इस ऑपरेशन में जो नहीं पकड़ाए, वे ईमानदार हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113446933296297287?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113446933296297287/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113446933296297287' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113446933296297287'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113446933296297287'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2005/12/blog-post_13.html' title='भ्रष्ट बताने का तरीका'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113404699038864068</id><published>2005-12-08T18:32:00.000+05:30</published><updated>2005-12-08T18:33:10.403+05:30</updated><title type='text'>जीवन का समीकरण</title><content type='html'>जीवन के बारे में कुछ भी भविष्यवाणी करना आसान नहीं। यहां जब तक चीजें साक्षात मूर्त रूप में तब्दील नहीं हो जाती, कोई कुछ कह भी कैसे सकता है? लेकिन कहा तो यह भी जाता है कि हम जिंदगी को जो भी देते हैं, जीवन उसे अंतत: हमें लौटा देता है। जैसे ऊंचे पहाड़ों के सामने आवाज लगाने पर पहाड़ हमारी आवाज हमें लौटा देते हैं। वास्तव में यही वह कुंजी है, जिसे समझने के बाद भविष्य उतना अप्रत्याशित नहीं रह जाता। यदि हम सकारात्मक ऊर्जा से भरकर सकारात्मक काम करें, तो जीवन भी हमें वैसे ही परिणाम देगा। कहीं कोई प्रतिरोध है ही नहीं। हमारा भाग्य पहले से ही बंधा हुआ नहीं, बल्कि हमारे रोज के कर्म ही उसे स्वरूप देते हैं। एक स्वस्थ-संपन्न जीवन का इतना सरल समीकरण मौजूद होने के बावजूद भी अगर कोई दुखी और निराश है, तो उसके लिए कोई कुछ नहीं कर सकता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113404699038864068?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113404699038864068/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113404699038864068' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113404699038864068'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113404699038864068'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2005/12/blog-post_08.html' title='जीवन का समीकरण'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113352837734749497</id><published>2005-12-02T18:16:00.000+05:30</published><updated>2005-12-02T18:29:37.356+05:30</updated><title type='text'>भगवान बुद्ध के अवतार!!!</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/5446/1726/1600/nepal.jpg"&gt;&lt;img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/5446/1726/320/nepal.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt; A meditating teenage boy in Nepal is drawing attention of people all over the world&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;पिछले छह महीने से बिना कुछ खाए, यहां तक की बिना पानी पिए पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान में लीन 15 वर्षीय बालक इन दिनों चर्चा और जिज्ञासा का विषय बना हुआ है. नेपाल में तो यह बालक लोगों के आकर्षण का केंद्र बन ही चुका है, अब राम बहादुर बामजान नाम के इस बालक की चर्चा देश-विदेश में भी हो रही है. कहा जा रहा है कि पिछले छह महीने से बालक इसी तरह बिना जल-अन्न ग्रहण किए समाधि लगाए बैठा है. लोग इसे भगवान बुद्ध का अवतार मान रहे हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17884476-113352837734749497?l=delhiblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://delhiblog.blogspot.com/feeds/113352837734749497/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17884476&amp;postID=113352837734749497' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113352837734749497'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17884476/posts/default/113352837734749497'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://delhiblog.blogspot.com/2005/12/blog-post_02.html' title='भगवान बुद्ध के अवतार!!!'/><author><name>sur</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03622402341980998790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17884476.post-113343383361351447</id><published>2005-12-01T16:12:00.000+05:30</published><updated>2005-12-01T16:13:53.623+05:30</updated><title type='text'>हम बहुत कन्फूज हूं</title><content type='html'>हम बहुत कन्फूज हूं भाई! का है कि हम महान बनना चाहता हूं। लेकिन ई आठ-दस दिन में जिस तरह से महान लोगों को दुनिया 'अंगुली देखा' रही है और महान लोग दुनिया को, उसको देखके डर गया हूं। इसका एक-दो गो नहीं, बहूते उदाहरण है। अब किरकेटिया गुरु गेट चप्पल को ही लीजिए। बेचारा पिरथिवी के दोसरा छोर से हियां आया कि भारत को विश्व विजेता बना सके। अभी ऊ अपने को महान समझने ही लगा था कि लगा सब उसको अंगुली देखाने। अब जब अंगुली देखाइएगा, तो अंगुली देखबो न कीजिएगा। देखा न दिया इस गेट ने भी अंगुली। अब ई मत पूछिए कि चप्पल ने ऊ अंगुली एक अरब भारतीय को देखाया या फिर एक सौ (रव) गंग्गुली फैन को। दिक्कत ई है कि चप्पल जिसको चुटकी में मीसकर महान बनने चला था, ऊ गंग्गुली भी तो अपने को महाने न बूझता था। देखा दिया सबने मिलकर उसको भी उंगली। सच बताऊं, तो हमको आजकल सब 'अंगुली-अंगुली' खेलते ही देखाई पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तनि किरकेटिया सीईओ डाल मियां साहब को ही देख लीजिए। बीस बरिस तक अपन जेबी संस्था को चलाते-चलाते मियां साहब अपने को महाने न बूझने लगे थे कि लोगों ने उनके पैर के नीचे से पूरा जमीने सरका दिया। सौ टका से सौ करोड़ के कारपोरेट कमपनिये खड़ा करके उनको का मिला? ई दुर्दशा! राम राम! आप ही बताइए, उनके सामने हम कौन खेत का मूली हूं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपी के ऊ आईजी डंडा साहब को तो आप जानबे न करते हैं। अरे, वोही डंडा साहब, जो धरम-करम करके महान बनना चाहते हैं। अब भगवान उनके पास आए, कोई ई मानवे नहीं करता है! सबसे पहले बीवीये न अंगुली देखा दिया और फेरो डिपार्टमेंटों क्यों पीछे रहता? वैसे, हमको तो लगता है कि डंडो साहब ने सबको अंगुली जरूर देखाया होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एगो औरो उदाहरण लीजिए। अपने रेल वाले नेताजी भी तो महाने न हो गए थे। पहिले बीस बरिस तक शासन करने का ताल ठोंकते थे, लेकिन पब्लिक बड़ा बेबकूफ है हो। 'मसीहा' को एतना पहिलये उंगली देखा दिया। ई अंगुली ने न उनको बहुत तंग किया है। पहिले त अंगुली देखा-देखाकर विपक्षी पाटी वाला सब राज छोड़ा दिया औरो अब दाग-धब्बा के नाम पर दिल्ली में सिग्नल रेड करने प
